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समस्या: अफीम से उपजी है मणिपुर की हिंसा, जनजातीय इलाकों में जमा है गुस्सा

Madhurendra Sinha मधुरेंद्र सिन्हा
Updated Sat, 05 Aug 2023 07:19 AM IST
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सार
मणिपुर की ड्रग समस्या जटिल है और जनजातीय इलाकों के बहुत से लोग इसमें शामिल हैं, जिसका गुस्सा वहां की हिंसा में साफ दिखाई दे रहा है।
 
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drug problem in Manipur is complex involvement of tribal areas people in violence
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Social Media

विस्तार

भारत का पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर पिछले कुछ महीनों से बड़े पैमाने पर हिंसा के कारण सुर्खियों में है। वहां अब तक लगभग डेढ़ सौ जानें गईं और सैकड़ों मकान फूंक डाले गए। लाखों लोगों ने जान बचाकर राहत शिविरों में शरण ली या दूसरे राज्यों में पलायन कर गए। वहां रहने वाले मैतेई और कुकी जनजाति के बीच परस्पर भरोसे की दीवार ढह गई। हालांकि दोनों समुदाय पहले से ही एक-दूसरे को संदेह की दृष्टि से देख रहे थे, लेकिन इन जातीय दंगों ने उनके बीच अब बड़ी खाई खोद दी है। दोनों प्रमुख समुदायों में नफरत की भावना इस कदर घर कर गई है कि दोनों एक-दूसरे को देखना भी नहीं चाहते। विभिन्न टिप्पणीकार इस भयावह हिंसा और मानवता को शर्मसार करने वाली घटनाओं के कारणों का विश्लेषण कर रहे हैं, लेकिन राज्य प्रशासन अब तक इस हिंसा पर काबू पाने के लिए कुछ ठोस नहीं कर पाई है। नतीजतन सर्वोच्च न्यायालय को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा है और उसने वहां के पुलिस महानिदेशक को तलब किया है।



मणिपुर की इस अभूतपूर्व हिंसा का एक कारण है अफीम की अवैध खेती और ड्रग्स तस्करी, जिसमें न केवल कुकी जनजाति के लोग, बल्कि सत्तारूढ़ दल के कुछ सदस्यों के रिश्तेदार भी शामिल हैं। मणिपुर अफीम तस्करी के लिए आजादी के समय से ही जाना जाता रहा है। यह चीन, बांग्लादेश और म्यांमार का पड़ोसी है। म्यांमार से न केवल बड़े पैमाने पर अफीम की, बल्कि हशीश और मेथा नाम की नशीली दवा की तस्करी भारत में होती है। म्यांमार-मणिपुर सीमा 1,640 किलोमीटर लंबी है, जहां सतत निगरानी मुश्किल है। चूंकि यह पहाड़ी और दुर्गम जंगलों का इलाका है, इसलिए इन्हीं रास्तों से यहां अफीम आती रही है। हालांकि बाद में मणिपुर में धड़ल्ले से अफीम की अवैध खेती होने लगी। सरकारी अनुमानों के अनुसार, वहां लगभग 15,400 एकड़ भूमि पर अफीम की खेती हो रही है। हालांकि वहां कई बार अफीम की फसल नष्ट करने का व्यापक अभियान चलाया गया, लेकिन उसे रोका नहीं जा सका है।


राज्य सरकार को दो-दो मोर्चों पर जूझना पड़ रहा है। एक ओर अवैध अफीम की खेती को नष्ट करना, दूसरी तरफ म्यांमार से आने वाले ड्रग्स पर अंकुश लगाना, जिसमें अफीम भी शामिल है। इस खेल में बहुत से भागीदारों के होने के कारण यह मसला और जटिल हो गया है। लेकिन सबसे बड़ी समस्या है म्यांमार से अफीम व अन्य मादक पदार्थों की तस्करी, जिसमें वहां के सैन्य शासक का भी दखल है।

दुनिया के दूसरे सबसे बड़े अफीम उत्पादक देश म्यांमार की सीमाएं भारत और चीन, दोनों से मिलती हैं। थाईलैंड और लाओस भी इसके पड़ोसी देश हैं। ये उस कुख्यात ड्रग तस्करी क्षेत्र का हिस्सा हैं, जिसे स्वर्ण त्रिभुज कहते हैं और इसमें तीनों देश-लाओस, थाईलैंड और म्यांमार शामिल हैं। इसका इतिहास बहुत पुराना है। यहां से तस्करी के जरिये अफीम पहले चीन में भी पहुंचाई जाती थी, लेकिन कम्युनिस्ट शासन में वहां उसकी तस्करी कम हो गई। लेकिन भारत, बांग्लादेश और थाईलैंड में बाकायदा इसकी आपूर्ति होती रही। साठ के दशक में तो वियतनाम युद्ध के दौरान वहां की अफीम अमेरिकी सैनिकों में बेहद लोकप्रिय हो गई थी। लेकिन वियतनाम युद्ध खत्म होते ही यह धंधा चौपट हो गया। उसके बाद से तस्करों ने बड़े पैमाने पर अफीम भारत भेजना शुरू किया। फिर मणिपुर के पहाड़ी इलाकों में अफीम की खेती होने लगी।

पहले की सरकारें इसे अनदेखा करती रहीं, लेकिन बीरेन सिंह की भाजपा सरकार ने इस पर निशाना साधा। सरकारी एजेंसियों ने हजारों एकड़ में लगी अफीम की फसल जलानी शुरू की, जिससे स्थानीय लोगों में सरकार के खिलाफ काफी रोष पैदा हो गया। माना जाता है कि जातीय हिंसा का एक कारण यह भी बना और मैतेई तथा कुकी समुदायों के बीच दंगों की एक बड़ी वजह यही है।

मणिपुर की ड्रग समस्या जटिल है और जनजातीय इलाकों में रहने वाले बहुत से लोग इसमें शामिल हैं, क्योंकि इसमें मोटा पैसा आसानी से मिल जाता है। इसने कुकी जनजाति के एक बड़े वर्ग को प्रभावित किया है, जिसका गुस्सा मणिपुर की हिंसा में साफ दिखाई दे रहा है।

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