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पिछड़ी सोच को तलाक दो
कुमार प्रशांत
Updated Mon, 17 Oct 2016 07:34 PM IST
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कुमार प्रशांत
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ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, कई मुस्लिम संगठन व कितने ही मुल्ला-मौलवी चीख-चिल्ला रहे हैं कि 'तीन तलाक’ शरिया कानून का हिस्सा है और हम इससे खेलने की इजाजत किसी को नहीं दे सकते! ये इस तेवर में बात कर रहे हैं, मानो देश में न कोई सरकार है, न कानून, न अदालत और न समाज! मैं ऐसा लिख रहा हूं और ठिठक भी रहा हूं, क्योंकि यदि इनमें से कोई मुझसे यही पूछ बैठे कि इस देश में कौन, किससे, कहां क्रिकेट खेलेगा, यह उद्धव ठाकरे की शिवसेना तय कर सकती है, तो हम क्यों नहीं कर सकते, तो मैं जवाब नहीं दे पाऊंगा।
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‘तीन तलाक’ के बारे में सरकार ने अदालत में अपनी राय रखकर कुछ भी गलत नहीं किया है। लोकतंत्र ऐसा विधान है, जिसमें हर सवाल पर बात हो सकती है और किसी भी विवाद में सरकार या अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने यह मूर्खतापूर्ण बात की है कि इस पर जनमत संग्रह करवाया जाए! वह चुनौती दे रहा है कि नब्बे फीसदी महिलाएं शरिया कानून के पक्ष में होंगी! होंगी, हो सकती हैं, लेकिन इससे तीन तलाक सही कैसे साबित होता है? जाति, छुआछूत, ऑनर किलिंग आदि सामाजिक कुरीतियों पर अगर जनमत संग्रह करवाया जाए, तो देश का आईन बदलना पड़ेगा!
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तलाक एक जरूरी सामाजिक व्यवस्था है। स्त्री-पुरुष के बीच के संबंध जब अर्थहीन हो जाएं, तब वैसे संबंध से मुक्ति मनुष्यता के विकास में अगला कदम है। पर तलाक की व्यवस्था ऐसी भी नहीं बनाई जा सकती, जिसका पलड़ा किसी एक के पक्ष में इतना झुका रहे कि वह उसे दमन के हथियार के रूप में इस्तेमाल करे। यदि वैवाहिक जीवन में ऐसी स्थिति बने कि कोई किसी को व्यक्तित्वहीन जीने को मजबूर करे, तो यह निजी धार्मिक मान्यताओं से निकल कर राष्ट्रीय सवाल बन जाता है। ऐसे में संविधान देखेंगे, जो बताता है कि लोकतंत्र का धर्म क्या है। हम उससे असहमत हो सकते हैं, फिर भी उसे तब तक मानना ही होगा, जब तक उससे बेहतर कुछ गढ़ नहीं लेते।
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तीन तलाक की व्यवस्था आज के भारतीय समाज के साथ कदमताल नहीं कर सकती, जैसे सैकड़ों शादियां करने वाला राजवंश आज के समाज में जी नहीं सकता। आज के समाज में सती-प्रथा नहीं चल सकती, दलितों को दोयम दर्जे का बताना नहीं चल सकता, वैसे ही तीन तलाक की व्यवस्था नहीं चल सकती। मुस्लिम समाज में आधुनिक सोच वाले लोग इसे पसंद नहीं करते, जागरूक मुस्लिम महिलाएं इसका विरोध करती हैं और अपने देश-समाज से पूछती हैं कि हमारे लिए आपने क्या व्यवस्था बनाई है। इसका एक ही जवाब हो सकता है कि हमारे धार्मिक विश्वास, सामाजिक रीति-रिवाज चाहे जितने अलग हों, जब सवाल नागरिक की हैसियत का उठेगा, तब धर्म, जाति, संप्रदाय और लिंग का भेद नहीं होगा। नागरिकता के संदर्भ में सारे देश में सबको शरीक करने वाला एक ही संविधान चलेगा।
अदालत में अपना पक्ष रखने के बाद सरकार को न कुछ कहना चाहिए, न करना चाहिए। तीन तलाक के बारे में पूरे देश में लंबा, गहन विमर्श सारे देश में चले। फिर अदालत भी अपनी राय कहे। फिर देखें कि समाज कहां पहुंचता है। यह मुस्लिम समाज के रहनुमाओं के आगे आने की घड़ी है। उन्हें यह कहना ही होगा कि हर पिछड़ी सोच को तलाक दो! करीब दो दर्जन इस्लामी देशों में तीन तलाक की स्वीकृति नहीं है और वहां मुसलमान और शरिया सब सलामत हैं। मतलब सीधा है-खोट मन में है, जिससे तलाक लेना जरूरी है।