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दिल्ली आप के साथ

Neerja Chowdharyनीरजा चौधरी Updated Wed, 12 Feb 2020 03:20 AM IST
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आम आदमी पार्टी
आम आदमी पार्टी - फोटो : a
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दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी एक बार फिर प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में लौट आई है। इस जनादेश का सबसे बड़ा संदेश यह है कि दिल्ली के लोगों ने काम को महत्व दिया है। भाजपा ने शाहीन बाग को केंद्र बनाकर राष्ट्रवाद के मुद्दे को हवा देने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। हिंदू-मुस्लिम, भारत-पाकिस्तान जैसे मुद्दे के जरिये उसने वोटों के ध्रुवीकरण की भरपूर कोशिश की। केंद्र सरकार के कई मंत्री, दो सौ से ज्यादा सांसद, अन्य राज्यों के कई राजग के मुख्यमंत्री-सबको को इस चुनाव में झोंक दिया गया था। केंद्र सरकार के मंत्री दरवाजे-दरवाजे जाकर पर्चे बांट रहे थे और भाजपा के पक्ष में वोट करने की अपील कर रहे थे। इन सबके बावजूद दिल्ली की जनता ने एक बार फिर से अरविंद केजरीवाल पर भरोसा जताया।
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इसका मतलब है कि दिल्ली के लोग चाहते हैं कि पिछले पांच साल में जो काम हुआ है, वह आगे भी जारी रहे। यह नहीं कि सब कुछ हो गया है, बल्कि उन्होंने आम आदमी पार्टी का जो काम देखा है, उसकी नीयत देखी है, उस पर अपना भरोसा जताया है। कहने का मतलब है कि कहीं न कहीं काम बोला है और यह बहुत बड़ी चीज है, क्योंकि देश भर में इसका एक संदेश जाएगा कि जनता काम पर वोट करती है। मैं सिर्फ उन विपक्षी दलों की सरकारों की बात नहीं कर रही हूं, जो आम आदमी पार्टी के कार्यक्रमों की नकल करना चाहेंगे। जैसे हेमंत सोरेन, अजीत पवार और तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने कहा कि हम भी ऐसा करेंगे। मुझे लगता है कि भाजपा के मुख्यमंत्री भी इस मॉडल को अहमियत देंगे।

दूसरी चीज जो है, वह यह कि अरविंद केजरीवाल ने शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी, सीसीटीवी कैमरा, महिलाओं को बसों में मुफ्त यात्रा, जैसे मुद्दों पर काम करके दिखाया और इसकी मार्केटिंग भी अच्छी तरह से की, क्योंकि जिस भी मतदाता से आप बात करते, तो वे ये सब चीजें गिना देते थे कि अरविंद केजरीवाल ने यह सब किया है। इसके अलावा उन्होंने एक और काम जो किया, वह यह कि हिंदू मतदाताओं को उन्होंने उस भाषा में संबोधित किया, जिससे कि हिंदू मतदाता खुद को जुड़ा हुआ महसूस करें। अन्य विपक्षी पार्टियां ऐसा नहीं कर पाई हैं। इसे सॉफ्ट हिंदुत्व नहीं कह सकते, क्योंकि उन्होंने मुसलमानों के खिलाफ नहीं बोला। शाहीन बाग के मुद्दे पर मनीष िससोदिया ने बयान दिया था, जिससे उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्र में मुश्किलों का सामना करना पड़ा। लेकिन अरविंद केजरीवाल ने उसे सुधार दिया। उन्होंने हनुमान चालीसा का पाठ किया, हनुमान मंदिर गए। उन्होंने देशभक्ति का मतलब बताते हुए कहा कि देशभक्ति का मतलब 'हिंदू-मुस्लिम' का विवाद खड़ा करना नहीं है, बल्कि लोगों को स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार उपलब्ध कराना है। ऐसा कहकर उन्होंने स्पष्ट किया कि हम कट्टर देशभक्त हैं। इस तरह से उन्होंने देशभक्ति का जो आख्यान गढ़ा है, वह भाजपा के राष्ट्रवाद के आख्यान का मुकाबला करने के लिहाज से दिलचस्प है। उन्होंने साफ किया कि हम हिंदू विरोधी नहीं हैं और हम सिर्फ मुसलमानों के साथ नहीं हैं। मुझे लगता है कि रामभक्त हनुमान उनका आइकॉन बनने वाले हैं।  जहां भाजपा के लोग जय श्रीराम के नारे लगाते थे, वहीं इन्होंने जय बजरंगबली के नारे दिए। इस संदर्भ में सबसे दिलचस्प चीज जो उभरकर आई, वह यह कि भाजपा के जनाधार हिंदू मतदाताओं को वह अपने खेमे में लाना चाहते हैं, क्योंकि हिंदू मतदाता ही इनके भी जनाधार हैं। भाजपा को जब लगा कि उनके असली मतदाता भी आम आदमी पार्टी की तरफ खिसक रहे हैं, तो उनके कान खड़े हुए और उन्होंने राष्ट्रवाद के मुद्दे को तेजी से उछालना शुरू कर दिया। बेशक उनकी ध्रुवीकरण की कोशिश कुछ हद तक कामयाब हुई है, लेकिन जब भाजपा के लोगों ने गोली मारो ...जैसे नारे लगाने शुरू किए, तो इसे बहुत से हिंदू मतदाताओं ने भी स्वीकार नहीं किया। मैं समझती हूं कि अगर इस तरह का नारा भाजपा की रैलियों में नहीं लगाया जाता, तो शायद भाजपा को कुछ और सीटें मिलतीं।

