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अपराध को धार्मिक चश्मे से न देखें : हिंसा को बढ़ावा देने वाला माहौल जोर पकड़ रहा है

Fri, 05 Jul 2019 01:11 AM IST
Raman Singh सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली Published by: Raman Singh Updated Fri, 05 Jul 2019 01:11 AM IST
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Do not see crime with religious spectacles
सांकेतिक तस्वीर

पिछले एक महीने में देश के तमाम हिस्सों में और खास तौर से उत्तर भारत में, और उसमें भी खासकर उत्तर प्रदेश में बलात्कार की अनगिनत घटनाएं घटी हैं। लगता है कि अब कुछ भी पढ़ें, कुछ भी सुनें, इसका असर पड़ेगा ही नहीं, पर दूसरे दिन कोई नई घटना घटती है और नए सिरे से दिल पर असर पड़ने लगता है। लोग सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं कि यह क्यों हो रहा है?


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पिछले एक महीने में देश के तमाम हिस्सों में और खास तौर से उत्तर भारत में, और उसमें भी खासकर उत्तर प्रदेश में बलात्कार की अनगिनत घटनाएं घटी हैं। लगता है कि अब कुछ भी पढ़ें, कुछ भी सुनें, इसका असर पड़ेगा ही नहीं, पर दूसरे दिन कोई नई घटना घटती है और नए सिरे से दिल पर असर पड़ने लगता है। लोग सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं कि यह क्यों हो रहा है?

समाज में लोगों का मन क्यों और कैसे बढ़ रहा है? हिंसा को बढ़ावा देने वाला माहौल जोर पकड़ रहा है। कानून के हाथ भी कुछ शिथिल पड़ने लगे हैं या यों कहिए कि कुछ को दबोचने के लिए बढ़ते हैं और कुछ को बचाने के लिए। इन घटनाओं का विरोध भी अक्सर सांप्रदायिक चश्मे को लगाकर होता है। बहुत सारे सवाल हैं;  जवाब भी बहुत हैं और नए जवाबों की खोज भी बहुत है।

इस पूरी चर्चा, बहस और मंथन के बीच अचानक एक शिक्षिका के एक फेसबुक पोस्ट ने परेशान किया, जिसमें मुस्लिम महिलाओं के बारे में बेहद आपत्तिजनक बातें लिखी हुई थीं। यह पोस्ट भाजपा की नेता सुनीता सिंह का था। मैंने इसे दो बार पढ़ा और पता चला कि यह फेक नहीं है। मेरे दिमाग में तमाम ख्याल आपस में टकरा रहे थे। बच्चियों, लड़कियों और महिलाओं पर इसका क्या असर पड़ेगा?

जिन बच्चों को यह महिला पढ़ाती हैं, उनसे कैसी बातें करती होंगी और उन बातों का उन बच्चों पर क्या असर पड़ता होगा? वह पोस्ट मैंने उत्तर प्रदेश पुलिस की एडीजी (महिला) के पास भेजा और उसके बाद कुशीनगर जिले की पुलिस ने जांच के आदेश दे दिए। वह महिला कुशीनगर की, जिसका संबंध गौतम बुद्ध के साथ सदियों से बना हुआ है, रहने वाली थी। अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति, उत्तर प्रदेश, ने महामहिम और प्रमुख सचिव को ज्ञापन भी दिया और पोस्ट लिखने वाली महिला की गिरफ्तारी की मांग की।

कार्रवाई के नाम पर बस इतना हुआ कि भाजपा ने उस महिला को पार्टी से निकाल दिया। पर जांच का क्या हो रहा है? कुछ नहीं। हाल के दिनों में अनेक लोगों को बहुत मामूली पोस्ट के लिए जेल भेजा जा चुका है। उन्हें तीन महीने से अधिक जेल में बंद करके रखा भी गया है। पर इस महिला के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई।

शायद होगी भी नहीं। इस तरह की सोच का संदर्भ है। हिंदू महासभा के संस्थापक सावरकर ने अपनी पुस्तक, भारतीय इतिहास के छह गौरवशाली युग में शिकायती अंदाज में लिखा है कि हिंदुओं ने कभी मुस्लिम महिलाओं के साथ बलात्कार नहीं किया-ऐसी बात इतिहास की सच्चाइयों से परे है-लेकिन उनको ऐसा करना चाहिए, ताक ि उनकी अपनी महिलाएं सुरक्षित रहें।

ऐसा नहीं कि किसी एक धर्म के लोग ही बलात्कार करते हैं। ऐसा भी नहीं कि बलात्कारी बलात्कार से पहले शिकार होने वाली के धर्म का पता लगाता है। फिर भी इस जुर्म की परिभाषा अक्सर धर्म के आधार पर की जाती है और उसे जुर्म की श्रेणी से हटाकर धार्मिक कर्तव्य और बहादुरी की श्रेणी में पहुंचा दिया जाता है। बलात्कार की किसी भी घटना को जुर्म के अलावा किसी दूसरे रूप में देखना केवल न्याय की प्रक्रिया से पीड़ित पक्ष को वंचित ही नहीं रखता, बल्कि बलात्कारी के हौसलों को बुलंद कर उसे और भी जुर्म करने के लिए प्रेरित करता है।

सुनीता सिंह की निंदा इसलिए की जा रही है कि उसने मुस्लिम महिलाओं की असुरक्षा बढ़ाने का काम किया है। उसे सख्त से सख्त सजा इसलिए दी जानी चाहिए, क्योंकि वह अपने ही समुदाय में बलात्कारियों को पैदा और प्रेरित कर रही है और, ऐसा करके वह तमाम महिलाओं की असुरक्षा बढ़ाने का काम कर रही है।

-लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं।
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