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रोज की प्रार्थना

Mon, 15 Jul 2013 07:46 PM IST
जुल्फिया परवीन इंसान
जुल्फिया परवीन इंसान Updated Mon, 15 Jul 2013 07:46 PM IST
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daily prayer poem of julfia parvin

ड्योढ़ी के पास वाली सीढ़ियों के नीचे

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खिड़की की बड़ी-बड़ी जालियों के पीछे
पत्थर की चौखट पर जड़ा
कितने ही बरसों से खड़ा
मजबूत लकड़ी का बना
थोड़ा सा धूल से सना
लकड़ी के दरवाजे के पीछे
सीढ़ियों से उतर कर पहुंच जाऊं नीचे
सोचती थी नीला बैठे-बैठे रोज
अपनी दुनिया को फिर से खोज लूं।
धरती का रंग वहां हरा सा होगा
बादलों से आसमान भरा सा होगा
उस दुनिया में परियां जब गाएंगी
नन्ही-नन्ही बूंदें पत्तों पर आएंगी
बांहें आकाश पर, धरती पर पांव होगा
पीपल के पेड़ पर चंदा का गांव होगा
चुप होंगे पेड़ सभी, मौन होगा जंगल
नदिया की लहरें पुकारेंगी कल-कल
पेड़ों से गिरते ही खुशबू के फूल
तैरेंगे पानी में नदी किनारे
दूधिया से पानी को पीने के बाद
चांद छूने चल देंगी ऊंचे फुहारें
सोचती थी नीला बैठे-बैठे रोज
अपनी दुनियां को फिर से खोज लूं।
गर्म सी दुपहरी में झूठ मां से बोल कर
नीचे उतर गयी ताले को खोल कर
तंग सा तहखाना वह पिंजरे के जैसा
ऐसा कुछ नहीं था सोचा था जैसा
मेरी दुनिया होगी शायद आकाश में
थोड़ा सा उड़ सकी तो ढूंढ लूंगी काश मैं
सोचती है नीला बैठे-बैठे रोज
अपनी दुनिया को फिर से खोज लूं।

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