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दिल्ली हिंसा: भय की भीड़ के बंधक, सांप्रदायिकता के तंदूर को दहकाने की कोशिश

Tue, 25 Feb 2020 08:04 PM IST
Yashwant Vyas यशवंत व्यास
Updated Tue, 25 Feb 2020 08:04 PM IST
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सार
अराजकता में तंत्र बदनामी से डरता है और शांति वाचाल लोगों के हवाले हो जाती है। यह हर तरफ से घोर सांप्रदायिक है, डरा देने वाला है और संसदीय लोकतंत्र की आत्मा पर घाव करने वाला है।
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Delhi violence : hostage to fear mob
दिल्ली हिंसा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सोमवार की सुबह का दृश्य था। मैं अपनी गाड़ी से जिस रास्ते को बीस मिनट में पार कर लेता था, उस रास्ते पर जैसे रास्ता ही न था। रेले के रेले चले जा रहे थे। तैयार होकर निकले बच्चे भी थे, लड़कियां, औरतें, नौजवान और प्रौढ़ भी। कई दुकानें बंद थीं और बाहर कनातें लगी हुई थीं। बड़े-बड़े कड़ाहों में खाने की चीजें पलटी जा रही थीं। पानी के पाऊच और नारों के साथ स्पीकर पर तकरीर। तिराहे पर गाड़ियों से गाड़ियां सटाई हुईं।





जमीन पर भी जत्थे के जत्थे बैठे हुए। बिछाने के सस्ते पॉलिथिन बेचने वालों का भी धंधा निकल आया था। यह दिल्ली का कई दिनों से मशहूर वाला नहीं, एक दूसरा इलाका था बात संविधान से शुरू हुई पर हर तीसरी लाइन में भय और पहचान का तड़का। रास्ते को जाम करते हुए, व्यवस्था को चुनौती देने का आह्वान। हर चौथी लाइन 'हक' और 'डर' जैसे शब्दों से सनी हुई। भय सड़कों पर फैल गया। बाकी लोग बचते-बचाते निकलने की कोशिश में रेंगते हुए भाग रहे थे।


सोशल मीडिया पर एक राजनेता ने यों ही आह्वान नहीं किया था कि ये मौका है, अंतरराष्ट्रीय मीडिया को चाहिए कि वह भारत का दबा हुआ हाल सबके सामने लाने में लग जाए। उन नेताजी के लिए तो ट्रंप नहीं आ रहे थे, एक अंतरराष्ट्रीय लीडर की शक्ल में जबर्दस्त मौका आ रहा था सो दुश्मनी में यह राजनीतिक पटखनी देनेवाला 'दांव' जरूरी था। ऐसे कई दांव, दांव पर लगे हैं। लेकिन ये देश के लिए बड़े महंगे दांव हैं। भय का अपना धंधा होता है और उपद्रवियों के लिए यह सर्वाधिक मुफीद खुराक होती है।

आंदोलनों से नैतिक नियंत्रण हट जाए तो वह उन्मादी भीड़ में बदल सकता है, इस खतरे को वे अच्छी तरह जानते हैं। वे इस ताक में रहते हैं कि कब उस भीड़ के हाथों व्यवस्था को बंधक बनाएं और सब तहस-नहस कर दें। भयादोहन उपद्रवियों का प्रिय हथियार होता है। वे जानते हैं कि अराजकता में तंत्र बदनामी से डरता है और शांति वाचाल लोगों के हवाले हो जाती है। राजनीति ठिठक कर अपना लाभांश खोजती है।

हर राजनीतिक पार्टी की रणनीतियों का एक पैटर्न होता है। अगर सत्ता में नहीं है तो राजनीतिक पार्टी सत्ता के रास्ते आसान बनाने के उपाय खोजती है। वह सुविधा से किसी चीज को क्रांति और किसी को जनता की इच्छा ठहरा सकती है। हमारे देश में भारत-विभाजन के अतीत के चलते भय का पैंतरा इस किस्म की सियासत में बड़ा कारगर साबित होता है। हाल के महीनों में इसका नया नक्शा उभर कर आया है। इसीलिए अराजक तत्वों ने इसे 'सीएए' के बहाने पुराने घाव कुरेदने का सबसे शानदार मौका समझा।

दिल्ली में उपद्रवियों ने अभी कुछ खास इलाके चुने हैं। उनका एक सुनियोजित पैटर्न है। समुदायों के बीच अविश्वास की रेखा पर खड़े होकर ये तत्व पहले अपने तरीकों से व्यवस्था को उकसाते हैं। फिर पीछे बैठे-बैठे भीड़ के भय को एक आकार देते हैं। यदि तर्कों का कवर मिल जाए तो कहना ही क्या? चूंकि वे कोई सविनय अवज्ञा आंदोलन के कार्यकर्ता नहीं बल्कि अचानक भीड़ में प्रकट होने वाले तत्व होते हैं। वे उसी गति से विलुप्त भी हो जाते हैं। लेकिन तब तक पिस्तौलें, पत्थर, पेट्रोल बम और सरिये भीड़ के वक्तव्य बन कर छा जाते हैं।

अब कोई परदा नहीं बचा है। हम चाहे सार्वजनिक तौर पर स्वीकार न करें लेकिन यह सच है कि पूरे देश में उस पैटर्न पर काम हो रहा है। जहां केंद्र की सत्ताधारी पार्टी और राज्य की सत्ताधारी पार्टी अलग-अलग है वहां उसकी शक्ल कुछ और है। सांप्रदायिकता के तंदूर को इस स्तर तक दहकाने की कोशिश है। क्या आगजनी, पत्थरबाजी, जनजीवन को रोक देने और शांति को बंधक बना लेने से भय के अतिरिक्त कोई और रूपबंध बनता है?

यह हर तरफ से घोर सांप्रदायिक है, डरा देने वाला है और संसदीय लोकतंत्र की आत्मा पर घाव करने वाला है। हम भय की भीड़ और भीड़ के भय से खुद को बंधक बना हुआ महसूस कर रहे हैं तो क्या यह हमारी नाकामी नहीं है। उन उदास सुबहों और डराती दुपहरियों में जागने की जिम्मेदारी राजनेताओं पर छोड़कर हम मुक्त नहीं हो सकते। जो सोया हुआ हो, उसे जगाया जा सकता है लेकिन जो सोने का नाटक कर रहा हो, वह कैसे जगेगा?

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