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अर्द्धसैनिक बल और सेना में फर्क
शिवदान सिंह
Updated Mon, 23 Jan 2017 07:23 PM IST
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शिवदान सिंह
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पहले सोशल मीडिया पर सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के जवान तेज प्रताप द्वारा खराब खाने की शिकायत सामने आई। इस पर चर्चा चल ही रही थी कि बिहार में सीआईएसएफ के जवान बलवीर सिंह द्वारा अपने चार साथियों की हत्या कर दिए जाने की खबर आ गई। इसके बाद तो सेना और अर्द्ध सैनिक बलों को दिए वाले भोजन से लेकर उनकी कार्यप्रणाली को लेकर हर कोई अपनी राय रखने लगा। मगर वास्तव में वहां होता क्या है?
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सबसे पहली बात तो यही है कि सेना और अर्द्ध सैनिक बलों में काफी अंतर होता है, जो सामान्य तौर पर लोग नहीं जानते। अर्द्धसैनिक बलों के मनोबल पर ज्यादा तैनाती तथा आतंक-विरोधी अभियानों के तनाव के कारण प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। इस तथ्य को उजागर करने के लिए आंकड़े मौजूद हैं। बीएसएफ में पिछले वर्ष नौ महीनों के दौरान 3,000 से ज्यादा जवानों ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) ली है। कई जवान बिना सूचना घर चले गए। गत वर्ष ही 293 जवानों ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया तथा 59 जवानों को अनुशासनहीनता या संदिग्ध गतिविधियों की वजह से कार्यमुक्त कर दिया गया। सीआरपीएफ में 2013 में 3,519 जवानों ने वीआरएस लिया तथा 600 से ज्यादा ने इस्तीफा दिया था। इसी साल में बीएसएफ में 3,475 जवानों ने वीआरएस लिया तथा 502 ने इस्तीफा दे दिया। आइटीबीपी में 282 ने वीआरएस लिया, 121 ने इस्तीफा दिया तथा सीआईएसएफ में 676 ने इस्तीफा दिया तथा 930 ने वीआरएस लिया। इस प्रकार वर्ष 2009 से 2012 के बीच करीब 44 हजार जवानों ने अर्द्धसैनिक बलों की नौकरी छोड़ी। इसका मुख्य कारण अशांत तथा माओवादी हिंसा से प्रभावित इलाकों लंबी तैनाती बताई जा रही है। ये हालात अर्द्धसैनिक बलों के कैडर के रखरखाव की स्थिति दर्शाते हैं।
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पिछले लंबे समय से घुसपैठ की समस्या से ग्रस्त बांग्लादेश से लगती सीमाओं की सुरक्षा तथा चौकसी की जिम्मेदारी देश के सबसे बड़े अर्द्धसैनिक बल बीएसएफ की है। पठानकोट हमले के लिए पाकिस्तान के आतंकवादी भी उसी सीमा से अंदर आए बताए जा रहे हैं, जहां पर बीएसएफ तैनात है। पठानकोट हमले के फौरन बाद इसी बल के पठानकोट से लगते कठुआ में तैनात कमांडेंट स्तर के अधिकारी के विरुद्ध इसी कारण अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की गई। दूसरी तरफ नक्सली हमले में सीआरपीएफ ने भी अपने काफी जवान खोए हैं, जिसमें दंतेवाड़ा में 2010 में इस बल के 76 जवान मारे गए थे। इसके अलावा कश्मीर के बांदीपुरा में भी 25 जवान मारे गए।
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यह बात भी सामने आई है कि अर्द्धसैनिक बलों ने ऐसे क्षेत्रों में सुरक्षा संबंधी सावधानी का पूरी तरह से पालन नहीं किया। कश्मीर के उन क्षेत्रों में सेना भी कार्यरत है, परंतु आज तक इतनी बड़ी संख्या में सेना के विरुद्ध आतंकवादी अपने मंसूबों में सफल नहीं हुए। आतंकी कार्रवाई से सेना के सुरक्षित रहने का एक ही कारण है कि सेना में हर स्तर पर पूर्ण नियंत्रण तथा अनुशासन है। सेना की तरह अर्द्धसैनिक बलों की कार्यप्रणाली के लिए भी डिफेंस सर्विसेज रेगुलेशन की तरह नियमावली बननी चाहिए तथा कार्यप्रणाली में परिवर्तन करने चाहिए। इन बलों के नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार में एक संयुक्त कमान बननी चाहिए जिसका प्रमुख राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को भी बनाया जा सकता है। बीएसएफ के जवान की भोजन की शिकायत या सीआइएसएफ के जवान द्वारा अपने साथियों की हत्या संकेत है कि इन बलों की कार्यप्रणाली में सुधार की आवश्यकता है।