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त्वरित न्याय की मुश्किलें

Fri, 15 Mar 2013 09:34 PM IST
Updated Fri, 15 Mar 2013 09:34 PM IST
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difficulties of speedy justice

हम त्वरित संचार के युग में जी रहे हैं। पिछले पांच वर्षों के दौरान सोशल नेटवर्किंग साइट के साथ लगभग हर किसी के पास इंटरनेट फोन या कंप्यूटर आया है, जिसके जरिये वह अपने अच्छे-बुरे विचारों को साइबर जगत में फैला सकता है। अगर इस क्षेत्र का कोई विशेषज्ञ हमें बता सकता कि इसने हमारे जीवन को किस कदर बदला है, तो काफी दिलचस्प होता।

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मैं सोशल मीडिया की शक्ति से वाकिफ हूं, लेकिन इसके 'दबाव' से निपटने की क्षमता का अभाव है। जाहिर है, यह देश की उस युवा पीढ़ी के लिए ही ज्यादा है, जो सिर झुकाए हुए लगातार अपने मोबाइल, टैबलेट और लैपटॉप पर व्यस्त है।
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हम अक्सर टेलीविजन चैनलों की आलोचना करते हैं, क्योंकि वे एक से दूसरे विषय पर कूदते रहते हैं और कोई भी मुद्दा वहां ज्यादा दिनों तक नहीं टिकता। टेलीविजन के ब्रेकिंग न्यूज से इस तरह की गलत धारणा बन रही है कि हमारा जीवन हर कदम पर असुरक्षित है। दरअसल सामान्य जीवन और तेज गति वाली प्रौद्योगिकी में तालमेल संभव नहीं है।
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पिछले कुछ दिनों से मैं बलात्कार-विरोधी कानून को लेकर गृह एवं कानून मंत्रालय के मतभेदों पर टीवी पर बहस देख रहा हूं। यह बिल्कुल बकवास है। क्या केंद्रीय कैबिनेट के मंत्रियों के बीच वैचारिक आदान-प्रदान को, जो लोकतंत्र का एक अनिवार्य हिस्सा है, छोड़ा जा सकता है?

अगर हम कुछ लोगों द्वारा व्यक्त विचारों के आधार पर त्वरित न्याय चाहते हैं, तो बदले की भावना से दायर होने वाले लाखों मुकदमों को निपटाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की तादाद भी बढ़ानी होगी। ऐसे में कानून के दुरुपयोग से इनकार नहीं किया जा सकता। यह अच्छी बात है कि केंद्रीय कैबिनेट में कई प्रतिष्ठित वकील हैं। इसलिए हमें कोई फैसला लेने से पहले सभी दमदार तर्कों पर विचार करना चाहिए।

हमारे पास त्रासद घटनाओं की एक लंबी सूची है और मीडिया की शक्ति एवं पहुंच बढ़ने के साथ लोगों की समझ भी बढ़ी है। निर्भया के सामूहिक बलात्कार एवं बर्बर हत्या की घटना के बाद महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध का मुद्दा सुर्खियों में है और इस मामले में सुधारात्मक कदम उठाए जाने जरूरी हैं, लेकिन इसका त्वरित इलाज नहीं है।

कठोर कानून क्या किसी मुद्दे के दुरुपयोग पर रोक लगा पाएगा? निर्भया के मामले के बाद महिलाओं के खिलाफ अपराध एवं बलात्कार के मामलों में बढ़ोतरी हुई हैं। क्या वाकई हमारे रोजमर्रा के जीवन में कुछ बदला है? बदलाव आएगा, लेकिन तब तक नहीं, जब तक हमारे घरों में भेदभावपूर्ण मानसिकता बरकरार रहेगी। चूंकि यह एक भावनात्मक मुद्दा है, इसलिए जनाक्रोश के डर से अभी कोई कुछ नहीं बोल रहा, लेकिन लोगों की मानसिकता नहीं बदली है।

हमने देखा ही है कि एक मुद्दा कैसे दूसरे में परिणत हो जाता है। अब निर्भया त्रासदी के मुख्य आरोपी रामसिंह की मौत को लीजिए। इस घटना ने जेलों की स्थितियों और उसके अंदर की सैकड़ों भयावह कहानियों को उजागर कर दिया है। बेशक इसकी जांच होगी, पर मुझे हैरानी होगी, अगर इससे वाकई कुछ बदलेगा।

छह हजार कैदियों की क्षमतावाली इस जेल में बारह हजार से ज्यादा कैदी हैं। इनमें ज्यादातर संख्या वैसे विचाराधीन कैदियों की है, जो गरीबी के कारण किसी तरह की कानूनी सहायता हासिल करने व मुचलका भरने में असमर्थ हैं। यह समस्या वर्षों से है, जो लगातार गंभीर होती जा रही है।

सात सिपाहियों द्वारा तरनतारन में एक युवा महिला की पिटाई की चौंकाने वाली घटना हमने देखी ही है। सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में केंद्र एवं राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है, लेकिन इससे भला क्या हासिल हो जाएगा! उस युवा महिला ने विरोध दर्ज कराने के लिए राज्य विधानसभा में हंगामा मचा दिया। इन उपायों के जरिये अपनी निराशा और हताशा की अभिव्यक्ति बताती है कि आम आदमी कानून का राज चाहता है।

कानून के राज की बहाली अहम है। इस मुश्किल समय में बड़ी अदालतों को निर्णायक भूमिका निभानी होगी। हर क्षेत्र में अच्छाई एवं बुराई होती है और हम जानते हैं कि निचली अदालतों में समस्याएं हैं। एक हालिया तथ्य बताता है कि निचली अदालतों में मुकदमों की संख्या घटी है, क्योंकि लोगों का विश्वास कम हो गया है, जबकि सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालयों में मुकदमों की संख्या बढ़ी है।

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के जज बीएस चौहान ने गाजियाबाद में नए सीबीआई कोर्ट परिसर के उद्घाटन के मौके पर न्यायिक अधिकारियों को संबोधित करते हुए 'देर से मिलने वाले न्याय' के बारे में बताया। लेकिन एक उदाहरण जो उन्होंने दिया, वह काफी परेशान करने वाला है कि सुप्रीम कोर्ट में अब भी पोटा के तहत उन लोगों की याचिकाओं पर सुनवाई चल रही थी, जिन्हें 22 वर्ष पूर्व दोषी करार दिया गया था।

इसका मतलब यह कि वे अब भी जेल में हैं। कई आतंकी मामलों में हमने यह देखा है, जब निर्दोषों को मालेगांव, पुणे और बंगलूरू में महीनों एवं वर्षों के लिए जेलों में ठूंस दिया गया। इन गंभीर चूकों के लिए कौन जिम्मेदार है, जिसने सैकड़ों परिवारों की खुशियां छीन लीं। क्या किसी पुलिस या न्यायिक अधिकारी को इसके लिए पकड़ा गया?


बेशक हमारे यहां कानून का राज है, लेकिन शासन के सभी अंगों की तरह यह भी समय से काफी पीछे है। हम किसी चमत्कारी इलाज की उम्मीद नहीं कर सकते, क्योंकि वह होता नहीं है। इसका भावी समाधान न्यायपालिका में सुधार से ही संभव है।

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