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माओवाद की चुनौती से निपटना
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मारूफ रजा
केंद्र सरकार अब नक्सली खतरे से लड़ने के लिए हमारे उत्पीड़ित पुलिस बलों को प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता प्रदान करने के लिए सेना और वायुसेना के इस्तेमाल पर विचार कर रही है। वास्तव में यह एक अच्छा विचार है। इस तरह का विचार सीआरपीएफ जवानों के एक बड़े जत्थे पर माओवादियों द्वारा किए गए ताजा हमले के बाद आया है, जो हमें फिर उस सबक की याद दिलाता है, जो इसी क्षेत्र में इससे पहले सीआरपीएफ जवानों पर हुए सिलसिलेवार हमले के बाद हमने नहीं सीखा या उस पर अमल नहीं किया। विगत 24 अप्रैल को छत्तीसगढ़ में सुकमा के जंगलों में पिछले सात वर्षों में सबसे घातक हमला हुआ, लेकिन उससे एक महीना पहले भी सीआरपीएफ पर माओवादियों ने हमला किया था।
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इन हमलों से यह स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ के जंगलों में मिलने वाली चुनौतियों का सामना करने में सीआरपीएफ नेतृत्व असमर्थ है। माओवादियों ने बार-बार सुरक्षा बलों को निशाना बनाया है। भारत के सबसे बड़े अर्धसैनिक बल की कमियों की सूची काफी लंबी है, लेकिन हम सबसे पहले इसकी मुख्य कमियों पर नजर डालते हैं।
सबसे पहली बात, सीआरपीएएफ जैसे अन्य अर्धसैनिक बल गृह मंत्रालय के अधीन हंै, जिनका नेतृत्व किसी आईपीएस अधिकारी को हाथों में होता है। सीआरपीएफ की निराशाजनक स्थिति का दोष भी निश्चित रूप से उसी में निहित है। इस तरह के हर हमले के बाद गृह मंत्री घोषणा करते हैं कि किस तरह से माओवादियों को इसका जवाब दिया जाएगा, लेकिन वास्तव में होता कुछ नहीं है। और हमले पर जांच बिठाई जाती है, लेकिन अक्सर मृतकों पर दोष मढ़ा जाता है। और हमारे बाबू हमेशा की तरह अपना काम करते रहते हैं। स्मरण रहे कि 26/11 की गलती के लिए किसी को दोषी नहीं ठहराया गया। अब यह पूरी तरह से स्पष्ट हो गया है कि न तो गृह मंत्रालय और न ही उसकी लाडली पुलिस इस मामले से निपट सकती है और न ही माओवादियों से निपटने की उनकी कोई गंभीर इच्छा है।
दूसरी बात, जमीनी स्तर पर काम करने वाले और माओवादी/नक्सल-विरोधी अभियानों में लगे होने का दावा करने वाले पुलिस अधिकारियों के बीच संपर्क-संवाद का पूरी तरह से अभाव है। बहुत से बड़े पुलिस अधिकारी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जाने से कतराते रहते हैं। नक्सल-विरोधी अभियान में सैकड़ों सीआरपीएफ बटालियन की तैनाती के बावजूद तीन से अधिक पुलिस महानिरीक्षक स्तर के पुलिस अधिकारी नक्सल-विरोधी अभियान क्षेत्र में कभी नहीं रहे। सीआरपीएफ के एक पूर्व डीजी ने अपने हताश क्षणों में इस तथ्य की पुष्टि इस लेखक के साथ की। उन्होंने बताया कि अपने सबसे अच्छे प्रयासों के बावजूद आईजी रैंक के ज्यादातर अधिकारी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जवानों का नेतृत्व नहीं करना चाहते, वे शहरों के सुविधाजनक शांत क्षेत्रों में काम करना चाहते हैं!
तीसरी बात, इन विशाल जंगलों में स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बिना नक्सल-विरोधी अभियान चलाने वाले जवानों के पास प्रौद्योगिकी का भारी अभाव है। जबकि दुर्गम जंगलों में मानव शक्ति नहीं, बल्कि प्रौद्योगिकी कई गुना बेहतर काम कर सकती है। अफसोस की बात यह है कि इस मामले में सरकार जमीनी स्तर पर जवानों का जीवन बचाने और उनकी कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए जरूरी प्रौद्योगिकी उपलब्ध कराने के बजाय देश के दूसरे हिस्सों में दूसरे अभियानों में लगे थके और परेशान जवानों को नक्सल प्रभावित इलाकों में झोंक देती है।
हैरान करने वाली बात यह भी है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्र की कई पुलिस चौकियों में कोई संचार सुविधा उपलब्ध नहीं है या उनके रेडियो सेट के लिए बैटरी की कमी होती है, या उन्हें लंबी दूरी तक निगरानी करने के लिए ड्रोन या कैमरा उपलब्ध नहीं कराया गया है या उन्हें संघर्ष क्षेत्रो में भेजते हुए पूर्व चेतावनी देने या प्रशिक्षण देने की स्पष्ट रूप से उपेक्षा की जाती है। जैसा कि पुलिस गश्ती दल पर नक्सलियों द्वारा बार-बार किए गए हमले और घात लगाकर किए गए हमलों से यह स्पष्ट भी होता है।
इन सभी कमियों का जवाब विशेष रूप से भारतीय सेना में निहित है। सशस्त्र बल सामान्य तौर पर हमारे पुलिस बल, खासकर सीआरपीएफ को जंगली क्षेत्रों में युद्ध की चुनौती से निपटने में विशेषज्ञता कर सकते हैं। भले ही नक्सली या माओवादी खतरों का मुकाबला करने के लिए सेना के जवानों के इस्तेमाल को लेकर सैन्य हलकों में अनिच्छा दिखती है, लेकिन परामर्शदाता और नक्सल-विरोधी अभियान में शामिल बल का नेतृत्व करने में सैन्य अधिकारियों की भूमिका पर जरूर विचार किया जाना चाहिए।
भरतीय सेना ने छत्तीसगढ़ के मुकाबले पूर्वोत्तर के मुश्किल क्षेत्रों में उग्रवाद-विरोधी अभियानों में अच्छे कार्य का प्रदर्शन किया है और शायद ही इसे कभी असावधान पाया गया है। ऐसे में कोई कारण नहीं है कि हमारे सैन्य अधिकारियों (आदर्श रूप में स्वेच्छा से) को सीआरपीएफ के डीआईजी/आईजी/डीजी स्तर के नेतृत्व की कमी को पूरा करने के लिए नहीं भेजा जाना चाहिए। त्वरित प्रोन्नति देकर उन्हें इसके लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। और भारतीय वायुसेना के (सीमित) संसाधनों को गैर-जंगी हवाई टोही विमान और मेडी-इवेक आदि के लिए उपलब्ध कराया जा सकता है। माओवाद की समस्या हमारी आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है और इसलिए हमारी सेना को इसमें मदद का प्रस्ताव जरूर देना चाहिए और सीमा पार के दुश्मनों से लड़ने के लिए ही इंतजार नहीं करना चाहिए। अगर इस दिशा में कदम उठाए गए, तो नक्सली हमलों को निश्चित तौर पर चुनौती दी जा सकती है।