फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   dalit in hindi litrature

हिंदी साहित्य में दलितों का हिस्सा

Fri, 02 Aug 2013 09:13 PM IST
श्यौराज सिंह बेचैन
श्यौराज सिंह बेचैन Updated Fri, 02 Aug 2013 09:13 PM IST
विज्ञापन
dalit in hindi litrature

आज हिंदी पाठ्यक्रम का तेजी से लोकतंत्रीकरण हो रहा है। उदाहरण के लिए, पिछले दिनों भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला द्वारा दलित कविता पर एक दलित फैलो को सेमिनार की चर्चा कराने का जिम्मा सौंपना महत्वपूर्ण फैसला था। इससे पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम लागू होने के साथ-साथ दलित साहित्य की आवश्यकता और स्वीकार्यता भी तेजी से बढ़ी है। यह किस बात का संकेत है? क्या पाठ्यक्रम निर्धारक शक्तियां अध्ययन की विविधता को स्वीकार कर अपने को सामाजिक रूप से लोकतांत्रिक होने का परिचय दे रही हैं? अथवा ज्ञान की वैश्विक संबद्धता दलित साहित्य की अंतरराष्ट्रीय व्यापकता के लिए बाध्यकारी स्थिति पैदा कर रही है? इससे कौन इनकार कर सकता है कि दलित साहित्य का महत्व अब देश से बाहर भी तेजी से सामने आ रहा है।

विज्ञापन


इस महत्वपूर्ण, क्रांतिकारी बदलाव की शुरुआत एनसीईआरटी की हिंदी पुस्तकों से मानें या महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के महाविद्यालयों से? सच्चाई चाहे जो हो, पर इससे इनकार नहीं है कि आज देश के समस्त विश्वविद्यालयों के पाठयक्रमों को विविधतापूर्ण बनाने में दलित साहित्य सामाजिक समस्याओं का दर्पण बन रहा है। प्राथमिक पुस्तकों से लेकर एमए. एमफिल. तक के पाठयक्रम में यह सामाजिक परिवर्तन बखूबी दिखाई दे रहा है। यानी राजनीति की तरह साहित्य भी जातिगत एकाधिकार के दायरे से निकलकर बहुजन हिताय और बहुजन जुड़ाव का साक्षी बन रहा है। दलित साहित्य के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए अब यह समीक्षा करने का वक्त आ गया है कि इसके पीछे कौन-कौन-सी शक्तियां काम कर रही हैं। साहित्य के मूल्य, उद्देश्य, प्रतीक और प्रतिमान सब के सब लोकतांत्रिक कसौटियों पर कसे जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर हिंदी का बढ़ता महत्व जैसा ऐतिहासिक संदर्भ रखता है, शिक्षा और साहित्य में दलितों के बढ़ते महत्व को ठीक उसी सिलसिले में देखा जाना चाहिए।
विज्ञापन


लेकिन इस प्रसंग में सब कुछ अच्छा और उल्लेखनीय ही नहीं है। मसलन, पिछले दिनों देश के कुछ अलग-अलग विश्वविद्यालयों में हिंदी साहित्य के पाठयक्रम देखते हुए दलित साहित्य की गति और दुर्गति, दोनों एक साथ देखने को मिली। जैसे कि बिहार के एक विश्वविद्यालय में दलित साहित्य विषयक सेमिनार में यह चिंता जाहिर की गई कि हिंदी विभाग ने दलित साहित्य को मुख्य विषय से हटाकर वैकल्पिक विषय बना दिया है। इतना ही नहीं, वहां दलित साहित्य विशेषज्ञों को हटाकर उनकी जगह अल्पज्ञों को बुलाकर पाठयक्रम का निर्धारण कर दिया गया, जबकि यूजीसी की गाइडलाइन विशेषज्ञों की अपेक्षा करती है! इसी तरह एक दूसरी जगह दलित साहित्य की दुर्दशा इस रूप में थी कि वहां वैकल्पिक विषय बनाकर गैरदलित शिक्षकों ने छात्रों को दलित साहित्य लेने के लिए प्रेरित ही नहीं किया। जबकि कई विश्वविद्यालय दलितों को विषय बनाकर लिख देने वालों को ही दलित साहित्यकार के रूप में पढ़ाने पर आमादा हैं। जबकि एक जगह यह सुखद उदाहरण देखने को मिला कि वहां मात्र एक छात्र को छोड़कर सभी ने दलित साहित्य का विकल्प चुना था।
विज्ञापन
विज्ञापन


दरअसल हिंदी में दलित कहानियां और आत्मकथाएं जिस तरह आई हैं, वे साहित्य के गंभीर अध्येताओं के लिए जिज्ञासा पैदा करने वाली हैं। इस साहित्य का सिर्फ साहित्यिक मूल्य नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक-सामाजिक-आर्थिक मूल्य भी है। पर शीर्ष पदों पर बैठे लोगों में से कुछ अब भी पुरानी मान्यताओं के मुताबिक चलते हैं। कनाडा के टोरंटो में अंग्रेजी पढ़ाने वाली और जूठन का अनुवाद करने वाली अरुणप्रभा मुकर्जी ने एक बार कहा था कि सवर्ण शिक्षक दलित साहित्य के बारे एक तो जानते कम हैं, और कुछ अपने छात्रों को साहित्यिक विविधता से अवगत कराने के बजाय छिपाते अधिक हैं। अश्वेत साहित्य के साथ भी अतीत में ऐसा ही हुआ था। पर वह साहित्य आगे बढ़ा और उसे नकारने वाले आप्रासंगिक हो गए। बेशक, कुछ सीमाएं हैं, लेकिन देश भर के उच्च शिक्षा संस्थानों में सामाजिक रूपांतरण का यह सच उम्मीद जगाता है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed