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महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनाव में विपक्ष के सामने होगी दोहरी चुनौती

Wed, 25 Sep 2019 07:08 AM IST
अवधेश कुमार अवधेश कुमार
अवधेश कुमार Published by: अवधेश कुमार Updated Wed, 25 Sep 2019 07:08 AM IST
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Double challenge for the opposition
अवधेश कुमार

महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनाव मोदी सरकार-2 के संसद के पहले सत्र में रिकॉर्ड तोड़ काम करने की पृष्ठभूमि में हो रहे हैं। वर्षों से भाजपा के घोषणा पत्र में शामिल अनुच्छेद 370 जम्मू कश्मीर से खत्म किया जा चुका है। एक साथ तीन तलाक को अपराध बनाने का कानून भी बन चुका है। प्रधानमंत्री मोदी ने इन दोनों मामलों में कांग्रेस ही नहीं, राकांपा के शरद पवार को भी कटघरे में खड़ा किया है।


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महाराष्ट्र के पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा एवं शिवसेना के बीच गठबंधन नहीं हुआ था। लेकिन भाजपा कुल 288 में से 122 सीटें जीतने में कामयाब रही, जबकि शिवेसना 63 पर सिमट गई। बाद की परिस्थितियों में दोनों को मिलकर सरकार बनाने को विवश होना पड़ा। इसके मुकाबले कांग्रेस को 42 एवं राकांपा को 41 सीटें मिली थीं। लोकसभा चुनाव में भाजपा एवं शिवेसना में समझौता हो गया था। भाजपा ने 23 तथा शिवसेना ने 18 सीटें जीतीं।

राकांपा ने चार तथा कांग्रेस ने केवल एक सीट जीती। भाजपा को 27.59 प्रतिशत और शिवसेना को 23.29 प्रतिशत मत मिले थे और उनका कुल मत 50.88 प्रतिशत हो जाता है। इसके समानांतर कांग्रेस को मिले 16.27 प्रतिशत और राकांपा के 15.52 प्रतिशत को मिला दें, तो यह 31.79 प्रतिशत ही होता है। इस तरह दोनों के बीच करीब 19 प्रतिशत मतों का अंतर है। इतने भारी मतों को पाटा तभी जा सकता है, जब सरकार के खिलाफ व्यापक असंतोष हो या विपक्ष के पक्ष में लहर।

हरियाणा में भाजपा ने 90 में से 47 सीटें जीतकर पहली बार अपने दम पर सरकार बनाई। 19 सीटें लेकर दूसरे स्थान पर आईएनएलडी एवं 15 सीटों के साथ कांग्रेस तीसरे नंबर पर रही। अन्य को नौ सीटें प्राप्त हुई थीं। हरियाणा में लोकसभा चुनाव में भाजपा को 58.02 प्रतिशत तथा कांग्रेस को 28.42 प्रतिशत मत मिले। सभी 10 सीटें भाजपा के खाते में गईं। भाजपा का अपना मत ही विधानसभा चुनावों से 25 प्रतिशत ज्यादा हो गया। अगर दोनों चुनावों के मतों के अनुसार गणना करें, तो भाजपा के निकट कोई पार्टी नहीं है।

महाराष्ट्र की तरह हरियाणा में भी भाजपा को हराने के लिए उसके खिलाफ जनता में व्यापक असंतोष तथा विपक्ष यानी कांग्रेस के पक्ष में लहर चाहिए। अब दोनों राज्यों की राजनीतिक स्थिति पर नजर दौड़ाएं। लोकसभा चुनाव 2019 के बाद से महाराष्ट्र में कुल 16 विधायकों तथा 16 पूर्व विधायकों ने पार्टी छोड़कर भाजपा एवं शिवसेना का दामन थामा है। दूसरी पार्टियों के नेताओं को लग रहा है कि अगर प्रदेश की राजनीति में प्रासंगिकता बनाए रखनी है, तो भाजपा या शिवेसना की ओर प्रयाण करना होगा।

हरियाणा में आईएनएलडी बंट चुकी है। दुष्यंत चौटाला जननायक जनता पार्टी बनाकर चुनाव में मैदान में उतरे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने रैली कर पार्टी नेतृत्व की आलोचना करते हुए यहां तक कह दिया कि यह पहले वाली कांग्रेस नहीं है। पार्टी में चुनाव पूर्व एकता कायम करना कठिन दिख रहा है।

सच यह है कि 2014 के आम चुनाव से जातीय एवं सांप्रदायिक समीकरणों को धक्का लगना आरंभ हुआ और वह प्रक्रिया पीछे नहीं लौटी है। ऐसा नहीं है कि इन प्रदेशों में समस्याएं नहीं हैं या सरकारों के खिलाफ मुद्दे नहीं हैं। किंतु राष्ट्रीय स्तर पर मोदी और शाह की लोकप्रियता, प्रदेशों में फडणवीस तथा मनोहर लाल की स्वच्छ छवि तथा देश एवं प्रदेश दोनों में हताश विपक्ष उन मुद्दों को उस सीमा तक ले जाने में सक्षम नहीं है कि वह दोनों सरकारों को कटघरे में खड़ा कर सके। और फिर हिंदुत्व और राष्ट्रीयता दोनों का माहौल है, जिनसे वहां चुनाव प्रभावित नहीं होगा, यह नहीं माना जा सकता।     

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