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ऐसे ही नहीं हुए हैं नामवर

Tue, 02 Aug 2016 06:03 PM IST
संदीप जोशी
संदीप जोशी Updated Tue, 02 Aug 2016 06:03 PM IST
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Debate over Namvar singh Birthday celebration
नामवर सिंह

नामवर सिंह जी नामवर हैं, यह बताने की अपनी कूवत नहीं है। बस मन में कौंध रहा था कि एक विद्वान मनीषी का जन्मदिन कौन मनाए या कौन न मनाए, पर बवाल क्यों मचना चाहिए? क्यों समाज में उनके होने, रहने और डटे रहने का उत्सव नहीं मनना चाहिए?

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राजनीति में ‘लेफ्ट’ कौन होते हैं? ‘राईट’ किनको होना चाहिए? अगर साहित्य में भी पक्ष-विपक्ष देखना पड़े, तो समाज में निष्पक्षता कौन ला सकता है? साहित्य की ही लड़ाई तो आमने-सामने बैठ कर अहिंसक तौर पर लड़ी जा सकती है। राजनीति की तरह विरोधाभासी दांव-पेंच मारने या पीठ पीछे की तिकड़म लड़ाने की पैंतरेबाजी की साहित्य में कोई जगह नहीं होती है। विवेक ही किसी विचार को न मानने की समझ के साथ उसको सुनने की सहनशीलता भी देता है। इसलिए नामवर जी को सुनना बेहद रोचक और रोमांचकारी होता है। इसे सौभाग्य ही मानना होगा, जो दो अलग-अलग सार्वजनिक जगहों पर नामवर जी का जन्मदिन मनाया गया। 27 जुलाई को राजकमल प्रकाशन के अशोक माहेश्वरी ने, तो 28 जुलाई को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के रामबहादुर राय ने उनका जन्मदिन मनाया। इन दोनों आयोजनों में विभिन्न विधा के लोगों को नामवर जी ने अपनी खास शैली में संबोधित किया। वे समाज के वैचारिक शिखर पर खड़े हैं।
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लेखक, पत्रकार और साहित्य समाज ने जब नामवर जी की लंबी उम्र की कामना की, तो वह बोले ‘मैं और जीना चाहता हूं ताकि आप लोगों को हर साल मिलता रहूं, देखता रहूं’। अगले दिन के कार्यक्रम में भी तमाम पत्रकार और साहित्यकर्मियों के अलावा राजनेता भी मौजूद थे। उसमें नामवर जी ने इच्छा तो लंबा जीने की ही रखी, पर जीने का उद्देश्य बदल दिया। वह बोले ‘मैं कम से कम सौ साल तो जीना ही चाहता हूं। और कुछ दिन और, कुछ लोगों के दिल को अच्छी तरह से दलना भी चाहता हूं।' नामवर जी की विरासत उनके वैचारिक कैनवास का कैलास है, जिस पर बैठकर वह चारों धाम की यात्रा किए विवेकी साधू की तरह धुनी रमाते दिखते हैं। काशी के कबीर की समग्रता में, और तुलसी के रस में उनकी शिक्षा हुई। उनमें अगर कबीर का फक्कड़पन रहा है, तो तुलसीदास का दीवानापन भी है।
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नामवर जी साहित्य को ही अपनी कर्मभूमि मानते हैं। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि इस आधुनिक युग में अगर राजनीति के स्पर्श से कुछ नहीं बचना है, तो फिर साहित्य की क्या विसात! मगर उनमें जो असीम जिजीविषा है, उसी से वह यह भी मानते हैं कि उनका जो काम है, वह अहले सियासत जाने/ अपना पैगाम मोहब्बत है, जहां तक पहुंचे। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र द्वारा उनके जन्मदिन को मनाने पर साहित्यकारों का एक धड़ा इसके खिलाफ हो गया था। बहस चली कि सत्ता पक्ष द्वारा मनाए जा रहे उत्सव में नामवर जी कैसे शरीक हो सकते हैं। इस पर भी उनने तंज कसते हुए खूब कहा, जाहिरे तंग नजर ने मुझे काफिर जाना/ और काफिर ये समझता है मुसलमां हूं मैं। नामवर सिंह न तो साहित्यिक जमात की कुंठित बहस में पड़े, न सत्ता के वैभव से ग्रसित हुए। वह कबीर की तरह काशी की कर्मभूमि में जमे हैं। और तुलसी के दीवानेपन में अपनी अनूठी राग अलाप रहे हैं। वह साहित्य के लिए जन्मे हैं और उसी को जी रहे हैं।

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