फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Deadly decisions of the crowd

भीड़ के जानलेवा फैसले

Tue, 27 Jun 2017 04:23 PM IST
सुभाष चंद्र कुशवाहा
सुभाष चंद्र कुशवाहा Updated Tue, 27 Jun 2017 04:23 PM IST
विज्ञापन
Deadly decisions of the crowd
सुभाष चंद्र कुशवाहा

इतिहास के पन्नों में असुरक्षित और अशिक्षित समाज में परिस्थितिजन्य घटनाओं के कारण भीड़ को हिंसक होते देते देखा गया है। आज आए दिन किसी न किसी को भीड़ द्वारा अफवाहों के सहारे मार देना आम होता जा रहा है। किसान आंदोलनों में भी भीड़ द्वारा व्यापक हिंसा देखने को मिली है। सोशल मीडिया के युग में फर्जी सूचनाओं और फर्जी वीडियो के सहारे भीड़ को उत्तेजित करने का खेल शुरू हो गया है। हिंसक भीड़ अपने कुकृत्यों को अब परिस्थितिजन्य दिखाने की कोशिश करती नजर आ रही है, जो गंभीर चिंता का विषय है। भीड़ को हिंसक बनाने के पीछे कई मनोवृत्तियां एक साथ कार्य कर रही हैं। पहला तो यही कि समाज में बेरोजगारी और आर्थिक विषमताएं जिस तेजी से फैल रही हैं, उन्हें दूर करने की कोई नीति नहीं है।  ऐसे में समाज का सत्ता प्रतिष्ठानों के प्रति जो गुस्सा है, उसके कारण भी कभी-कभी वह हिंसक हो रहा है। इसके अलावा एक छोटा तबका राजनीति के इशारे पर समाज को बुनियादी समस्याओं से भटकाने के लिए अनावश्यक और जान-बूझकर जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्रीयता के नाम पर हिंसक बना रहा है।

विज्ञापन


पुलिस ऐसे मौकों पर सामान्यतः खामोश रहती है या उग्र भीड़ के आगे कानून बौना नजर आता है। तभी तो अदालतों में भी भीड़ हमला कर देती है। हाल के दिनों में भीड़ द्वारा किसी को अकारण मार देने की घटनाएं तेजी से फैली हैं। तथाकथित गौ-रक्षकों द्वारा पशु व्यापारियों को पीट-पीटकर मार देना, मात्र शक के आधार पर किसी की जान ले लेना कि उसके घर पर गाय का मांस है, किसी को आतंकी मानते हुए राष्ट्रभक्ति का प्रमाण देने के लिए भीड़ को हिंसक बना देना आज की सच्चाई है।
विज्ञापन


हरियाणा का हिंसक जाट आंदोलन और जेएनयू के छात्रों की दिल्ली की अदालत में पेशी पर हिंसक भीड़ का आक्रमण हमारी न्याय प्रक्रिया के सामने चुनौती बनकर उभरे हैं। मुंबई में भीड़ ने हिंदी भाषी मजदूरों और ऑटो चालकों के साथ खुलेआम नंगा नाच किया । बंगलूरू में भीड़ द्वारा सड़क दुर्घटना में शामिल होने के संदेह के आधार पर तंजानिया की छात्रा को कार से खीच कर अधनंगा कर दिया गया। दिल्ली में दक्षिण अफ्रीकी छात्रों को शक के आधार पर मारा-पीटा गया। गाड़ियों में मांस या जानवर होने के संदेह पर पुलिस के बजाय भीड़ कार्रवाई करने लगी है। लव जेहाद, वैलेंटाइन डे या पब नियंत्रण के फैसले भीड़ ले रही है। पार्कों में प्रेमी युगलों को  भारतीय संस्कृति सिखाया जा रहा है। ऐसे अराजक कृत्य हमारी लचर कानून व्यवस्था और सत्ता का अराजकता से संबंधों का परिणाम है। धार्मिक उग्रता के फैलाव के चलते पढ़े-लिखे लोग भी हिंसक मनोवृति के शिकार होते जा रहे हैं। समाज का सांप्रदायीकरण कर सत्ता सुख प्राप्त करने की मनोवृत्ति ने आम लोगों के अंदर कानून की अवहेलना की संस्कृति बो दी है। धार्मिक  संस्थानों और आयोजनों के लिए कानून मायने नहीं रखता।
विज्ञापन
विज्ञापन


यह सही है कि हमारी व्यवस्थापिका संवेदनशील नहीं है। समाज पर उसका प्रभावी नियंत्रण नहीं  है। समाज के अंदर भी हमने दायित्वबोध पैदा नहीं किया है। लोगों का आक्रोश दर्शा रहा है कि व्यवस्था के प्रति अविश्वास उनमें किस हद तक गहरा गया है। फिर भी कानून को अपने हाथ में लेने की प्रवृत्ति चिंता का विषय है। इससे अराजकता फैलती है, व्यवस्था चरमराती है और हम कबीलाई संस्कृति की ओर बढ़ते दिखाई देते हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed