फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Demonstration of woman power

स्त्री शक्ति का प्रदर्शन

Thu, 10 Jan 2019 06:31 PM IST
Raman Singh सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली Published by: Raman Singh Updated Thu, 10 Jan 2019 06:31 PM IST
विज्ञापन
Demonstration of woman power
सुभाषिनी सहगल अली

नए साल की नई शुरुआत, अभूतपूर्व शुरुआत, ऐतिहासिक शुरुआत। ठीक चार बजे शाम को केरल के एक छोर से दूसरे छोर तक 35 लाख महिलाओं ने एक दूसरे का हाथ पकड़ने की कोशिश की। पर वह संभव ही नहीं था। अगर वे एक दूसरे का हाथ पकड़ लेतीं, तो एक तरफ वह अरब सागर के अंदर चली जातीं और, दूसरी तरफ, वे तमिलनाडु की सरहद पार कर देतीं। आना तो था तीस लाख महिलाओं को। लेकिन पहुंच गईं 35 लाख, शायद इससे भी अधिक। उनके चेहरे, उनके हावभाव, उनकी मुस्कान, उनका उत्साह, उनका जोश-सब कह रहा था-हमारे दिल एक हैं, हमारे विचार एक हैं, हमारा संकल्प एक है।


loader

महिलाओं का यह जबर्दस्त प्रदर्शन केवल संख्या के कारण ही ऐतिहासिक नहीं था। वह इसलिए भी था कि राज्य के कोने-कोने से हर तरह की महिलाएं यह कहने के लिए सड़कों पर खड़ी थीं कि हम अपनी बात खुद कहने के लिए सक्षम हैं। प्रदर्शन का समर्थन करने लाखों पुरुष और नौजवान भी थे। विभिन्न सामजिक और राजनीतिक संगठनों के नेता भी थे। लेकिन कोई झंडा नहीं था। पूरे राज्य में लगे पोस्टरों पर किसी नेता की तस्वीर भी नहीं थी। केवल आयांकल्ली और श्री श्री नारायण गुरु की तस्वीरें थीं। श्री आयांकल्ली दलित परिवार में 1863 में पैदा हुए थे। उस समय सड़कों पर चलना, स्कूल जाना, मंदिर के पास से गुजरना दलितों के लिए वर्जित था। आयांकल्ली ने इसका विरोध करते हुए सड़क पर बैलगाड़ी पर बैठकर यात्रा की। उच्च जाति के लोगों ने उन पर पथराव किया। पगलाई भीड़ ने उन पर हमला किया। लेकिन वह पीछे नहीं हटे। फिर उन्होंने दलित बच्चों के लिए स्कूल शुरू किया, जिसे ऊंची जाति के लोगों ने नष्ट कर दिया। 1907 में त्रावणकोर राज्य ने स्कूलों में अनुसूचित जाति-जनजातियों के बच्चों के प्रवेश के पक्ष में कानून पारित किया, लेकिन इसे भी उच्च जाति के लोगों ने लागू नहीं होने दिया। इसके खिलाफ आयांकल्ली ने खेत मजदूरों की हड़ताल करवाई। उनकी मांग थी कि निचली जातियों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में प्रवेश मिले। इसके साथ चाय की दुकानों में चाय पीने का अधिकार, मजदूरों को कोड़े मारने की पद्धति का अंत आदि मांगें भी जोड़ी गईं। एक साल तक वह हड़ताल चली। अंततः ज़मींदारों को समझौता करना पड़ा। निचली जातियों के बच्चों को स्कूलों में प्रवेश मिला। अन्य मांगें भी मानी गईं। नारायण गुरु ईरवा जाति के थे। इस जाति को भी पिछड़ा ही समझा जाता था। मंदिरों में उनका प्रवेश वर्जित था। सड़कों पर भी वे नहीं चल सकते थे। नारायण गुरु ने जाति-प्रथा समाप्त करने का नारा दिया। उन्हें और उनके साथ खड़े होने वालों को बड़ी यातनाएं और हिंसक हमलों का सामना करना पड़ा, पर विजय अंत में उन्हीं की हुई।

पुराने इतिहास और पुराने संघर्षों की कल्पना भी नई पीढ़ी नहीं कर सकती।  लेकिन सबरीमाला मंदिर में दस से पचास साल की महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में सर्वोच्च न्यायालय के कुछ प्रतिक्रियावादी तत्वों के विरोध ने उन तमाम यादों को ताजा कर दिया। इसीलिए, एक जनवरी को वे लाखों की संख्या में सड़क पर उतरीं। आश्चर्य की बात है कि एक जनवरी की रात को ही जब दो महिलाओं ने चार किलोमीटर लंबी यात्रा पूरी कर मंदिर में पूजा-अर्चना की, तो उनके साथ चल रहे हजारों तीर्थयात्रियों ने किसी प्रकार का विरोध नहीं जताया। परेशानी उन्हें हुई, जो घड़ी की सुई पीछे की ओर चलाना चाहते हैं। लेकिन न वह सुई पीछे की ओर चलेगी और न ही केरल की बहादुर महिलाएं। वे समानता की ओर आगे बढ़ेंगी, सब के साथ बढ़ेंगी और देश भर की महिलाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा देंगी। 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed