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संस्कृति के पन्नों से: हनुमान ने शनिदेव को कैसे किया शांत, आप भी जानिए संस्कृति के पन्नों से

Sun, 17 Mar 2024 07:22 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 17 Mar 2024 07:22 AM IST
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सार

हनुमान ने शनिदेव का अहंकार तोड़ने का निश्चय किया। उन्होंने शनिदेव को अपनी पूंछ में बांध लिया। शनिदेव छटपटाने लगे, लेकिन बहुत प्रयास करने के बावजूद हनुमान की पकड़ से मुक्त न हो सके।

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Dhoop Aane do How Lord Hanuman Controls Shani dev know full mythological story
Lord Hanuman - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

एक समय हनुमान, हिमालय पर्वत पर तपस्या में लीन थे। तभी उनके पास सूर्य-पुत्र शनिदेव पहुंच गए। शनिदेव लोगों को कष्ट देने के लिए आज भी प्रसिद्ध हैं। शनिदेव इसी मंशा से हनुमान के पास गए थे। हनुमान ने शनिदेव से आने का कारण पूछा, तो शनिदेव ने कह दिया, 'मैं लोगों के शरीर में प्रवेश करके उन्हें कष्ट देता हूं और आपके पास भी इसी उद्देश्य से आया हूं।'

हनुमान बोले, 'मेरे भीतर तो केवल राम रहते हैं; तुम कहां रहोगे?' इस पर शनिदेव ने हंसकर कहा, 'मैं ढाई वर्ष तक मस्तिष्क में, अगले ढाई वर्ष उदर के भीतर और अंतिम ढाई वर्ष उदर से नीचे रहकर व्यक्ति को निष्क्रिय कर देता हूं। आपके साथ भी यही करूंगा।' हनुमान तुरंत तैयार हो गए और बोले, 'तो फिर मेरे सिर पर सवार हो जाओ।'

शनिदेव ने जैसे ही हनुमान के मस्तिष्क में प्रवेश किया, हनुमान के सिर में दर्द होने लगा। परंतु उन्हें शनिदेव से निपटने का तरीका आता था। उन्होंने एक बड़ी-सी शिला उठाई और अपने सिर पर रख ली। शनिदेव पीड़ा से चिल्ला उठे। लेकिन हनुमान ने उस पर ध्यान नहीं दिया। फिर एक और शिला उठाकर सिर पर रख ली। अब शनिदेव के लिए संकट खड़ा हो गया। वे आए थे हनुमान को कष्ट देने, लेकिन स्वयं कष्ट में फंस गए! अब शनिदेव, हनुमान से मोल-भाव करने लगे। 'यदि आप मुझे छोड़ दें, तो मैं आपके कष्ट की अवधि साढ़े सात वर्ष से घटाकर साढ़े सात दिन कर दूंगा !'

इस पर हनुमान तपाक से बोले, 'तुम मेरे लिए अपना नियम मत बदलो। मेरा सिरदर्द जब तक ठीक नहीं होगा, मैं सिर पर शिलाएं रखता जाऊंगा।' हनुमान ने एक और शिला उठा ली, लेकिन इससे पहले कि उसे सिर पर रखते, शनिदेव ने बिलखते हुए कहा, 'प्रभु, मुझसे भूल हो गई। मुझे क्षमा कर दीजिए। मैं आपको कभी कष्ट नहीं दूंगा।' हनुमान ने कहा, 'मुझे नहीं दोगे, लेकिन दूसरे लोगों को तो कष्ट दोगे ! मैं आज पूरा उपाय करके ही तुम्हें छोडूंगा।' यह कहकर हनुमान ने तीसरी शिला भी सिर पर रख ली। शनिदेव का तो जैसे दम ही निकल गया !

उन्होंने विनती की, 'हे रामदूत ! दया कीजिए! मैं आपको वचन देता हूं कि जो भी आपको स्मरण करेगा, उसे कभी मुझसे कष्ट नहीं होगा।' तब हनुमान ने प्रसन्न होकर शनिदेव को मुक्त कर दिया। इसीलिए कहते हैं, हनुमान का नाम लेने से शनिदेव के कोप से रक्षा हो जाती है। 

एक अन्य कथा भी प्रसिद्ध हैं...शनिदेव ने हनुमान का बहुत यश सुना था। शनिदेव को लगा कि यदि वह हनुमान को परास्त कर दें, तो उनका अपना यश बढ़ जाएगा। इस उद्देश्य से शनिदेव ने हनुमान को चुनौती दे डाली। 'हनुमान ! मैं ग्रहों में सर्वशक्तिमान शनि हूं। विश्व 'मेरे नाम से कांपता है। यदि साहस है, तो मुझसे युद्ध करो !' हनुमान, शनिदेव से लड़ने को उत्सुक नहीं थे। उन्होंने विनम्रतापूर्वक शनिदेव से कहा, 'मैं वृद्ध हो चुका हूं तथा श्रीराम नाम के अतिरिक्त मेरी किसी कार्य में रुचि नहीं है। आप बहुत बलवान हैं, इसलिए आपको अपने समान किसी बलशाली से युद्ध करना चाहिए।' शनिदेव ने हनुमान की विनम्रता को उनकी कायरता समझने की भूल कर दी। इससे शनिदेव का दुस्साहस और बढ़ गया। उन्होंने हनुमान से कहा, 'मैं आ गया हूं, तो युद्ध किए बिना नहीं जाऊंगा। अन्यथा आप अपनी पराजय स्वीकार कर लीजिए।'

तब हनुमान ने शनिदेव का अहंकार तोड़ने का निश्चय किया। उन्होंने शनिदेव को अपनी पूंछ में बांध लिया। शनिदेव छटपटाने लगे, लेकिन बहुत प्रयास करने के बावजूद हनुमान की पकड़ से मुक्त नहीं हो सके। सहसा हनुमान उछले और ऊबड़-खाबड़ पथरीले रास्तों पर बेतहाशा दौड़ने लगे। इस दौरान, हनुमान अपनी पूंछ को शिलाओं पर पटकते जाते थे। पत्थरों पर टकरा-टकरा कर हनुमान की पूंछ में बंधे शनिदेव की बड़ी दुर्दशा हुई। उनके पूरे शरीर में पीड़ा होने लगी। उन्होंने हनुमान से क्षमा मांगी और वचन दिया कि वह उनके भक्तों को कभी कष्ट नहीं देंगे। इस वचन के बाद हनुमान ने शनिदेव को क्षमा कर दिया और उन्हें घावों पर लगाने के लिए तेल भी दिया। इसी कारण आज भी लोग, शनिवार को शनिदेव के नाम पर तेल अर्पित करते हैं।

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