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बेजान व्यवस्था से घिरी बेटियां
शंकर अय्यर
Updated Fri, 13 Mar 2015 08:55 PM IST
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आधा आसमान उनकी बांहों में है। आधी आबादी उनकी है। सबसे बड़ा निर्वाचन क्षेत्र उनका है; करीब 40 करोड़ मतदाताओं का वोट-बैंक। उन्हें समानता का सांविधानिक अधिकार मिले छह दशक बीत चुके हैं। बावजूद इसके महिलाओं को आज भी असमानता और अन्याय से मुकाबला करना पड़ता है। स्वयंभू अभिभावकों की फौज हर समय उन्हें बताती है कि उन्हें क्यों, कब, कहां, क्या और कैसे अपना जीवन जीना है। मानो, हर एक बेजान तकल्लुफ से बगावत का इरादा है।
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करीब एक हफ्ते से देश में हंगामा और बहसबाजी जारी है। यह बहस महिलाओं के अधिकारों की स्थिति पर होनी चाहिए, मगर यह राज्यों के अधिकार पर होती दिख रही है। और इसमें मुख्य मुद्दे-लड़की और महिलाओं को न्याय-को दफन कर दिया गया है। साहसी लड़की की बहादुर मां का सवाल गलत नहीं कि बिना सुरक्षा और न्याय के 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान भला कैसे सफल हो सकता है!
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विडंबना देखिए। मौजूदा संसद सत्र की शुरुआत में ओडिशा के बीजद सांसद बैष्णब परिदा ने सरकार से पूछा कि बलात्कार के मामलों में सजा की दर क्या है। विगत चार मार्च को, जिस दिन 'देश को शर्मसार किए जाने से' सांसद उग्र थे, उस दिन परिदा को बताया गया कि बलात्कार के चार मामलों में सिर्फ एक में ही सजा मिल पाती है। इस 'शर्म' की प्रतिध्वनि न तो चार मार्च को सुनाई दी, न ही उसके बाद। भयावहता बताने को ये आंकड़े काफी हैं। वर्ष 2011 से 2013 के बीच, देश भर में बलात्कार के 82,836 मामले दर्ज किए गए; यानी करीब 75 मामले प्रतिदिन या हर घंटे में तीन बलात्कार। इनमें से 70,105 मामलों में आरोपपत्र दायर किए गए, पर महज 12,736 मामलों में ही दोष सिद्ध हो सका। आगे स्थिति और बदतर हुई। इस अवधि में 1,12,110 लोगों को गिरफ्तार किया गया, और 93,217 आरोपी बनाए गए। इनमें महज 17,437 को ही (यानी पांच आरोपियों में एक को) सजा मिली। बिहार, हरियाणा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, झारखंड, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश जैसे दस हिंदीभाषी राज्यों में 41,003 मामले दर्ज किए गए, जिसमें 52,682 व्यक्ति को हिरासत में लिया गया, 47,682 के खिलाफ आरोपपत्र दायर किए गए, जबकि महज 11,994 दोषियों को ही सजा हुई। बेशक हिरासत में लिए गए सभी आरोपी दोषी नहीं हो सकते, पर ऐसा भी नहीं कि छोड़े गए सभी आरोपी निर्दोष थे; या तो निर्दोषों पर आरोप लगाए जा रहे हैं या दोषियों को छोड़ा जा रहा है। आरोप लगाने और दोष साबित होने के बीच का यह बड़ा फासला बहस और सुधार की मांग करता है।
