दिल्ली की हवा और भी खराब

गार्डिनर हैरिस Updated Mon, 27 Jan 2014 07:28 PM IST
Delhi's air most worst
जनवरी के मध्य में बीजिंग (चीन) में जब धुंध छाई, तो वहां की सरकार ने न सिर्फ स्वास्थ्य चेतावनियां जारी कीं, बल्कि चार बड़े हाई-वे भी बंद कर दिए। इसके अतिरिक्त वायु को फिल्टर (स्वच्छ) करने वाले मास्क खरीदने और उसके इस्तेमाल की सलाह भी लोगों को दी गई। लेकिन नई दिल्ली में जब घना कोहरा (वायु प्रदूषण के खतरनाक स्तर तक पहुंचने का यह भी एक मापक है) छाया, तो अक्सर शोर मचाने वाले देश के मीडिया में इसे लेकर बहुत कम चिंता दिखाई दी। यहां तक कि ट्वीटर जैसे मंच पर भी इसे लेकर कम ही बातें हुईं।

बेशक बीजिंग की गिनती दुनिया के सबसे अधिक प्रदूषित प्रमुख शहरों में होती है। लेकिन दोनों शहरों (नई दिल्ली और बीजिंग) से इकट्ठे किए गए प्रदूषण के प्रतिदिन के आंकड़े बताते हैं कि नई दिल्ली की वायु में प्रदूषण फैलाने वाले खतरनाक सूक्ष्म कणों की संख्या बीजिंग की वायु के मुकाबले अधिक हैं। बल्कि प्रदूषण के लिहाज बीजिंग में सबसे खराब दिन जैसी हालत तो दिल्ली में औसतन रोज होती है।

बीजिंग में जनवरी के मध्य में पीएम 2.5 (ऐसा सूक्ष्म कण, जिसका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर से कम होता है और चूंकि अतिसूक्ष्म आकार के कारण यह फेंफड़ों तक आसानी से पहुंच सकता है, इसलिए इसे मारक भी अधिक माना गया है) जैसे खतरनाक सूक्ष्म कण इस वर्ष पहली बार 500 के उच्चतम स्तर से अधिक थे। लेकिन नए वर्ष के शुरुआती तीन सप्ताह में दिल्ली के पंजाबी बाग इलाके का, जहां अन्य शहरों के मुकाबले पीएम का स्तर अमूमन कम होता है, प्रतिदिन का औसत 473 था, जो बीजिंग के औसतन 227 के दोगुना से भी ज्यादा था। असल में, बीजिंग में सिर्फ 15 जनवरी की रात में पीएम 2.5 का आंकड़ा 500 से पार पहुंचा था, जबकि दिल्ली में ऐसा आठ दिन हुआ। इन तीन सप्ताह में मात्र एक दिन दिल्ली में सूक्ष्म कणों का परिमाण 300 से नीचे था, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तय मानक से बारह गुना ज्यादा था।

कई शोधों में यह बात सामने आई है कि भारत की आबोहवा दुनिया में सबसे खराब है। येल शोधार्थियों का निष्कर्ष है कि सबसे अधिक दस में से सात वायु प्रदूषण वाले देश दक्षिण एशिया में ही हैं। इसकी पुष्टि हाल ही एक शोध से भी होती है, जिसमें बताया गया है कि दुनिया में सबसे कमजोर फेफड़े भारतीयों के होते हैं। इसकी वजह है भारत की प्रदूषित हवा, खस्ताहाल स्वच्छता और दूषित जल। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, श्वांस संबंधी आनुवांशिक बीमारियों से होने वाली मौत की दर भारत में सर्वाधिक है और अस्थमा से होने वाली मौत के मामले में भी यह आगे है।

क्लीन एयर एशिया नामक संगठन ने अपने शोध में पाया है कि वर्ष 2011 के छह महीनों की अवधि में बीजिंग में पीएम 10 (जिस कण का व्यास 10 माइक्रोमीटर से कम होता है) का औसत 117 था, जबकि सरकारी आंकड़ों के आधार पर सेंट्रल फॉर साइंस ऐंड इन्वायरमेंट का निष्कर्ष है कि वर्ष 2011 में नई दिल्ली में पीएम-10 का औसत 281 था, जो बीजिंग के मुकाबले ढाई गुना ज्यादा था। इतना ही नहीं, चिंतनीय यह भी है कि दिल्ली में महीन कण के प्रदूषण का स्तर पिछले साल की तुलना में 44 प्रतिशत ज्यादा है, क्योंकि पिछले वर्ष शुरुआती तीन सप्ताह में यह औसतन 328 था। ये महीन कण न सिर्फ अकाल मृत्यु और हृदयाघात के कारक हैं, बल्कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पिछले अक्तूबर में यह स्पष्ट किया था कि इससे फेफड़े का कैंसर भी हो सकता है।

मगर दिल्ली की नई राज्य सरकार ने जो अपनी 18 प्राथमिकताएं रखी हैं, उनमें वायु प्रदूषण शामिल नहीं है। यही नहीं, पिछले वर्ष दिसंबर में ही देश की वन और पर्यावरण मंत्री को इसलिए हटना पड़ा, क्योंकि उन्हें अहम औद्योगिक परियोजनाओं की राह में रोड़ा माना जा रहा था। उनके हटने के बाद नए मंत्री ने फौरन कई परियोजनाओं को आगे बढ़ाया, मगर इससे प्रदूषण में और इजाफा हो सकता है।

2010 में हुए एक शोध में यह बात सामने आई कि अनिवासी भारतीयों के अमेरिका में पैदा हुए और वहां पले-बढ़े बच्चों का फेफड़ा भारत में पैदा होने वाले बच्चों की तुलना में अधिक मजबूत होता है। यह शोध करने वाले हैमिल्टन स्थित मैकमास्टर यूनिवर्सिटी के रेस्पाइरोलॉजी (श्वांस संबंधी) विभाग के सहायक प्रोफेसर मिलिन्ह डुओंग के मुताबिक, इसके पीछे अनुवांशिकता नहीं, बल्कि खराब पर्यावरण जिम्मेदार है। एयर फिल्टर बनाने वाली स्वीट्जरलैंड की कंपनी आईक्यू एयर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी का कहना है कि भारत की तुलना में चीन में उनका उत्पाद सैंकड़ों गुना ज्यादा बिकता है, क्योंकि चीन में लोग वायु प्रदूषण को लेकर अत्यधिक संजीदा हैं, खासकर अपने बच्चों को लेकर, लेकिन भारतीयों में ऐसी मानसिकता नहीं पनप सकी है।

वाकई दिल्लीवालों से बात करें, तो वे प्रदूषण के इस स्तर से अंजान हैं। उन्हें नहीं पता कि उनके आसपास की हवा किस स्तर तक खतरनाक हो चुकी है। वर्ष 1998 में भारत की सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली की टैक्सी, ऑटो और बसों को सीएनजी करने का आदेश दिया था, लेकिन इसका नतीजा ज्यादा सकारात्मक इसलिए नहीं दिख रहा, क्योंकि दिल्ली की सड़कों पर कारों की बाढ़ है। 1970 के दशक में दिल्ली की सड़कों पर करीब आठ लाख गाड़ियां दौड़ा करती थीं, पर अब इनकी संख्या 75 लाख से अधिक हो चुकी है, जिसमें 1,400 गाड़ियां प्रतिदिन जुड़ रही हैं। ऐसे वक्त में जब वायु प्रदूषण के खिलाफ देश-दुनिया में लगातार बातें हो रही हैं, चर्चा-परिचर्चाएं की जा रही हैं, तो क्या भारत में पर्यावरण प्रदूषण एक बड़ा मुद्दा नहीं बनना चाहिए, और क्या भारत सरकार से यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि वह लोगों के स्वास्थ्य को लेकर कितनी संजीदा है?

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