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हार के बाद भी सुर्खियों में क्यों है परिवार

Mon, 18 Aug 2014 12:48 AM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Mon, 18 Aug 2014 12:48 AM IST
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Despite defeat why gandhi-nehru family in limelight

इतना विशेष दर्जा है गांधी परिवार का अपने इस भारत महान में कि सत्ता में नहीं है अब, फिर भी चर्चा होती है। मसलन, कहा गया कि प्रियंका गांधी सक्रिय राजनीति में कदम रख सकती हैं। इसी के साथ चर्चे शुरू हो गए कि क्या प्रियंका कांग्रेस को बचा सकती हैं? इसका आज के राजनीतिक बहस से क्या वास्ता? आज ध्यान क्या हमको इस बात पर नहीं देना चाहिए कि नरेंद्र मोदी के मंत्री नियम-नीतियों और शासन में परिवर्तन ला रहे हैं कि नहीं?

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हम राजनीतिक पंडितों का ध्यान ऐसा अटका रहा है गांधी परिवार पर कि नटवर सिंह की किताब के छपने से पहले ही हंगामा मच गया। नटवर सिंह के साथ इंटरव्यू जब मेरे दोस्त करन थापर ने किया, तो उसने इतना महत्वपूर्ण समझा कि दो हिस्सों में दिखाया उसे और उसके बाद इस इंटरव्यू पर कई दिनों तक राजनीतिक पंडितों से चर्चा की। यह सिलसिला खत्म हुआ, तो उन्होंने गांधी परिवार के वफादार मणिशंकर अय्यर का इंटरव्यू किया इसी किताब के खुलासों को लेकर।
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नटवर सिंह विदेश राज्यमंत्री थे जब उनको सोनिया गांधी ने पद से हटा दिया था इस शक पर कि सद्दाम हुसैन के शासनकाल से जुड़े अंतरराष्ट्रीय तेल घोटाले में उन्हें निजी फायदा हुआ था। वोल्कर रिपोर्ट में नटवर सिंह का नाम था और कांग्रेस का भी, लेकिन दोष सिर्फ नटवर सिंह के सिर लगाया गया। वह कई साल कुढ़ते रहे, फिर किताब लिख डाली। इस किताब में उन्होंने लिखा है कि सोनिया गांधी ने 2004 में प्रधानमंत्री बनने से इन्कार अपनी अंतरात्मा के आधार पर नहीं किया, बल्कि अपने बेटे राहुल गांधी की बात पर किया। सोनिया जी के बारे में नटवर सिंह यह भी लिखते हैं कि वह शक्की और चालाक राजनेता हैं। इस पर हंगामा मच गया। सोनिया जी ने गुस्सा करते हुए कह दिया कि वह जवाब देंगी अपनी किताब लिखकर।
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नटवर की किताब खूब बिकेगी, पर सवाल यह है कि इतना हंगामा तब क्यों नहीं होता, जब किसी अन्य नेता पर किताब छपती है? उदाहरण हैं नरेंद्र मोदी पर छपी वे ढेर सारी किताबें, जिनमें प्रधानमंत्री की आलोचना ज्यादा है। लेकिन इन पर कोई हंगामा नहीं हुआ। आखिर ऐसी क्या बात है गांधी परिवार में कि सत्ता में न रहते हुए भी सुर्खियों में बने रहते हैं इस परिवार के सदस्य?

दरअसल इंदिरा गांधी जब 1977 में चुनाव हारी थीं, तब भी सुर्खियों में थीं। कभी इसलिए कि बेलछी में हुए नरसंहार का हाल जानने हाथी पर सवार होकर गई थीं, तो कभी इसलिए कि जनता पार्टी की सरकार ने उनको तिहाड़ जेल भेजने की गलती की, तो कुछ इसलिए कि संजय गांधी पर मुकदमा चला किस्सा कुर्सी का फिल्म को लेकर।


गांधी परिवार के नेतृत्व में कांग्रेस ने इस बार चुनाव में अपनी सबसे बड़ी शिकस्त का सामना किया है। इतने कम सांसद हैं कांग्रेस के लोकसभा में कि वह नेता प्रतिपक्ष की भूमिका भी अदा नहीं कर सकती। इस शिकस्त का विश्लेषण होना चाहिए कांग्रेस के अंदर। क्या बात है इस परिवार में कि हम जैसे लोग इसे भुला नहीं पाते? न हम भूलते हैं, न जनता को भूलने देते हैं। ऐसा लगने लगा है कि राजनीतिक परिवर्तन हुआ ही नहीं है देश में। जैसे कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा पूर्ण बहुमत में केंद्र की सत्ता में आई ही न हो।

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