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कोई उम्मीद नजर नहीं आती

shyoraj singh bechan श्योराज सिंह बेचैन
Updated Fri, 29 Mar 2013 11:13 PM IST
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do not see any hope in up

उत्तर प्रदेश का हालिया घटनाक्रम निराशाजनक ही ज्यादा है। सत्ताधारी सपा के सर्वेसर्वा मुलायम सिंह यादव भले ही कांग्रेस पर दबाव बना रहे हों, वह उत्तर प्रदेश की बिगड़ती कानून-व्यवस्था के बारे में मुख्यमंत्री से नाराजगी भी जता रहे हों, लेकिन राज्य के हालात सुधर नहीं रहे। प्रांत में खास के साथ कानून है, सुरक्षा बल है, परंतु आम आदमी के पक्ष में कोई नहीं है। राज्य में अपराध बढ़ने का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि इसी विषय पर गाजियाबाद नाम से एक फिल्म बनी है!


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लोकतांत्रिक सरकारों को बिना किसी भेदभाव के हर खास और आम को सुरक्षा की गारंटी देनी पड़ती है। लेकिन उत्तर प्रदेश में ऐसा नहीं हो पा रहा। कुंडा में एक पुलिस अधिकारी जियाउल हक की हत्या की घटना एक बड़ी साजिश की ओर इशारा कर रही है। अगर प्रशासनिक अधिकारियों की सुरक्षा नहीं की गई, तो कानून का राज अपना वजूद खो देगा। शाही इमाम मौलाना अहमद बुखारी की यह टिप्पणी सियासी बयान भर नहीं है कि मायावती सरकार के दौर में सुरक्षा व्यवस्था इससे बेहतर थी।

बसपा के दौर में अपराधियों पर अंकुश लग गया था। एक बड़ा फर्क यह भी था कि मायावती तुलनात्मक तौर पर त्वरित कार्रवाई करती थीं। खुद महिला होने के कारण महिलाओं और बच्चों की वेदना वह महसूस करती थीं। चूंकि वह समाज के निचले वर्ग से मुख्यमंत्री पद तक पहुंची थीं, शायद इसलिए उनके सत्ता में रहने से दलित, मुस्लिम, महिलाओं और कमजोर वर्गों के हौसले बुलंद रहते थे। उनके कार्यकाल में समाज का निर्बल वर्ग थाने में अपनी फरियाद कर सकता था।

लेकिन अब राज्य में अव्यवस्था का अंधेरा इतना गहराता जा रहा है कि डर लगने लगा है। अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष एवं कांग्रेस सांसद पीएल पूनिया को भी कहना पड़ा है कि प्रदेश में लोग सुरक्षित नहीं हैं। अखिलेश सरकार दलितों के साथ भेदभाव कर रही है। पहले तरक्की में आरक्षण का विरोध किया गया। फिर अन्य पिछड़ी जातियों को दलितों का आरक्षण लेने के लिए प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया।

मंडल आयुक्त, जिलाधिकारी, पुलिस कप्तान, डीआईजी, आईजी, विकास प्राधिकरणों के उपाध्यक्ष, सीडीओ, नगर निगम के आयुक्त जैसे प्रशासन के महत्वपूर्ण पदों पर बिरला ही कोई दलित होगा। सपा सरकार ने पीसीएस से आईएएस कैडर में हुई तरक्की के मामले में भी दलित अधिकारियों से भेदभाव किया। पुलिस थानों में यादव थानेदारों की भरमार कर दी गई है, जबकि दलित थानेदारों को पीएससी में भेज दिया गया है।

राज्य में आम दलितों की क्या स्थिति है, इसका जायजा संभल जिले की गुन्नौर तहसील के नदरोली गांव ले लिया जा सकता है। गुन्नौर तहसील में चोरी, लूट और हत्या के मामले बहुत अधिक हैं और यहां की गैर यादव जातियां भय और आतंक के साये में रहती हैं। नदरोली हमेशा से पिछड़ा गांव नहीं है। इस गांव में शिक्षकों एवं लेखपालों की संख्या बहुत अधिक है।

गांधी जी के जेल सत्याग्रह में भाग लेने वाले रघुनाथ शास्त्री और यदुनाथ शास्त्री इसी गांव के थे। वे दोनों भाई अस्पृश्यता और जातिभेद के खिलाफ ताउम्र गांधीवादी ढंग से काम करते रहे। आज उसी गांव में सपा सरकार की मामूली आलोचना करने पर एक दलित युवक को जान गंवानी पड़ती है। विडंबना यह है कि गांव में अगर सत्ता से जुड़े दबंगों का आतंक है, तो थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए रुपये मांगे जाते हैं।

कुंडा के मरहूम डीएसपी की पत्नी की मांगें राज्य सरकार ने इसलिए मानीं कि वह उस अल्पसंख्यक समाज से जुड़ी हैं, जिसका साथ सपा को चाहिए। लेकिन ऐसी दरियादिली रामपाल की विधवा सोमवती के प्रति नहीं दिखाई गई, क्योंकि एक तो वह पढ़ी-लिखी नहीं है, दूसरे उसके समाज के वोटों की जरूरत सपा को नहीं है। सपा और कांग्रेस के रिश्ते में खटास भले ही दिखती हो, लेकिन यह नहीं मान सकते कि सपा सरकार के निराशाजनक कामकाज को देखते हुए केंद्र सरकार किसी तरह का दबाव बनाएगी, क्योंकि उसे अगले लोकसभा चुनाव तक सपा का समर्थन चाहिए। ऐसे में, दलितों की स्थिति फिलहाल नहीं बदलने वाली।

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