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बेटियां और नेता: महिला सशक्तीकरण या राजनीतिक विभाजन? दयानिधि मारन के बयान पर उठते सवाल

Fri, 16 Jan 2026 08:03 AM IST
देवेश त्रिपाठी अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: देवेश त्रिपाठी Updated Fri, 16 Jan 2026 08:03 AM IST
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सार
द्रमुक नेता दयानिधि मारन के महिलाओं को लेकर दिए गए बयान पर तमिलनाडु से लेकर दिल्ली तक की राजनीति में हलचल मची हुई है। द्रमुक नेताओं की ओर से अक्सर ऐसे बयान सामने आते हैं, जिनसे उत्तर-दक्षिण भारत के बीच अंतर उभारकर सियासी लाभ लेने की कोशिश की जाती है।
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द्रमुक नेता दयानिधि मारन - फोटो : ANI

विस्तार

अपने विवादित बयानों के लिए चर्चित वरिष्ठ द्रमुक सांसद दयानिधि मारन ने तमिलनाडु में इसी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर भारतीय महिलाओं पर जो टिप्पणी की है, वह घोर निंदनीय और अस्वीकार्य तो है ही, इसने राज्य की राजनीति में एक बार फिर उत्तर-दक्षिण की खाई को गहरा कर दिया है। उल्लेखनीय है कि चेन्नई के एक सरकारी महिला कॉलेज में विद्यार्थियों को लैपटॉप बांटने के कार्यक्रम के दौरान उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन की मौजूदगी में मारन ने कहा कि तमिलनाडु में महिलाओं से पढ़ने के लिए, जबकि उत्तर भारत में महिलाओं को घर पर रहने, खाना बनाने और बच्चे पैदा करने के लिए कहा जाता है। दक्षिण भारतीय राजनीति में इस तरह के विवाद नए नहीं हैं। द्रमुक नेता अक्सर उत्तर-दक्षिण के बीच सांस्कृतिक और सामाजिक अंतर को उभारकर राजनीतिक फायदा लेने की कोशिश करते रहे हैं। पर इस बार उनके नेता का बयान न सिर्फ अशोभनीय है, बल्कि द्रमुक के सहयोगी माने जाने वाले हिंदी भाषी राज्यों के प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं के लिए भी असहज करने वाला है। देश में महिलाओं की स्थिति राज्य-दर-राज्य अलग-अलग है, लेकिन इसे उत्तर बनाम दक्षिण के सांचे में ढालना न केवल गलत है, बल्कि राष्ट्रीय एकता के लिहाज से हानिकारक भी। शिक्षा व महिला सशक्तीकरण के क्षेत्र में तमिलनाडु की उपलब्धियां निस्संदेह सराहनीय हैं, पर इसका अर्थ यह नहीं कि दूसरे राज्यों की महिलाएं घरेलू गुलाम हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, महिला सशक्तीकरण के मामले में उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे राज्य कई दक्षिण भारतीय राज्यों से आगे हैं। देश की राजनीति में नेताओं द्वारा महिलाओं पर अपमानजनक टिप्पणी का यह कोई पहला मामला नहीं है। एक तरफ वे बेटी बचाओ की बात करते हैं, तो दूसरी तरफ ऐसे बयान देकर आखिर क्या संदेश देते हैं? राजनीति में शब्दों की कीमत होती है और राजनेताओं को यह समझना चाहिए कि उनके बयान समाज की दिशा तय करते हैं। महिला सशक्तीकरण कोई क्षेत्रीय प्रतियोगिता नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय लक्ष्य है, जिसे हासिल करने के लिए सभी राज्यों को एक-दूसरे से सीखने की जरूरत है। अगर दयानिधि मारन वाकई महिला सशक्तीकरण के पक्षधर हैं, तो उन्हें अपने शब्दों पर पुनर्विचार कर अविलंब माफी मांगनी चाहिए। अन्यथा, ऐसे बयान राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल होते रहेंगे और महिलाओं के असल मुद्दे पीछे छूटते रहेंगे।

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