भ्रष्टों पर नकेल, ईमानदारों की सुरक्षा
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भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में लोगों के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण कारक उनकी आय है और राज्य द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाली आधारभूत संरचनाएं, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा सहायता की गुणवत्ता है। भले ही पीपीपी आधार पर हम दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं, लेकिन प्रति व्यक्ति आय हमारे यहां बहुत कम है। विश्व बैंक द्वारा हमें निम्न मध्य आय वर्ग वाला देश माना जाता है। हमारे देश में गरीबी और कुपोषण बहुत ज्यादा है। सम्मानजनक मध्यम आय स्तर वाले देशों में गिने जाने के लिए हमें अगले दो दशक तक आठ फीसदी से ज्यादा दर पर विकास करने की जरूरत है। भ्रष्टाचार के चलते सार्वजनिक निधियों का दुरुपयोग और करदाताओं के पैसे की बर्बादी होती है। इससे विकास धीमा हो जाता है। हमारे सरकारी संस्थान कमजोर हैं। ये भ्रष्ट मंत्रियों और लोकसेवकों के त्वरित अभियोजन एवं ईमानदारों का संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त रूप से प्रभावी नहीं हैं। हमें नवाचार और कठिन निर्णय लेने में सक्षम लोकसेवकों की जरूरत है, न कि फाइलों को एक टेबल से दूसरे टेबल पर घुमानेवालों की। भ्रष्टाचार निरोधी कानून, 1988 में हाल में किया गया संशोधन लोकसेवकों को कठिन फैसले लेने में सक्षम बना सकता है।
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इस कानून के संशोधन में चार क्षेत्रों को शामिल किया गया है। पहला, कानून के आठवें खंड के तहत रिश्वत देने वाले अब सात साल कैद की सजा के हकदार होंगे। हालांकि अगर किसी को ऐसे रिश्वत देने के लिए बाध्य किया जा रहा हो, तो वह निर्धारित अवधि के भीतर भ्रष्टाचार निरोधी एजेंसी से संपर्क कर सकता है। जब तक लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होना नहीं चाहेंगे, हम भ्रष्टाचार को सीमित नहीं कर सकते। निजी क्षेत्र भी, जो नौकरशाही को रिश्वत देकर फलते-फूलते हैं, अब बराबर जिम्मेदार होंगे।
दूसरा, खंड 13(1) में संशोधन के जरिये खंड 13(1)(d)(iii) के कठोर प्रावधानों को दूर किया गया है। नए कानून के तहत लोकसेवक आपराधिक दुर्व्यवहार के लिए उत्तरदायी होगा, अगर उसने जान-बूझकर अपने कार्यकाल के दौरान अवैध रूप से संपत्ति अर्जित की है या बेईमानी से या धोखाधड़ी से उसे उपयोग के लिए दी गई या उसके नियंत्रण में रखी गई संपत्ति का खुद के लिए उपयोग किया या अपने नाम से कर लिया है।
तीसरा, कानून के खंड 17 (ए) के तहत पुलिस अधिकारियों को केंद्र या राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना जांच या पूछताछ करने से रोक दिया गया है। यह सुरक्षा सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों या अधिकारियों को भी उपलब्ध है। सरकार या संबंधित अधिकारी को जांच आदि के लिए मंजूरी संबंधी फैसला करने के लिए चार महीने का समय दिया गया है। इस प्रावधान से ईमानदार लोकसेवकों, विशेष रूप से उन लोगों को सुरक्षा प्रदान मिलेगी, जो पेंशनभोगी हैं और जिनकी आय सीमित है।
चौथा, ऐसे मामलों को समयबद्ध निपटाए जाने के संबंध में कुछ अन्य प्रावधान भी हैं और जिनमें 'लाभ' को परिभाषित किया गया है, जो भ्रष्ट लोक सेवकों द्वारा हासिल किया जा सकता है। ये प्रावधान सरकारी कर्मचारियों को सेवा के दौरान या सेवानिवृत्ति के बाद मुकदमों के भय के बिना फैसले लेने के लिए प्रोत्साहित करेगा। इससे समग्र शासन में सुधार आएगा।
लेकिन इस अधिनियम की मुख्य रूप से दो स्तर पर आलोचना की जा रही है। पहला, यह तर्क दिया जा रहा है कि सीबीआई जैसी भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसियां इससे नखदंतविहीन हो जाएंगी, क्योंकि नए कानून के तहत भ्रष्टाचार के मामलों में जांच, पूछताछ आदि के लिए उन्हें सरकार से मंजूरी लेने की आवश्यकता होगी। यह महसूस किया जाना चाहिए कि यह प्रावधान लोकपाल अधिनियम के समान है। सरकार द्वारा प्रारंभिक जांच में यह सुनिश्चित किया जाएगा कि किस पृष्ठभूमि में उक्त फैसला लिया गया और उसके बाद ही जांच शुरू की जाएगी। इसके अलावा सरकार को मंजूरी देने के लिए अधिकतम चार महीनों का ही समय दिया गया है। इस अवधि के दौरान अगर फैसला नहीं लिया जाएगा, तो सरकार द्वारा मान्य स्वीकृति प्रदान करने के लिए नियम तैयार किए जा सकते हैं। सरकार को इस प्रक्रिया को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाना होगा। इसका व्यापक दृष्टिकोण भ्रष्ट को दंडित करना और ईमानदार को सुरक्षा प्रदान करना होगा। लेकिन ऐसी जांच आदि के लिए जो नियम बनाए जाएंगे, उन्हें सावधानी से तैयार करना होगा, ताकि स्वच्छ सरकार के उद्देश्यों को पूरा किया जा सके।
ऐसी भी आशंका जताई जा रही है कि मंत्री और लोकसेवकों की भ्रष्टाचार में गहरी पैठ होती है, इसलिए मंजूरी देने से इन्कार किया जा सकता है। लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि सरकारें आती-जाती रहती हैं। अगर कोई सरकार भ्रष्टों के खिलाफ जांच की अनुमति देने से इन्कार करती है, तो नई सरकार के आने पर अनुमति दी भी जा सकती है। इसके अलावा अदालती हस्तक्षेप भी हो सकता है। पिछले कुछ वर्षों में कई राजनेताओं के खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों ने जांच शुरू की ही है।
दूसरा तर्क यह दिया जा रहा है कि 13(1)(d)(iii) के प्रावधान को खत्म करने से भ्रष्ट अधिकारी, जो मंत्रियों के गलत कृत्यों में शामिल होते हैं, बच जाएंगे और उससे सुबूत हासिल करना मुश्किल हो जाएगा। यह महसूस किया जाना चाहिए कि इस कानून का लक्ष्य भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना है। नए कानून के तहत अवैध धन अर्जित करने वाले मंत्री और अधिकारी जेल जाएंगे। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसे मामलों में कार्रवाई शीघ्रता से हो, प्रक्रिया सरल हो और दंड शीघ्र दिया जाए। इसके अलावा अधिकारियों को फैसले लेने में पारदर्शिता और निष्पक्षता बरतने के लिए बार-बार याद दिलाया जा सकता है, खासकर आर्थिक मंत्रालयों में सरकारी प्रक्रियाओं के बेहतर अनुपालन के लिए।
संशोधित कानून शासन में सुधार और ईमानदार लोक सेवकों को तेज विकास के लिए तेजी से फैसले लेने और जोखिम उठाने के लिए प्रोत्साहित करेगा। लेकिन एक नैतिक समाज विकसित करने के लिए हमें कई मोर्चों पर एक साथ काम करने की जरूरत है।