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नाचे मन मोरा
सहीराम
Updated Thu, 07 May 2015 07:41 PM IST
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फसलों की बर्बादी देख किसानों का दिल चाहे कितना ही
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रोता हो, उनकी यह हालत देखकर चाहे नेताओं तक के आंसू निकल रहे हों, पर इन
बर्बाद फसलों के लिए हरियाणा के किसानों को ऐसा छप्पर फाड़ मुआवजा मिला कि
हरियाणा के कृषि मंत्री ने कहा कि मेरा मन नाचने को कर रहा है। अब खतरा यह
है साहब कि आगे से हर साल कहीं किसान ऊपरवाले से यही दुआ करते नजर न आने
लगें कि बरखा रानी, जरा जल्दी बरसो और मेरी तैयार फसल नष्ट कर दो। कहीं वे
यह मन्नत मांगते न दिखें कि ऊपरवाले जरा ओले बरसा, ताकि सरकार हमें छप्पर
फाड़ मुआवजा दे। चिंता यह भी है कि छप्पर फाड़ मुआवजे के बाद किसान का
छप्पर दोबारा बन पाएगा या नहीं। कहीं वह यह तय न कर ले कि अगर इतना मुआवजा आ
रहा है, तो छप्पर को फटा ही रहने दो। अब तक किसान चैत-बैसाख में फसल घर
लाता था। अब वह मुआवजा घर लाया करेगा।
खतरा यह भी है कि ऐसे में कहीं किसान ऊपरवाले से डरना ही न बंद कर दें। अब वह भगवान को धमकाता भी नजर आ सकता है-जल्दी बरस ना। क्या नखरे कर रहा है। फसल तैयार खड़ी है, अगर इसे घर में लाना पड़ गया, तो मुझे क्या मिलेगा? देख जल्दी से ओले बरसा, मुझे मुआवजा लेना है।
आगे से कोई नृत्योत्सुक नेता किसी बार बाला के साथ ठुमके लगाता नजर आ जाए, तो समझें कि वह हरियाणा का कृषि मंत्री भी हो सकता है। हालांकि उनके विरोधियों ने कहा है कि उन्हें नाचने का इतना ही शौक है, तो वह किन्नरों की टोली में क्यों नहीं शामिल हो जाते। पर इस समय तो वह देशभक्तों की टोली में शामिल हैं और आत्महत्या करनेवाले किसानों को कोस रहे हैं-लानत है तुम पर कायरो, देशभक्तों की सरकार के होते हुए आत्महत्या करते हो। डूब मरो चुल्लू भर पानी में। पर किसान चुल्लू भर पानी में नहीं डूबता, अपने ही आंसूओं में डूबकर मर जाता है। इसका दोष सरकार पर नहीं डाला जा सकता, वह तो छप्पर फाड़ मुआवजा दे रही है, जो किसी बार बाला के एक ठुमके पर उड़ने वाले नोटों से भी कम हो सकता है।
खतरा यह भी है कि ऐसे में कहीं किसान ऊपरवाले से डरना ही न बंद कर दें। अब वह भगवान को धमकाता भी नजर आ सकता है-जल्दी बरस ना। क्या नखरे कर रहा है। फसल तैयार खड़ी है, अगर इसे घर में लाना पड़ गया, तो मुझे क्या मिलेगा? देख जल्दी से ओले बरसा, मुझे मुआवजा लेना है।
आगे से कोई नृत्योत्सुक नेता किसी बार बाला के साथ ठुमके लगाता नजर आ जाए, तो समझें कि वह हरियाणा का कृषि मंत्री भी हो सकता है। हालांकि उनके विरोधियों ने कहा है कि उन्हें नाचने का इतना ही शौक है, तो वह किन्नरों की टोली में क्यों नहीं शामिल हो जाते। पर इस समय तो वह देशभक्तों की टोली में शामिल हैं और आत्महत्या करनेवाले किसानों को कोस रहे हैं-लानत है तुम पर कायरो, देशभक्तों की सरकार के होते हुए आत्महत्या करते हो। डूब मरो चुल्लू भर पानी में। पर किसान चुल्लू भर पानी में नहीं डूबता, अपने ही आंसूओं में डूबकर मर जाता है। इसका दोष सरकार पर नहीं डाला जा सकता, वह तो छप्पर फाड़ मुआवजा दे रही है, जो किसी बार बाला के एक ठुमके पर उड़ने वाले नोटों से भी कम हो सकता है।