{"_id":"5fab08f36b0def5c7759c602","slug":"deepawali-arrived-but-deepak-raga-is-lost-from-the-world","type":"story","status":"publish","title_hn":"दीपक राग अब लुप्त, संगीत सम्राट तानसेन के बाद इसे गाने की हिम्मत किसी की नहीं हुई","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
दीपक राग अब लुप्त, संगीत सम्राट तानसेन के बाद इसे गाने की हिम्मत किसी की नहीं हुई
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तानसेन
दीपावली आ गई, पर दीपक राग अब दुनिया से लुप्त हो चुका है। संगीत सम्राट तानसेन के बाद इस राग को गाने की हिम्मत किसी की नहीं पड़ी। कभी दीपावली पर संगीतकार दीपक राग गाया करते थे। दीपावली पर दीपक राग गाने से इससे निकलने वाली ऊष्मा दीये की लौ में समा जाती है और उसका कोई दुष्प्रभाव गाने और सुनने वाले के शरीर नहीं पड़ता। इसलिए गायक दीपक राग को दीपावली की रात दूसरे पहर में गाते थे। कहते हैं कि दीपक राग भगवान शिव के मुख से उत्पन्न हुआ है। इसके अधिष्ठाता देवता भगवान सूर्य और अग्नि हैं। दीपक राग सात सुरों से युक्त है। राधा गोविंद संगीत सार नामक ग्रंथ में कहा गया है कि यह देवलोक का राग है। संगीत सम्राट तानसेन इसके अंतिम गायक थे।
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असली नाम तनसुख तन्ना था
तानसेन का असली नाम तनसुख तन्ना था तथा बड़े होने पर त्रिलोचन पांडे नाम पड़ा। 1486 में उनका जन्म ग्वालियर के पास के एक गांव में मकरंद पांडे के घर में हुआ था। बचपन से ही तनसुख पशु-पक्षियों की आवाज की नकल करता था और बहुत सुंदर गाता था। जंगल में स्वामी हरिदास की नजर तनसुख पांडे पर पड़ी, तो उन्होंने उसके पिता से मांग कर उसे संगीत सिखाया। उन्होंने ग्वालियर की महारानी मृगनयनी से भी संगीत सीखा और उन्हीं की दासी हुसैनी से विवाह किया।
पहले तानसेन को शेरशाह सूरी के पुत्र दौलत खान सूरी ने आश्रय दिया बाद में बांधवगढ़ रीवा के बघेल राजा रामचंद्र जूदेव ने तनसुख पांडे को अपना राज गायक नियुक्त किया। इस तरह तनसुख पांडे के परिवार का गुजारा होने लगा। कहते हैं कि एक बार अकबर के दरबारी अबुल फजल ने तनसुख की गायकी सुनी तो अकबर से उन्हें आगरा दरबार में बुलाने को कहा। रामचंद्र जूदेव ने बहुत मना किया कि तनसुख उनके दरबार से न जाएं, पर अकबर द्वारा फौज भेज देने के कारण जूदेव को उन्हें भेजना पड़ा। अकबर ने उन्हें इतना मान दिया कि वह अकबर के नौ रत्नों में संगीत रत्न हो गए। अकबर ने उनकी गायन शैली से प्रभावित होकर उन्हें तानसेन नाम दिया और संगीत सम्राट कहा।
कहते हैं कि अकबर हर बात में तानसेन की सलाह लेते थे, जिससे कुछ दरबारी उनके विरोधी हो गए। उन्होंने अकबर के कान भर दिए कि तानसेन दुर्लभ दीपक राग गा लेते हैं, इसलिए उनसे दीपक राग सुना जाए। तानसेन ने बहुत समझाया कि दीपक राग गाने से बहुत ऊष्मा निकलती है और दीपावली के अतिरिक्त किसी और दिन गाने पर गाने और सुनने वाले का नुकसान हो सकता है। लेकिन अकबर ने नहीं माना, तो मजबूर होकर तानसेन को दीपक राग गाना पड़ा। दीपक राग सुनाने पर दीपक तो जल गए, पर तानसेन के शरीर में भयंकर गर्मी उत्पन्न हो गई। दरबार में उपस्थित श्रोता भी गर्मी से परेशान हो, इधर-उधर भागने लगे। अकबर भी बेचैन हो उठा।
तानसेन के शरीर से चिंगारियां निकलने लगीं, तो वह भागकर अपने घर गए और वहां उनकी पुत्री ने मल्हार राग गाकर उनके शरीर की गर्मी शांत की। कहते हैं, उस दिन तो तानसेन ठीक हो गए,, पर उन्हें बुखार रहने लगा और तीन साल बाद बीमार तानसेन इस दुनिया से विदा हो गए। इस तरह संगीत के एक महान नायक का अवसान हो गया। उनकी इच्छा के अनुसार उनके पार्थिव शरीर को उनके गुरु मोहम्मद गौस खान की कब्र के पास दफनाया गया। आज भी उनकी समाधि वहीं पर है। 30 दिसंबर को हर साल ग्वालियर में मध्य प्रदेश सरकार तीन दिन का तानसेन संगीत समारोह आयोजित करती है।
संगीत मनीषियों का कहना है कि दीपक राग रात्रि में दूसरे पहर में गाया जाने वाला राग है। पुरुष राग के छह रागों में दीपक और मल्हार राग प्रमुख हैं। तानसेन ध्रुपद गायक थे और उन्होंने मियां की तोड़ी, दरबारी कान्हड़ा आदि रागों की रचना की। तानसेन की लिखी तीन पुस्तकें भी बताई जाती हैं- संगीत सार, राग माला और गणेश स्तुति। तानसेन की टक्कर के संगीतकार और गायक बैद्यनाथ उर्फ बैजू बावरा तथा कर्ण बताए जाते हैं। कहते हैं कि बैजू बावरा ने अकबर के दरबार में तानसेन को प्रतियोगिता में हरा दिया था। दीपावली के दिन दीपक राग के गायन से उत्पन्न ऊर्जा-उष्मा दीपक की लौ में समा जाती थी। दीपावली की रात झिलमिल ज्योति पुंजों के साथ दीपक राग गाने से इसकी महत्ता
बढ़ जाती है और यह शुभ फल प्रदान करता है।