नोटबंदी से नुकसान
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सो अब साबित हो गया है कि नोटबंदी से काला धन हासिल नहीं हुआ है। आठ नवंबर, 2016 की मध्य रात्रि से जितने पुराने नोट रद्द किए गए थे, तकरीबन उतने ही बैंकों में वापस आ गए। हासिल केवल यह हुआ है कि जिन अर्थशास्त्रियों और राजनीतिक पंडितों ने उस समय कहा था कि नोटबंदी से नुकसान अधिक होगा और लाभ कम, वे सही निकले हैं। पिछले सप्ताह द वॉशिंगटन पोस्ट जैसे प्रसिद्ध अखबार ने खूब मजा लेते हुए इस बारे में लिखा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से अभी तक नोटबंदी को लेकर कोई सफाई नहीं आई है, पर राहुल गांधी खुलकर कह रहे हैं कि मोदी ने नोटबंदी का फैसला संघ परिवार के कुछ बुद्धिजीवियों से सलाह लेकर लिया था। इनके बारे में जाने-माने अर्थशास्त्री जगदीश भगवती ने कभी कहा था कि ये लोग अगर अर्थशास्त्री हैं, तो मैं भरतनाट्यम की नृत्यांगना हूं।
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खैर, जो होना था, हो चुका है। मोदी की समस्या यह है कि अब यह भी साबित होने लगा है कि उनके दौर में रोजगार के नए अवसर इतने कम पैदा हुए कि पिछले हफ्ते जब भारतीय रेल ने 90,000 नौकरियों की घोषणा की, तो करीब ढाई करोड़ युवाओं ने आवेदन किया। हाल में यह खबर भी सुर्खियों में रही है कि देश के नौजवान सरकारी नौकरियां पहले से ज्यादा पसंद करने लगे हैं, क्योंकि निजी क्षेत्र में बहुत कम नई नौकरियां आई हैं। बेरोजगारी से नोटबंदी का रिश्ता यह है कि काले धन की तलाश जब युद्ध स्तर पर होने लगती है, तो निवेशक घबरा जाते हैं। मोदी के दौर में कुछ ऐसा ही हुआ है।
ऐसा नहीं है कि देश में काला धन नहीं है। अवश्य है, लेकिन उसे ढूंढ निकालना आसान नहीं है, क्योंकि आजकल लोग इसे नकद में कम ही रखते हैं। अधिकतर लोग इसे जमीन-जायदाद या गहनों में तब्दील कर देते हैं, ताकि ये आयकर विभाग के जासूसों से छिप जाएं। शायद राजनेता और राजनीतिक दल ही काला धन नकद में रखते हैं, क्योंकि काले धन के बिना चुनावों की गाड़ी नहीं चल सकती। राजनेता अच्छी तरह जानते हैं कि उनका काला धन उद्योगपतियों और कारोबारियों से आता है, सो सत्ता में आते ही इन्हें खोजने की कोशिश में लग जाते हैं। इनकी आदत पुरानी है। पंडित नेहरू ने प्रधानमंत्री बनते ही उन लोगों के घरों में छापे डलवाए थे, जिन्होंने कांग्रेस को चंदा दिया था। आयकर विभाग के अफसरों के लिए ये छापे लाभदायक होते हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह।
माना जाता है कि पिछले चार वर्षों में अनेक भारतीय निवेशक देश छोड़कर चले गए हैं, क्योंकि आयकर अधिकारियों के हस्तक्षेप के कारण कारोबार करने का माहौल बहुत खराब रहा है। नोटबंदी के कारण भी कुछ छोटे कारोबारी कंगाल होने से पहले ही सब कुछ बेचकर भाग गए थे। वे नहीं गए होते, तो निजी क्षेत्र में आज नई नौकरियां उपलब्ध होतीं और अगले लोकसभा चुनाव में मोदी की जीत तय होती, क्योंकि अर्थव्यवस्था में ऊर्जा पैदा हो गई होती। पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी को पूर्ण बहुमत मिलने का मुख्य कारण उनका मतदाताओं को यह विश्वास दिलाना था कि वह रोजगार के करोड़ों नए अवसर पैदा करके दिखाएंगे। अगले वर्ष मोदी को अगर पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है, तो इसका मुख्य कारण यही होगा कि अर्थव्यवस्था में वही मंदी दिखने लग गई है, जो 2014 में मायूसी फैला रही थी। कहने का मतलब यह है कि काले धन की खोज ने न सिर्फ देश का, बल्कि निजी तौर पर नरेंद्र मोदी का भी नुकसान किया है। लाभ अगर किसी को हुआ है, तो कुछ भ्रष्ट अधिकारियों को।