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पड़ोस: पाकिस्तान में विलुप्ति के कगार पर लोकतंत्र, शक्ति प्रदर्शन के लिए सेना-सरकार और न्यायपालिक में टकराव

Fri, 04 Oct 2024 06:17 AM IST
mariana babar मरिआना बाबर
Updated Fri, 04 Oct 2024 06:17 AM IST
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सार
सेना, उच्च न्यायपालिका, शहबाज शरीफ के नेतृत्व वाली सरकार और विपक्ष, सभी में इस बात को लेकर टकराव है कि कौन ज्यादा शक्तिशाली है, जो उच्च न्यायपालिका को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा है। पाकिस्तान में लोकतंत्र संकटग्रस्त प्रजाति तो हमेशा से था, लेकिन अब यह विलुप्त होने के कगार पर है।
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Democracy on verge of extinction in Pakistan conflict between army government and judiciary
पाकिस्तान में संकट (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : एएनआई

विस्तार

पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के प्रमुख इमरान खान उसी समय से आंदोलनकारी और विध्वंसकारी राजनीति में शामिल हैं, जब कुछ साल पहले नेशनल असेंबली में अविश्वास प्रस्ताव के जरिये उनकी सरकार को गिरा दिया गया था, और ऐसा पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार हुआ था। प्रधानमंत्री पद से हटाए जाने के ठीक पहले, घायल बाघ की तरह उन्होंने घोषणा की थी कि ‘सरकार से बाहर रहने पर मैं पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक हो जाऊंगा।’



ये शब्द सही साबित हुए, हालांकि वह अपनी बेगम बुशरा बीबी के साथ विभिन्न मामलों में जेल में कैद हैं। उन्होंने पिछले कई वर्षों में अपने समर्थकों को कानून तोड़ने और इस्लामाबाद के अति सुरक्षित इलाके में भी विरोध प्रदर्शन करने के लिए भड़काया है, जहां संसद, सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री भवन और विदेशी दूतावास स्थित हैं। भले ही विरोध प्रदर्शन हुए, लेकिन अब तक किसी भी अन्य राजनीतिक दल ने इस तरह से सरकार को शर्मिंदा नहीं किया है। विरोध प्रदर्शन ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों से दूर ही होते रहे हैं।


पाकिस्तान में हर जगह के लोग अब इस बात से तंग आ चुके हैं कि सरकार ने शहरों में प्रवेश और निकास मार्ग सील कर दिए हैं, जिससे न केवल व्यापारिक घरानों को, बल्कि आम नागरिकों को भी स्वतंत्र रूप से कहीं आने-जाने में परेशानी हो रही है। पिछले कुछ वर्षों में लाखों रुपये का नुकसान हुआ है, क्योंकि कभी-कभी कई दिनों तक पूरा शहर बंद रहता है। इस हफ्ते एक बार फिर, मलयेशियाई प्रधानमंत्री इस्लामाबाद आने वाले हैं। इसके अलावा, इस महीने के अंत में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक भी होनी है, जिसकी तैयारियां भी शुरू हो चुकी हैं, इमरान खान ने एक बार फिर इस्लामाबाद के संवेदनशील क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है। अतीत में किसी भी हाई प्रोफाइल राजनीतिक कैदी को अपने समर्थकों, वकीलों, मित्रों और परिवार के साथ रोजाना मिलने की सुविधा नहीं थी। जबकि रावलपिंडी की अदियाला जेल में बंद इमरान खान को मीडिया से भी रोजाना बात करने की अनुमति है। इसके परिणामस्वरूप पत्रकारों को दिए गए बयानों और टिप्पणियों की खबरें पहले पन्ने पर छपती हैं।

इस हफ्ते सुप्रीम कोर्ट के अंदर एक अविश्वसनीय घटना घटी, जब पीटीआई के एक वकील ने मुल्क के प्रधान न्यायाधीश काजी फैज ईसा के सामने अपना पक्ष रखते हुए धमकी दी कि यदि बड़ी बेंच ने पीटीआई द्वारा दायर मामले के खिलाफ फैसला सुनाया, तो अदालत के बाहर पीटीआई के 500 वकील इंतजार कर रहे हैं। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रधान न्यायाधीश ने तुरंत पुलिस बुला ली। उन्होंने पूछा, ‘क्या आप चाहते हैं कि संस्थाएं धमकियों से चलें? मेरी एकमात्र गलती यह है कि मैंने हमेशा धैर्य दिखाया है।’

