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उच्च शिक्षा का घातक एजेंडा
सुभाष चंद्र कुशवाहा
Updated Wed, 28 Nov 2012 09:42 PM IST
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मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री ने विश्वविद्यालयी शिक्षा की मौजूदा प्रणाली को कंपनियों और उद्योगों के अनुकूल नहीं पाया है। यद्यपि इस प्रणाली को उन्हीं की सरकार ने दशकों से पाला-पोसा और प्रचारित किया है। बार-बार सुधार के नाम पर मत बटोरू प्रयोग किए हैं।
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वस्तुतः सरकार की तरफ से अब शिक्षा में निजीकरण का मार्ग प्रशस्त किए जाने की योजना है। कहा जा रहा है कि गुणवत्ता सुधारने के लिए यही एकमात्र विकल्प है। मंत्री जी का तो यहां तक कहना है कि अतीत में भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति समय के मुताबिक नहीं रही। तो फिर ‘सेंटर ऑफ एक्सिलेंस’ का क्या हुआ, जिसे देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री ने प्रचारित किया था?
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दरअसल हमारे कर्णधारों द्वारा विदेशी विश्वविद्यालयों की वकालत की जा रही है। बिना इस तथ्य पर विचार किए कि ‘आत्मनिर्भरता’ और ‘मौलिक शोध’ विदेशियों के कर कमलों से नहीं होता। जिस देश के कर्णधार विदेशों से पढ़कर आए हों, वे विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए लाल कालीन नहीं बिछाएंगे, तो कौन बिछाएगा?
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उन्हें पता है कि इस देश में घीसू-माधो के बच्चे लाखों खर्च करने से रहे या प्राथमिक से माध्यमिक तक उन्हें जिस स्तर की शिक्षा दी जा रही है, उसके बल पर वे ऐसे विश्वविद्यालयों में आने से रहे। हो सकता है कि भविष्य में देशी विश्वविद्यालयों को ‘मिड-डे-मील’ जैसी किसी योजना के सहारे भरमाया जाए।
अब तक देशी विश्वविद्यालयों में पढ़-लिखकर या आरक्षण का लाभ उठाकर गरीब-गुरबों का दिमाग खराब होता जा रहा था। विदेशी विश्वविद्यालय आएंगे, तो कोई कोटा नहीं होगा। ऊंची फीस के चलते अमीरों के लिए विदेशी विश्वविद्यालयों पर कब्जा करना आसान होगा।
वैश्वीकरण के दरवाजे खोलने के साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी क्षेत्रों को अंगरेजी दां लोगों के नाम आरक्षित करने तथा देश के गरीबों को बेदखल करने की योजना इस अर्थव्यवस्था की बुनियादी सोच है। हर अर्थव्यवस्था अपने हितों के अनुकूल शिक्षा व्यवस्था बनाती है।
विचार कीजिए कि ब्रिटेन का कोई विश्वविद्यालय भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को किस रंग-ढंग से पढ़ाएगा? उसके इतिहास में देशप्रेमी और देशद्रोही कौन होगा, डायर या भगत सिंह? भारतीय आवश्यकताओं, भाषा, संस्कृति और मूल्यों की परवाह कौन करेगा?
उच्च शिक्षा की चिंता करने वाले देश के चार सौ से अधिक विश्वविद्यालयों और 18,000 से अधिक कॉलेजों की हालत सुधारने के बारे में क्यों नहीं सोचते? वर्तमान विश्वविद्यालयी प्रणाली स्वतः ध्वस्त नहीं हुई है, बल्कि इसे ध्वस्त किया गया है। जब अध्यापकों की भरतियां तथा पुस्तकालयों में उचित किताबों की खरीद रोक दी गई हो, तो शिक्षा का स्तर गिरना ही है। प्रयोगशालाओं को बरबाद कर शोध कार्यों की उपेक्षा का खेल जारी है। योग्य नियमित नियुक्तियों के बजाय संविदा के रोग ने भी विश्वविद्यालयों को स्तरहीन बनाया है।
बीती सदी के अस्सी के दशक तक हमारे तमाम संस्थानों, मसलन भाभा परमाणु संस्थान, खगोल भौतिकी केंद्र, राष्ट्रीय सांख्यिकी संस्थान, आईआईटी, जेएनयू, इलाहाबाद, दिल्ली, अलीगढ़, रूड़की जैसे विश्वविद्यालय गुणवत्ता में कम न थे। हमारे नियंताओं की यह पुरानी नीति रही है कि जिन क्षेत्रों में विदेशियों को घुसाना होता है या निजीकरण करना होता है, पहले उन क्षेत्रों को वे बरबाद करते हैं, और फिर सुधार और जनहित के नाम पर व्यवसायियों को सौंप देते हैं।
प्राथमिक शिक्षा को बरबाद कर निजी विद्यालयों की खेती ऐसे ही लहलहाई गई और अब उच्च शिक्षा में वही प्रयोग करने की तैयारी है। जिन विदेशी विश्वविद्यालयों को देश में लाने की तैयारी है, उनकी वित्तीय हालत बेहद खराब है। विदेशी दबाव के चलते ही भारतीय शिक्षा के दरवाजे उन विश्वविद्यालयों को बचाने के लिए खोले जा रहे हैं।
वे विश्वविद्यालय न तो यहां कोई गुणवत्तापरक शिक्षा देने आ रहे हैं, न हमारे मुल्क के छात्रों का भला करने। बहुसंख्यक कॉलेजों/विश्वविद्यालयों को दरकिनार करने का परिणाम यह होगा कि देश के करोड़ों छात्र सुलभ शिक्षा से वंचित हो जाएंगे। इसलिए हमारे नियंताओं को बहुसंख्यक गरीबों का ध्यान रखकर शिक्षा नीति में बदलाव करना चाहिए।