फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Engineer, who repair system

तंत्र सुधारने वाला इंजीनियर

Mon, 18 Mar 2019 07:15 PM IST
rajeev chandrashekhar राजीव चंद्रशेखर
Updated Mon, 18 Mar 2019 07:15 PM IST
विज्ञापन
Engineer, who repair system
मनोहर परिकर

मनोहर परिकर के निधन की खबर बहुत ही दुखदायी है, हालांकि मुझे इसकी आशंका जरूर थी। वह पिछले कुछ महीनों से बीमार थे, लेकिन अपने इस कष्टपूर्ण समय में भी वह गरिमामय एवं साहसी बने रहे। कुछ सप्ताह पहले ही, पिछले महीने फरवरी में मैं मनोहर परिकर से अंतिम बार मिला था। उनसे उस आखिरी मुलाकात की याद मेरे जेहन में ताउम्र रहेगी। आईआईटी से इंजीनियर परिकर भाजपा के उन चुनिंदा नेताओं में से थे, जिन्होंने प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी के नाम की अनुशंसा की थी। मैं उनसे पहली बार दिल्ली में मिला और मुझे याद है कि उनसे मेरी वह मुलाकात मेरे मस्तिष्क पटल पर बहुत बड़ा प्रभाव छोड़ गई। वह एक ऐसे राजनेता थे, जिनमें किसी भी प्रकार का दंभ नहीं था। वह हमेशा ही साधारण, लेकिन स्पष्ट वक्ता रहे।


loader

जब मनोहर परिकर रक्षा मंत्री बने, तब वह रक्षा मंत्रालय के लिए एक नई उम्मीद बनकर आए थे। वह सेना में कार्यरत हमारे सैनिकों एवं उनके परिवार के कल्याण के लिए बहुत चिंतित थे। मुझे इतना अवश्य पता था कि मुझे इन कामों के लिए उन्हें कुछ समझाने की आवश्यकता नहीं है। वह संवेदनहीन एवं उदासीन नौकरशाही को सही करने के तरीके ढूंढ रहे थे, जिसने यूपीए सरकार के दौरान अपनी विस्तृत जड़ें फैला ली थीं। उन्होंने बिना किसी झिझक एवं नौकरशाहों के सहयोग के बगैर सीधे ही वृद्ध सैनिकों एवं उनके परिवारों से मुलाकात की, एवं उनकी समस्याएं और सुझाव सुने। वृद्ध एवं विकलांग सैनिकों को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है, उनके समाधान के लिए उन्होंने विशेषज्ञों द्वारा सुझाव देने हेतु एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया।

वयोवृद्ध सैनिकों एवं सेना के लोगों के लिए 'वन रैंक-वन पेंशन' बहुत दिनों से अटका हुआ मुद्दा था। वर्ष 2006 में सांसद बनने के बाद मैंने तुरंत ही इस मुददे पर काम करना शुरू कर दिया था। उन लोगों के लिए यह बहुत संवेदनशील मुद्दा था, जिन्होंने सशस्त्र सेना में काम किया था। मनोहर परिकर ने घंटों-घंटे समय बिताकर अकेले अपने बूते पर इस समस्या की विस्तृत जानकारी एवं आंकड़े लेकर इसे आगे बढ़ाया। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि प्रधानमंत्री के त्वरित एवं दृढ़ सहयोग से सरकार को करीब 40,000 करोड़ रुपये का खर्च आएगा।

दूसरी बार मुझे तब आश्चर्य हुआ, जब मैंने प्राइवेट मेंबर्स बिल के रूप में नेशनल आर्म्ड फोर्सेस कोवनेंट बिल संसद में पेश किया। यह वह बिल था, जो सुनिश्चित करता था कि युद्ध के दौरान मारे गए सैनिकों के परिवारों एवं वयोवृद्ध सैनिकों की देखभाल का दायित्व सरकार पर होगा। संसद में कनिष्ठ मंत्री के दिखाने पर प्राइवेट मेंबर्स बिल पर चर्चा होती है। लेकिन तीनों मौकों पर मेरे इस बिल पर परिकर जी ने स्वयं अपना सहयोग दिया, क्योंकि वह इस बिल से पूरी तरह सहमत थे।

मैं बीमारी के समय उनके हालचाल पूछता रहा और प्रार्थना भी करता रहा। विगत फरवरी में मैं उनसे मिल आया, जो मेरी उनसे आखिरी मुलाकात साबित हुई। मैं उनसे बहुत सारी बातें कहना चाहता था, जो उन्होंने रक्षा मंत्री बनने के बाद शुरू की थीं और जो आज संभव हो पाई हैं। जैसे कि मैं उन्हें बताना चाहता था कि वृद्ध एवं विकलांग सैनिकों के मुद्दों का समाधान करने के लिए उन्होंने जो कमेटी बनाई थी, उसकी सिफारिश लागू हो गई है। इस देश ने 70 साल से जिस राष्ट्रीय युद्ध स्मारक का इंतजार किया था, और उन्होंने एवं प्रधानमंत्री ने जिस स्मारक की कल्पना की थी, अंततः उसका उद्घाटन होने वाला था। मैंने यह सब उनसे कहा। इसके जवाब में उन्होंने अपना सिर हिलाया। बीमारी से जूझते हुए मैं उनके धैर्य, साहस एवं दृढ़ संकल्प से कार्यरत होने के अद्भुत गुण की सराहना करता हूं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed