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सीरिया में खतरनाक खेल

Thu, 09 May 2013 11:35 PM IST
पुष्पेश पंत
पुष्पेश पंत Updated Thu, 09 May 2013 11:35 PM IST
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dangerous game in syria

सीरिया की हालत बद से बदतर होती जा रही है। हालांकि इस संकट को दूर करने के लिए अमेरिका और रूस के हाथ मिलाने की खबरें हैं और संयुक्त राष्ट्र-अरब लीग के सीरिया में दूत लखदर ब्राहिमी ने इसकी सराहना भी की है।

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मगर जब तक कुछ ठोस सामने नहीं आता, कुछ कहा नहीं जा सकता। बल्कि असद सरकार को अपदस्थ करने के लिए अमेरिका और यूरोपीय देशों ने जो साजिश रची है, वह जगजाहिर हो चुकी है और इस बात में कोई शक नहीं कि जो विद्रोही दमिश्क पर घातक हमले कर रहे हैं, उन्हें विदेशियों का पूरा समर्थन प्राप्त है।
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हाल के जिस धमाके का निशाना सीरिया के प्रधानमंत्री थे, उसकी जिम्मेदारी भले ही किसी ने नहीं ली है, सरकार ने इसके लिए अमेरिका, इस्राइल और अल कायदा को आरोपी बना दिया है।
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यहां यह जोड़ने की जरूरत है कि भले ही असद सरकार तानाशाह कही जा सकती है, उसका मिजाज कट्टरपंथी, इस्लामी-जेहादी नहीं, वरन धर्मनिरपेक्ष, आधुनिक सोच वाला रहा है।

उसका तख्तापलट कर जनतंत्र के बीजारोपण करने के प्रयास को तर्कसंगत नहीं साबित किया जा सकता। संयुक्त राष्ट्र के एक सदस्य राज्य की संप्रभुता का यह बेशर्म उल्लंघन है।

सीरिया संसार की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक का उत्तराधिकारी है। प्राचीन काल में सुमेर-असीरिया की हस्ती चीन, मिस्र-यूनान से रत्ती भर कम नहीं थी।

वहां खुदाई में 10,000 वर्ष पुराने अवशेष मिले हैं, जो उस समय उन्नत संस्कृति का प्रमाण देते हैं। इस सभ्यता की छाप मिस्र तथा मध्य-एशिया तक देखी जा सकती है।

दमिश्क दावा कर सकता है कि वह सबसे पुराना लगातार बसा रहा नगर है। मध्ययुग में इस्लाम के आविर्भाव के पहले सीरिया ईसाइयों के लिए महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र बन चुका था।

बीसवीं सदी के पहले चरण तक सीरिया का मिजाज बहुलवादी, सहिष्णु तथा उदार ही कहा जा सकता है।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद फ्रांसीसी जनादेश वाले भू-भाग का गठन नई राजनीतिक इकाई के रूप में हुआ, जहां क्रमशः जनतांत्रिक प्रणाली की राजनीतिक व्यवस्था विकसित हुई।

शीतयुद्ध के दौर में सीरिया की पहचान गुटनिरपेक्ष राज्य की रही और बाथ पार्टी की समाजवादी विचारधारा से प्रभावित फौजियों के तख्ता पलट के बाद भी इस नजरिये में कोई अंतर नहीं आया।

समाजवादी संस्कार के कारण सीरिया को तत्कालीन सोवियत संघ का पक्षधर समझा गया और अमेरिका ने इसे अपना बैरी मान लिया।

यह स्थिति तब और गंभीर हुई, जब 1960 वाले दशक में सीरिया और मिस्र ने विलय के बाद एक नए अरब गणराज्य को जन्म दिया।

दो महान अरब सभ्यताओं की जुगलबंदी न तो अमेरिका को रास आ सकती थी, न मध्य-पूर्व में उसके पिट्ठू इस्राइल को।

