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नए नेपाल से निपटते हुए
महेंद्र वेद
Updated Sun, 08 Apr 2018 07:47 PM IST
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मोदी-ओली
चीन के वर्चस्व ने वैश्विक मामलों को प्रभावित किया है, लेकिन भारत के निकट पड़ोसियों पर उसका जितना प्रभाव पड़ा है, उतना और कहीं नहीं। इस क्रम में वह नेपाल में व्यापक बदलाव के लिए तैयार है। नेपाल अपनी आपूर्ति और ईंधन के लिए पूरी तरह भारत पर निर्भर है। चीन की तुलना में भारत के साथ उसके बहुत पुराने सांस्कृतिक- सामाजिक संबंध भी हैं। पर अब जब भारत के साथ उसके रिश्ते परेशानी से भरे हैं (चाहे भारत के लोग इसे स्वीकार करना पसंद करें या नहीं), चीन उसके साथ रिश्ते मजबूत करने का आकांक्षी है। सदियों तक भारत की ओर देखने के बाद अब नेपाल हिमालय के पार देखना चाहता है।
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राजशाही समाप्त होने के बाद पहली बार नेपाल की सरकार स्थिर और व्यापक बहुमत में है। वहां के मार्क्सवादी-लेनिनवादी प्रधानमंत्री खड्ग प्रसाद शर्मा ओली, जो माथे पर तिलक लगाते हैं, भारत और चीन के साथ ज्यादा न्यायसंगत रिश्ते चाहते हैं। वह अपने दोनों विशाल पड़ोसी के साथ अपनी वर्षों पुरानी नीति को व्यापक संतुलन के साथ लागू करना चाहते हैं। भारत को अपने हितों से समझौता किए बिना उससे बेहद सावधानी से निपटने की जरूरत है। ऐसा करना कठिन है। ओली और उनके कम्युनिस्ट साथियों के साथ चीन की आत्मीयता है। चीन का उनसे राजनीतिक और वैचारिक संबंध हों न हों, पर आर्थिक-रणनीतिक संबंध गहरे हैं। दक्षिण एशिया के ज्यादातर देशों की तरह नेपाल अब भारत का पिछलग्गू नहीं है।
2016 में ओली की नई दिल्ली यात्रा के बाद से, जब नेपाल भारत की ओर से अघोषित नाकेबंदी झेल रहा था, घरेलू राजनीति और क्षेत्रीय गतिशीलता में काफी बदलाव आया है। जब-जब ऐसा किया गया है, भारत ने नेपाली लोगों की सद्भावना खो दी है। भारत-विरोधी होना नेपालियों के लिए राजनीतिक रूप से सही माना जाता है। भारत की चुनौती अपने सभी छोटे-बड़े पड़ोसियों से निपटने में है, पर वे सभी चीन के आर्थिक शिकंजे और भू-राजनीतिक पकड़ के दायरे में हैं।
अपने पड़ोसियों के साथ रिश्ते बेहतर बनाने में भारत ने कैसे अवसर गंवाए, यह कहना आसान है, पर बेहतर है कि हम पिछली गड़बड़ियां छोड़ आगे की तरफ देखें और चीनी चुनौती को देखते हुए अब हर रिश्ते को ज्यादा सजगता से सार्थक बनाएं। प्रधानमंत्री बनने के बाद नेपाल के साथ बेहतर रिश्ता बनाने की दिशा में अपनी पहली यात्रा के साथ मोदी ने अच्छी शुरुआत की थी, पर भूकंप के बाद भारत की ओर से अत्यधिक राहत ने नेपालियों को कृतज्ञ होने के बजाय सामूहिक रूप से तुच्छता का एहसास कराया। पिछले चार साल में भारत-नेपाल रिश्ते में काफी खटास आई है, जिसे गंभीरता से सुधारने की जरूरत है।
भारत ने 1950 की उस द्विपक्षीय संधि की समीक्षा की मांग पर सहमति जताकर बेहतर संकेत दिया है, जिसे न सिर्फ नेपाल, बल्कि वहां के मुखर मध्यवर्गीय लोग एकतरफा और अन्यायपूर्ण मानते रहे हैं। नेपाल उस संधि और खुली सीमा से लाभ उठाता है, पर जनधारणा का भी मतलब होता है। तथ्य यह है कि भारत के संबंध (चाहे संप्रग सरकार हो या राजग) नेपाली कम्युनिस्टों के साथ असहज रहे हैं और यह दिखा है।
संधि की समीक्षा के लिए तत्परता के अलावा मोदी सरकार के सौहार्दपूर्ण दृष्टिकोण ने प्रतीकात्मक प्रभाव डाला है। अपनी तरफ से ओली ने भी अपनी नीति में परिवर्तन किया है। उन्होंने अपने पहले कार्यकाल के दौरान पहले चीन की यात्रा कर भारत को नाराज कर दिया था और फिर भारत पर सत्ता से हटाने का आरोप लगाया। पर दूसरे कार्यकाल में उन्होंने उसमें सुधार करते हुए अपनी पहली विदेश यात्रा के तौर पर भारत को चुना। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने उनका स्वागत किया। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी ओली का स्वागत करते हुए 'विशेष साझेदारी' पर जोर दिया। उन्होंने ओली को आश्वस्त किया कि 'नेपाल की स्थिरता और आर्थिक समृद्धि' में ही भारत का स्थायी हित है। नेपाल में चीन के प्रभावों (वास्तविक और राजनीतिक) पर कोई चिंता या चेतावनी का जिक्र किए बिना मोदी ने दोनों देशों में लोकतंत्र को मजबूत बनाने की बात की।
भारत अब एक नए नेपाल के साथ निपट रहा है। वहां वामपंथी गठबंधन सरकार के चुनाव से वाम दलों की एकजुटता आगे बढ़ेगी, जो विश्व समुदाय के साथ नए तरीके से रिश्ते बनने का संकेत है : यह ज्यादा राष्ट्रवादी होगा, व्यावसायिक दृष्टिकोण बढ़ेगा और विदेशी शक्तियों को नेपाल के आंतरिक मामलों से दूर रहने के प्रति सावधानी बरतनी होगी। अपनी घरेलू राजनीति में सुरक्षित महसूस करते हुए लगता है कि ओली नेपाल को बाह्य तौर पर ज्यादा आश्वस्त रूप में पेश करना चाहते हैं।
इसके लिए नेपाल को दुनिया के साथ जुड़ने की जरूरत है। मोदी ने बिल्कुल सही वायदा किया कि नेपाल की प्राथमिकताओं के आधार पर भारत लगातार उसे समर्थन देगा। इस प्रकार दोनों पक्ष हर तरह की कनेक्टिविटी परियोजना में तेजी लाने पर सहमत हुए हैं। तिब्बत में ल्हासा को काठमांडू से जोड़ने की चीन की कोशिश से भारत घबराया हुआ है। देर से ही सही, पर भारत का यह स्वागतयोग्य कदम है कि एक नई रेलवे लाइन के जरिये काठमांडू भारत से जुड़ जाएगा।
नेपाल में चीन द्वारा बुनियादी ढांचे के निर्माण पर चिंतित होने के बजाय भारत को नेपाल की सड़कों को विकसित करना चाहिए और कोसी, गंडक नदियों के दोहन तथा बिजली उत्पादन में मदद करनी चाहिए और बिजली खरीदनी चाहिए। एक समय था, जब भारत नेपाल पर सफलतापूर्वक यह दबाव डाल सकता था कि वह चीन से रक्षा सामग्री न खरीदे, पर अब समय बदल गया है। भारत नेपाल का सर्वश्रेष्ठ भागीदार बन सकता है, पर किसी विशेष आधार पर नहीं।
बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के अलावा भारत रोजगार सृजन में भी नेपाल की मदद कर सकता है। नेपाल की जरूरतों और चिंताओं को इस तरह भारत संबोधित कर सकता है। यह ऐसा वक्त है, जब भारत नेपाल से दूर जाने का जोखिम नहीं उठा सकता।