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आखिर सजा की दर इतनी कम क्यों है? उत्तर सरकार के जवाब में छिपा है-वर्ष 2003 में दिए एक उत्तर में कहा गया था कि गवाहों की अनुपलब्धता, अपर्याप्त प्रमाण, देरी और गवाहों का मुकरना इसकी वजहें हैं। इस वर्ष भी सरकार की ओर से यही जवाब आया-कमजोर जांच, नाकाफी सुबूत, काफी देरी और गवाहों का मुकरना। यानी पिछले दस वर्षों में स्थिति जस की तस है। इस हॉरर शो का यही अंत नहीं है। निर्भया कांड के दो साल बाद, जब आपराधिक कानून में संशोधन हो चुका था, भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने सरकार से बलात्कार के लंबित मामलों के बारे में पूछा। कानून मंत्रालय ने बताया था कि विभिन्न उच्च न्यायालयों में 31, 386 मामले लंबित हैं। इनमें से इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सर्वाधिक 10,740 और मध्य प्रदेश में 4,602 मामले हैं। सरकार के जवाब से यह भी पता चला कि सर्वोच्च न्यायालय में 332 मामले लंबित थे, जिसमें 16 दिसंबर के बलात्कार का वह मामला भी शामिल था, जो करीब एक साल तक इस कारण लटका रहा कि कब खंडपीठ निचली अदालत के फैसले पर निर्णय लेगी और कब उच्च न्यायालय उसकी पुष्टि करेगा। सबसे बुरी हालत तो निचली अदालतों की है। वहां 2009 में 69,533, 2010 में 75,295, 2011 में 79,476, 2012 में 86,032 और 2013 में 95,731 मामले लंबित थे।
इसकी वजह क्या है? मार्च, 2013 में भाजपा सांसद राधामोहन सिंह ने जब यह सवाल पूछा, तो उन्हें जवाब मिला कि सरकार (यूपीए) ने उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया है कि वे निचली अदालतों में बलात्कार से संबंधित लंबित मामलों की संख्या को देखते हुए फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन करंे। दिसंबर, 2014 में दुबे ने जब फिर यह सवाल पूछा, तो उन्हें जवाब मिला, सरकार (एनडीए) ने उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को चिट्ठी लिखी है कि वे जिले अथवा निचली अदालतों में बलात्कार से संबंधित लंबित मामलों की बड़ी संख्या देखते हुए सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन करें। सवाल यह नहीं कि सरकार किसकी थी, दुखद यह है कि स्थिति समान है; प्रक्रिया पूर्व की तरह सुस्त है। यह हालत उस देश की है, जहां एक महिला 15 वर्षों तक प्रधानमंत्री रहीं और एक महिला 15 वर्षों तक मुख्यमंत्री। यौन हिंसा से पीड़ितों को न्याय से वंचित करना समाज में पितृसत्तात्मक सोच की मजबूती का संकेत है। यही सोच राजनीति और सरकार में भी दिखती है।
इस समस्या की उत्पत्ति और विकास की वजह सामाजिक है। भारत की बेटियों को जिंदा रहने और फलने-फूलने के लिए जरूरी बुनियादी जरूरतों से वंचित किया जाता है। उनकी कम साक्षरता और उच्च ड्रॉपआउट दर (स्कूल छोड़ने की संख्या) यही बताती है। बेशक शौचालय भी एक बड़ा मुद्दा है, पर लड़कियों के स्कूल छोड़ने की क्या सिर्फ यही एक वजह है? हम राजनीतिक सशक्तिकरण पर तो खूब बातें करते हैं, मगर आर्थिक सशक्तिकरण पर आमतौर पर कोई बात नहीं करता। सच यही है कि चार में से सिर्फ एक महिला के पास अपना बैंक खाता है, सिर्फ 44 फीसदी महिलाएं मोबाइल इस्तेमाल करती हैं, जबकि 86 फीसदी पुरुषों के हाथों में मोबाइल है। संगठित क्षेत्रों के 2.95 करोड़ कर्मचारियों में सिर्फ 60 लाख-यानी पांच में एक कर्मचारी ही महिला है। यह विडंबना ही है कि जो समाज देवियों की पूजा करता है, वह अपनी आधी आबादी के प्रति इतना कठोर है।
-अर्थशास्त्र की राजनीति के विशेषज्ञ और एक्सीडेंटल इंडिया के लेखक