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छल से नहीं होगा दिल्ली का कल्याण

Mon, 09 Feb 2015 04:23 AM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Mon, 09 Feb 2015 04:23 AM IST
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Delhi welfare impossible from deceit

दिल्ली वाली हूं, सो दिल्ली का भला चाहती हूं। वैसे तो एक्जिट पोल ने आप को सबसे आगे बता दिया है, पर सच यह है कि इस चुनाव में ऐसा भाषण नहीं सुना किसी राजनेता से, जिससे विश्वास हो कि वह इस महानगर का भला करना चाहते हैं। जितने भी राजनेताओं ने प्रचार किया, सबने एक जैसे वायदे किए। चौबीस घंटे बिजली मिलेगी, हर घर में पानी की सुविधा होगी, झुग्गियां पक्के मकान में तब्दील कर दी जाएंगी और देखते-देखते दिल्ली की गिनती विश्व के सबसे विकसित महानगरों में होने लग जाएगी। खोखली लगती हैं मुझे ये तकरीरें। इसलिए कि चुनाव के समय बिल्कुल यही बातें बहुत बार सुन चुकी हूं।

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आम आदमी पार्टी की 49 दिनों की सरकार जब थी, तो उन्होंने अलग किस्म का नुकसान किया इस राजधानी का। अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बनने के बाद तकरीबन भूल गए कि उनका काम शासन संभालना था, पर उन्होंने और उनके मंत्रियों ने नाटकबाजी में 49 दिन गुजारे। केजरीवाल साहिब ने पहले मुख्यमंत्री के दर्जे का बड़ा सरकारी मकान लेने से इन्कार किया और फिर दो छोटे घरों को एक बनाकर बसे रहे मुख्यमंत्री पद त्यागने के कई महीनों के बाद भी। नाटकीय अंदाज में शपथ ग्रहण समारोह तक जाने के बाद सबने इंपोर्टेड गाड़ियों में जाना पसंद किया। छल-कपट से दिल्ली का कल्याण नहीं होगा।
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दिल्ली की समस्याएं गंभीर हैं। ऊपर-ऊपर से दिल्ली में शानदार विकास दिखता है मेट्रो-मॉल किस्म का, लेकिन अंदर से यह विकास धोखा है। चौड़ी सड़कें और चमकती इमारतें उन इलाकों में ही दिखती हैं, जहां राजनीतिज्ञों, धनवानों और आला अधिकारियों का आना-जाना है। उन इलाकों में नहीं, जहां आम आदमी रहते हैं।
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इससे तो वह दिल्ली अच्छी थी, जो मेरे बचपन की थी। एक तरफ थी पुरानी दिल्ली, जो शाहजहां ने बसाई थी, और दूसरी तरफ थी नई दिल्ली, जो अंग्रेजों ने बनाई थी। माना कि आज का विशाल महानगर उस समय नहीं था, लेकिन साफ-सुथरा शहर था। आबादी कम थी और चौड़ी सड़कों पर गाड़ियां भी बहुत कम थीं। दिल्ली की हवा साफ इतनी थी कि हम जब कोलकाता या मुंबई जाते थे, तो परेशान हो जाते थे। अब दिल्ली की हवा गंदी है। यमुना नदी का हाल बदतर होता गया है। बिजली-पानी की समस्या वैसी ही है। फर्क सिर्फ इतना आया है कि अब रईसों के घरों में जनरेटरों द्वारा चौबीसों घंटे बिजली आती है, और गरीबों का हाल जस का तस है।

जो शहर बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं ढूंढ पाया है, वह विश्व स्तर का महानगर बनने का सपना कैसे देख सकता है? प्रधानमंत्री पर निशाना साधते हुए अपने हर भाषण में राहुल गांधी ने यह कहा कि मोदी को चिंता कुछ मुट्ठी भर उद्योगपतियों की है, और खुद उनको चिंता है गरीबों, आदिवासियों की। गरीबों के लिए क्यों नहीं कुछ किया उन्होंने पिछले एक दशक में? दिल्ली में तो पंद्रह वर्ष रही कांग्रेस की सरकार, जिस दौरान अमीरों के लिए बने कई पांच सितारा होटल और मॉल। गरीब बस्तियां बेहाल थीं और बेहाल हैं। ऐसा क्यों?


अगले मुख्यमंत्री से दुआ यही है कि कम से कम बिजली-पानी की समस्या हल करके दिखाएं, स्वच्छ भारत का अभियान झुग्गी-बस्तियों तक पहुंचाएं और यमुना को साफ करके दिखाएं। इतना ही हो जाए, तो बहुत होगा टूटे सपनों के इस महानगर में।

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