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युद्धों के दौर में खत्म होते संवाद: संयुक्त राष्ट्र की अवहेलना कर रहे स्थायी UNSC सदस्य, शांति की उम्मीद कैसे?

Wed, 09 Jul 2025 08:25 AM IST
ज्योति भास्कर सुरेंद्र कुमार, पूर्व राजदूत
सुरेंद्र कुमार, पूर्व राजदूत Published by: ज्योति भास्कर Updated Wed, 09 Jul 2025 08:25 AM IST
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सार
सुरक्षा परिषद के पांचों स्थायी सदस्य ही जब संयुक्त राष्ट्र की अवहेलना करते हों, तो दुनिया में शांति और सुरक्षा की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
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Dialogue ending in era of wars Permanent UNSC members ignoring United Nations how can we hope for peace
इस्राइल और ईरान के बीच संघर्ष - फोटो : अमर उजाला / एआई

विस्तार

तो क्या परमाणु मुद्दे पर अमेरिकी-ईरानी वार्ता के लिए दो सप्ताह का समय वास्तव में ईरानी नेताओं को शांत करने और यूरोपीय नेताओं को कूटनीति में अपनी किस्मत आजमाने के लिए प्रेरित करने का सोचा-समझा प्रयास था? वे जिनेवा में मिले और बिना किसी उल्लेखनीय सफलता के लौट गए। हैरानी नहीं कि राष्ट्रपति ट्रंप ने इस पर चुटकी लेते हुए कहा, ‘यूरोप इस समस्या का समाधान नहीं कर सकता।’ पासा पलट चुका था। बिना किसी सूचना के, दो सप्ताह की अवधि दो दिन में ही समाप्त कर दी गई!



22 जून को, राष्ट्रपति ट्रंप ने इस्राइली प्रधानमंत्री के साथ तालमेल बनाकर ईरान के फोर्डो स्थित परमाणु प्रतिष्ठानों पर 30,000 पाउंड के बंकर बस्टर बम (जीबीयू57) और नतांज एवं इस्फहान में पनडुब्बी चालित टॉमहॉक मिसाइलों से बमबारी करने का आदेश दिया। अमेरिकी सुप्रीम कमांडर ने दावा किया कि ईरानी सुविधाओं को पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया है। संयुक्त सेना प्रमुख जनरल केन ने महसूस किया कि अभी पूरा आकलन करना जल्दबाजी होगा। आगे क्या? ट्रंप की सख्त चेतावनी-शांति की तलाश करें अन्यथा और अधिक त्रासदी होगी। जैसा कि अपेक्षित था, ईरान ने घोषणा की कि क्षेत्र में स्थित अमेरिकी ठिकाने/ कार्मिक/ संपत्तियां अब उनके प्रतिशोध के लिए वैध लक्ष्य हैं। उन्होंने कतर में अमेरिकी ठिकानों पर 14 मिसाइलें दागीं (यह संख्या अमेरिका द्वारा ईरानी परमाणु स्थलों पर गिराए गए बमों की संख्या के बराबर है)।


इस हमले में कोई भी घायल नहीं हुआ। कथित तौर पर उन्होंने अमेरिका और कतर, दोनों को पहले से ही सूचित कर दिया था। लगता है कि यह ईरानी लोगों को दिखाने के लिए एक सुनियोजित प्रदर्शन था। इसके कुछ ही घंटों बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने इस्राइल और ईरान के बीच बारह दिनों के युद्ध की पूर्ण संघर्षविराम की घोषणा कर दी। उम्मीद करें कि मौजूदा अविश्वास के बावजूद यह कायम रहे। अमेरिका की सैन्य श्रेष्ठता सर्वविदित है। इसके बावजूद वह अफगानिस्तान, इराक और लीबिया में अपने लक्ष्य को हासिल करने में विफल रहा। अफगानिस्तान, इराक और लीबिया में अमेरिकी हस्तक्षेप, जिसकी कीमत लगभग 30 खरब अमेरिकी डॉलर थी और जिसमें हजारों अमेरिकी सैनिकों की जान गई, का एक सरल संदेश था: केवल सैन्य श्रेष्ठता और शासन परिवर्तन से सफलता सुनिश्चित नहीं हो सकती; इसकी कोई गारंटी नहीं है कि आने वाली सरकार आपके पक्ष में होगी।

जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (जेसीपीओए), जिसे आम तौर पर ईरान परमाणु समझौता कहा जाता है, पर 14 जुलाई, 2015 को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने दबाव में आकर हस्ताक्षर नहीं किए थे। इस पर संयुक्त राष्ट्र के सभी पांचों स्थायी सदस्य, जर्मनी और यूरोपीय संघ ने भी हस्ताक्षर किए थे। इसे ईरानी परमाणु अनुसंधान को शांतिपूर्ण उपयोग को छोड़कर नियंत्रण में रखने (हथियार स्तर तक यूरेनियम संवर्धन की अनुमति नहीं देने) के लिए एक प्रभावी व्यवस्था के रूप में सराहा गया। मई, 2018 में डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में इस समझौते से खुद को अलग कर लिया, जिसकी ब्रिटिश, फ्रांसीसी और जर्मन नेताओं ने आलोचना की थी। हालांकि, ईरान को अधिक कठोर परमाणु समझौते के लिए राजी करने के ट्रंप के निर्णय पर कोई सवाल नहीं उठा सकता, लेकिन यह प्रत्यक्ष एवं शांतिपूर्ण वार्ता के माध्यम से होना चाहिए। ईरानी नेताओं, विशेषकर विदेश मंत्री ने कई बार दोहराया है कि ईरान परमाणु हथियार नहीं चाहता है, लेकिन उससे यह अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए कि वह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु ऊर्जा का उपयोग करने के लिए अपने अधिकार को छोड़ देगा। 

ईरानी और अमेरिकी वार्ताकारों के बीच पांच दौर की चर्चाओं से ट्रंप भी आशावादी दिखे कि ईरान के साथ एक नया परमाणु समझौता संभव है। इस संदर्भ में, छठे दौर की वार्ता बहुत निर्णायक हो सकती थी। लेकिन इस्राइल अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी तरह के मेल-मिलाप की संभावनाओं को विफल करने के लिए कृतसंकल्प था। इसलिए, उसने 13 जून को ‘ऑपरेशन राइजिंग लॉयन’ शुरू किया। रूस में अमेरिका के पूर्व राजदूत मैकफॉल के अनुसार, अमेरिकी हमले के बाद इसकी बेहद कम संभावना है कि ईरान अमेरिका के साथ दीर्घकालिक समझौते पर बातचीत करेगा। लेकिन ऐसे हालात में बातचीत और कूटनीति के लिए जगह कहां है?

इस्राइल और ईरानी नेतृत्व के लिए दोस्ती का हाथ बढ़ाना और एक-दूसरे की चिंताओं के मुद्दों को बातचीत और कूटनीति से शांतिपूर्ण तरीके से हल करने की कसम खाना इतना मुश्किल क्यों होना चाहिए? और इस्राइल के मुख्य संरक्षक और समर्थक अमेरिका को इस दृष्टिकोण को प्रोत्साहित क्यों नहीं करना चाहिए? लेकिन परोपकार की शुरुआत घर से ही होती है। अमेरिका समेत सुरक्षा परिषद के पांचों स्थायी सदस्य ही संयुक्त राष्ट्र की अवहेलना करते हैं और अपनी मर्जी से किसी देश पर हमला करते हैं, तो दुनिया में शांति और सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जा सकती है?

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