दिल्ली के नतीजे को देखते हुए लग रहा है कि राज्यों में भाजपा को टक्कर देने का साहस विपक्षी दलों में बढ़ रहा है। एक साल के भीतर भाजपा छह राज्यों में चुनाव हार चुकी है। दिल्ली में तो लोकसभा चुनाव में भाजपा ने सातों सीटों पर जीत हासिल की थी, लेकिन विधानसभा चुनाव में बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। जिन राज्यों में विपक्ष के पास कोई चेहरा है और भाजपा का मुकाबला करने के लिए वैकल्पिक रणनीति है, वहां भाजपा हार रही है। बेशक राष्ट्रीय स्तर पर  नरेंद्र मोदी का प्रभाव अब भी कायम है, पर राज्य नेतृत्व की कमी की भरपाई वह नहीं कर पा रहे हैं। शुरू में बेशक उनके नाम पर राज्यों का चुनाव भाजपा जीत जा रही थी, लेकिन आज वैसा संभव नहीं हो पा रहा है। राज्यों के चुनाव में लोग बुनियादी मुद्दों पर वोट कर रहे हैं। रोजी-रोटी का सवाल राज्यों में एक बड़ा मुद्दा बन रहा है।

दूसरी बात यह है कि शिक्षा और चिकित्सा के अरविंद केजरीवाल के मॉडल को विपक्षी दलों के साथ भाजपा भी राज्यों में लागू कर सकती है। तीसरी बात यह है कि कांग्रेस ने इस लड़ाई से अपना हाथ खींच लिया था। संभवतः वह नहीं चाहती थी कि भाजपा विरोधी मतों में बंटवारा हो। कह सकते हैं कि कांग्रेस ने अपना बड़ा दिल दिखाया है, क्योंकि आम आदमी पार्टी से पंजाब में उसी को नुकसान होने वाला है। इसके अलावा मुझे लगता है कि विपक्षी दलों के नेतृत्व में तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने वाले अरविंद केजरीवाल की अहमियत बढ़ेगी। उन्हें एक नया सम्मान मिलेगा।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि आम आदमी पार्टी में जो आतिशी मर्लेना, राघव चड्ढा जैसे नए चेहरे दिखाई दे रहे हैं, वे इस बात का संकेत है कि भारतीय राजनीति में नेतृत्व की एक नई पीढ़ी उभरकर सामने आ रही है, जो राजनीतिक पृष्ठभूमि के भी हैं और आंदोलन की पृष्ठभूमि के भी। ये लोग अपने निजी हितों के लिए नहीं, बल्कि मुद्दों के लिए लड़ रहे हैं। नेतृत्व की इस नई पीढ़ी में महिलाएं बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं, जैसा कि हम विभिन्न आंदोलनों में देख रहे हैं। आज जो मुस्लिम महिलाएं तिरंगा लहरा रही हैं, गालों पर तिरंगे को पेंट करवा रही हैं, संविधान की बातें कर रही हैं, वे वापस बुर्के में नहीं जाने वाली हैं।
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