वर्ष 1967 के यौम किप्पुर युद्ध में आरंभिक सफलता के बाद मिस्र तथा सीरिया की करारी हार हुई और गोलान ऊंचाइयां नाम से जाने जाने वाले सामरिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील भू-भाग पर इस्राइल का कब्जा हो गया। तभी से सीरिया की दुखती रग अमेरिका एवं इस्राइल के हाथ लग गई।

बाद के वर्षों में न केवल अरब एकता खंडित होती गई, बल्कि मिस्र में नासिर के पदत्याग के बाद अनवर सादात के काल में कैंप डेविड समझौते के बहाने शांति स्थापना के नाम पर मिस्र की सरकार पारंपरिक गुटनिरपेक्षता एवं समाजवादी रुझान त्याग अमेरिका की सहयोगी बनती गई।

सीरिया भी इराक की तरह अलग-थलग अकेला पड़ता गया। हां, इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि अपनी कमजोरी के लिए असद का कुनबापरस्त तानाशाही आचरण भी जिम्मेदार था। न केवल सामाजिक विषमता ने असंतोष भड़काया, वरन शिया और सुन्नी संप्रदायों के बीच वैमनस्य के समाधान का कोई प्रयास नहीं किया गया।

अफगानिस्तान तथा इराक में सैनिक हस्तक्षेप की नाकामी के बाद अमेरिका ने लीबिया तथा सीरिया में पर्दे के पीछे रह कर ‘क्रांतिकारी’ रणसंचालन की नीति अपनाई है। दिखावे के तौर पर इसे जनता के असंतोष-आक्रोश का विस्फोट बताया जा रहा है। असद के राक्षसीकरण में कोई कसर अमेरिका तथा ब्रिटेन ने नहीं छोड़ी है।

यह कहा जा रहा है कि असद अपने विरोधियों के खिलाफ अमानवीय रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल करते रहे हैं। हालांकि इराक में सद्दाम पर ऐसे आरोप लगाकर हमला करने वाले देश बहुत जल्दी झूठे साबित हो गए थे।

जिन देशों ने रासायनिक हथियारों के निषेध वाली संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं- उत्तरी कोरिया, दक्षिणी सूडान, सीरिया, म्यांमार और मिस्र-उन्हीं से अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी देशों को यह खतरा है कि वे उनके खिलाफ जहरीले हथियार इस्तेमाल कर सकते हैं।

क्या इसे महज संयोग समझा जाए कि ओबामा पर जहरीले रासायनिक खत रूपी बम से हमला करने के षड्यंत्र का भंडाफोड सनसनखेज तरीके से इन्हीं दिनों हुआ है।

ऐसे समाचार भी मिलते रहे हैं कि अमेरिका ने सीरिया के खिलाफ मोर्चाबंदी में पुतिन को साथ लेने के लिए उन तक यह संदेश अपने राजनयिकों के जरिये पहुंचाया है कि सर्वनाशक रासायनिक हथियारों की तस्करी उनके लिए भी जोखिम बन सकती है।

चेचेन्या तथा दागिस्तान में खूंखार कट्टरपंथी मुसलमान रूस को लहुलूहान करते रहे हैं। इस घड़ी भले ही हिजबुल्ला का समर्थन बागियों को पीछे धकेलने में असद का मददगार हो, इसकी बड़ी राजनयिक कीमत उन्हें निकट भविष्य में चुकानी पड़ सकती है। असद की जो धर्म निरपेक्ष छवि है, वह इस मदद के प्रकट होने के बाद बरकरार नहीं रह सकती।

बहरहाल, सीरिया की खबरें हमारे संचार माध्यमों में हाशिये पर ही रह जाती हैं। सुर्खियों को हजारों करोड़ के घपले-घोटाले ही घेरे रहते हैं। सीरिया तथा मध्य-पूर्व में अपने राष्ट्रहित के बारे में सोचने की फुर्सत किसे है?

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