इस कॉलम में इमरान खान की विनाशकारी राजनीति की ओर ध्यान दिलाने की मुख्य वजह यह है कि आज पाकिस्तान की सभी संस्थाएं एक-दूसरे से टकरा रही हैं और इस नवजात लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा हो रहा है। सेना, उच्च न्यायपालिका, शहबाज शरीफ के नेतृत्व वाली सरकार, संसद और विपक्ष सभी एक-दूसरे से टकराव की स्थिति में हैं, ताकि यह साबित किया जा सके कि कौन अधिक शक्तिशाली है, जो उच्च न्यायपालिका को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा है। दिलचस्प बात यह है कि प्रधान न्यायाधीश और सेनाध्यक्ष, दोनों का कार्यकाल 2024 के अंत में पूरा हो जाएगा, बशर्ते सरकार उनके कार्यकाल को विस्तार न दे, जैसा कि अतीत में देखा गया है। पूर्व मंत्री और सीनेटर मुशाहिद हुसैन सैयद कहते हैं, ‘राजनीतिक अभिजात वर्ग सिर्फ लोकतंत्र की बात करता है, लेकिन वे उसमें विश्वास नहीं करते। पाकिस्तान में तानाशाही एक मानसिकता है। हमारा शासक वर्ग (चाहे सैन्य हो या निर्वाचित) लोकतंत्र में विश्वास नहीं करता। वे असहिष्णु हैं। राजनीतिक ताकतों के बीच सह-अस्तित्व की कोई वास्तविक इच्छा नहीं है।’

शीर्ष अदालत में भी खुलेआम मतभेद हैं, जहां अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश खुलेआम प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ आवाज उठाते हैं और जब उन्हें किसी मामले की सुनवाई के लिए नामित किया जाता है, तो वे उससे इन्कार कर देते हैं। यह मुद्दा तब शुरू हुआ, जब सेना और शहबाज शरीफ सरकार ने मिलकर संसद में कुछ सांविधानिक संशोधन विधेयक लाने का प्रयास किया, जिसमें न्यायपालिका की स्वतंत्रता कम करने, प्रधान न्यायाधीश के कार्यकाल में बदलाव लाने, मौजूदा प्रधान न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति के बाद नए मुख्य न्यायाधीश का नाम तय करने और सांविधानिक न्यायालयों के निर्माण का प्रस्ताव शामिल था। दिलचस्प बात यह है कि संविधान संशोधनों का पूरा मसौदा सार्वजनिक नहीं किया गया है। सत्ता पक्ष के पास ऐसे सांविधानिक संशोधन करने के लिए न तो नेशनल असेंबली में और न ही सीनेट में दो तिहाई बहुमत है। इससे खरीद-फरोख्त को बढ़ावा मिला है।

इसी दौरान निर्दलीय के रूप में चुनाव जीतने वाले पीटीआई के 80 उम्मीदवारों के बारे में एक और मामला उठा, क्योंकि पीटीआई के चुनाव चिह्न ‘क्रिकेट बैट’ को प्रधान न्यायाधीश द्वारा चुनाव चिह्नों की सूची से हटा दिया गया था। इस निर्णय की व्यापक निंदा की गई थी। चुनाव आयोग ने उन्हें संसद में पीटीआई बेंच से जुड़ने की अनुमति नहीं दी है और वे पार्टी लाइन पर वोट नहीं कर सकते हैं। इसलिए पीटीआई ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जिसने उसके पक्ष में फैसला सुनाया और उन लोगों को पीटीआई की बेंच पर बैठने की अनुमति दी। लेकिन चुनाव आयोग और सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को लागू करने से इन्कार करते हुए कहा कि वे फैसले को स्वीकार या लागू नहीं करेंगे।

सरकार को डर है कि अगर विपक्ष का संख्याबल बढ़ गया, तो शहबाज शरीफ निचले सदन में अपना बहुमत खो सकते हैं। राजनीतिक अर्थशास्त्री नियाज मुर्तजा कहते हैं, ‘पाकिस्तान का लोकतंत्र अब एक संकटग्रस्त प्रजाति बन गया है, जिसका लंबे समय से सैन्य तत्वों द्वारा शिकार किया जा रहा है। लेकिन लगता है कि अब इसे विलुप्त प्रजाति बनाने की तैयारी कर ली गई है, जिसके बाद इसे समुद्र में दफना दिया जाएगा, ताकि लोकतंत्र प्रेमियों को इसकी कब्र बनाने के लिए इसके अवशेष भी न मिल सकें।’

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