आप को कम मत आंकिए!

सुरेंद्र कुमार Updated Fri, 24 Jan 2014 07:53 PM IST
Don't underestimate AAP!
अपने विरोधियों पर दबाव बनाने के लिए आम लोगों के इस्तेमाल की कला में आम आदमी पार्टी को महारत हासिल है। उसके पागलपन का भी एक तरीका है। यह उस मीडिया का इस्तेमाल करने में भी अव्वल है, जो उसके नेताओं की हर गतिविधि को खबर बनाता है, वह हर घंटे अपनी बयानबाजी के जरिये खबरिया चैनलों को खुराक मुहैया कराती है। उसे प्रचार के लिए भारी खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ती, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उसकी हर गतिविधि दिखाकर मुफ्त में ही उसका प्रचार करता है। गैर पारंपरिक और कभी-कभी असांविधानिक तरीका अपनाकर वह न सिर्फ भीड़ को, बल्कि मीडिया को भी अपनी ओर आकर्षित करती है। इस तरह वह स्तब्ध, दिशाहीन, बेखबर और असहाय दिख रही केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार पर दबाव बनाने में पूरी तरह सक्षम है!

हैरानी यह है कि इसके बाद भी अरविंद केजरीवाल यह कहते हैं कि मेरी औकात क्या है, मैं तो एक आम आदमी हूं। जबकि वह जबर्दस्त महत्वाकांक्षा के मारे हैं। दिल्ली में आप के प्रदर्शन से चकित-उत्साहित लोगों, खासकर शहरी शिक्षित युवाओं का उसकी तरफ भारी झुकाव हुआ है। इससे केजरीवाल और उनके साथियों ने यह समझ लिया है कि वे न सिर्फ नरेंद्र मोदी के रथ को दिल्ली पहुंचने से रोक सकते हैं, बल्कि नकारा मनमोहन सिंह सरकार की लोकलुभावन घोषणाओं को भी बेअसर करने के साथ-साथ राहुल गांधी की युवा अपील पर भी झाड़ू फेर सकते हैं।

यह तथ्य है कि नए चेहरों को आकर्षित करने के मामले में आज नरेंद्र मोदी भी केजरीवाल का मुकाबला नहीं कर सकते। मोदी को उस भाजपा का समर्थन हासिल है, जिसने न केवल केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार का नेतृत्व किया है, बल्कि आज भी देश के आधे दर्जन राज्यों में उसकी सरकार है। भाजपा को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुशासित कैडर का समर्थन है, वस्तुतः वे ही भाजपा के प्रचार अभियान की धुरी हैं। मोदी की बड़ी रैलियों पर बहुत पैसा खर्च होता है। जबकि केजरीवाल के समर्थक मिनटों में कहीं भी हजारों की तादाद में बिना किसी तामझाम के सड़कों पर उतर आते हैं, और बारिश और ठंड में भी टिके रहते हैं। सड़कों पर उतरने वाले लोग ही केजरीवाल के सबसे शक्तिशाली हथियार हैं। उन्हीं के बल पर वह खुलेआम कैमरे पर यह कह सके कि अगर हमारी मांगें नहीं मानी गईं, तो हम राजपथ को लाखों लोगों से भर देंगे, इस बार गणतंत्र दिवस परेड आम आदमी की होगी!

आम जनता स्वघोषित अराजकतावादी का समर्थन क्यों कर रही है? वह उसके खेल को समझ क्यों नहीं पा रही? क्या वह नहीं समझती कि आप सड़कों पर उसकी संख्या बल का उपयोग संसद में अपनी संख्या बल बढ़ाने के लिए कर रही है? आप का जन्म कहां से और क्यों हुआ? उसे कौन समर्थन दे रहा है? यह लोकतंत्र को मजबूत बना रही है या अराजकता को बढ़ावा दे रही है?

आप वस्तुतः कांग्रेस और भाजपा की संतान है। दोनों राष्ट्रीय दलों के प्रति लोगों के गुस्से, कड़वाहट, हताशा और घृणा ने इसे पैदा किया है। इसमें अन्ना हजारे ने अनजाने में ही दाई का काम किया। जिस तरह बच्चे के जन्म के बाद दाई की कोई जरूरत नहीं होती, उसी तरह आप को भी अब अन्ना हजारे की जरूरत नहीं रही। भले ही भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन शुरू में लोगों को एकजुट करने का स्थल था, पर आप के प्रति समर्थन में तेजी कुशासन के खिलाफ जन प्रतिरोध से आई, जिसके लिए उसने भाजपा एवं कांग्रेस, दोनों को जिम्मेदार बताया। सड़कों पर भीड़ खड़ी कर देने में माहिर केजरीवाल ने 1968 के फ्रांस के जनप्रतिरोध की याद दिला दी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वह कुछ बेहतर कर पाने में सक्षम हैं। यह तो वक्त ही बताएगा, पर फिलहाल दूसरी राजनीतिक पार्टियों में भी उम्मीदवारों के चयन में जनता से राय लेना और दिल्ली से बाहर भी बिजली की दर कम करने का सिलसिला शुरू हो गया है। यह आप का ही असर है।

कार्यालय नहीं जाना, रेल भवन के नजदीक धरना देना, सड़क पर सोना और पुलिस एवं आप समर्थकों की भिड़ंत से अविचलित रहना टेलीविजन ब्रेकिंग न्यूज के लिए अचूक नुस्खे हैं। अगर हजारों शांतिप्रिय नागरिकों को इससे असुविधा होती है, अनेक लोग दफ्तर नहीं पहुंच पाते, अभ्यर्थी नौकरी के लिए इंटरव्यू देने नहीं जा पाते, तो भी इसे जारी रखें! भले ही ये चौतरफा बर्बादी के सूचक हों। यदि इससे एक अराजक मुख्यमंत्री की छवि बनती है, तो क्या फर्क पड़ता है! सच्चाई यह है कि वह सही हैं, बाकी सब गलत! रेल भवन पर धरने के ड्रामे में जीत का दावा खोखला है। अगर आप का आत्मधर्मी और अभिमानी तरीका जारी रहा, तो न केवल उसका बढ़ता हुआ समर्थन घट जाएगा, बल्कि इसका भी वही हाल होगा, जो अन्ना हजारे के आंदोलन का हुआ।

आप कांग्रेस एवं भाजपा की छोड़ी हुई राजनीतिक जमीन भरने का काम कर रही है। अगर ये दोनों पार्टियां अपनी जमीन फिर हासिल कर लेती हैं, तो आप का जनाधार सिकुड़ जाएगा। इस समय ये दोनों पार्टियां इसकी देशव्यापी अपील को कम करके आंक रही हैं, पर बाद में वे पछताएंगी। क्या यह संभव नहीं कि कांग्रेस और भाजपा मिलकर आप को हाशिये पर ला दे? हालांकि यह दूर की कौड़ी है, लेकिन यदि जवाहरलाल नेहरू अपने मंत्रिमंडल में श्यामा प्रसाद मुखर्जी और भीमराव अंबेडकर को शामिल कर सकते थे, तो नरेंद्र मोदी या राहुल गांधी के मंत्रिमंडल में कांग्रेस या भाजपा शामिल क्यों नहीं हो सकती! वस्तुतः भारतीय राजनीति जिस अराजक मोड़ पर खड़ी है, उसमें राष्ट्रीय एकता वाली सरकार की सख्त जरूरत है।

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