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क्रिकेट आकाओं के नए हथकंडे

Thu, 30 Mar 2017 09:50 AM IST
धर्मेंद्रपाल सिंह
धर्मेंद्रपाल सिंह Updated Thu, 30 Mar 2017 09:50 AM IST
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Cricket bosses new tactics
धर्मेंद्रपाल सिंह

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के आका और उसकी इकाइयों के सरगना लोढ़ा समिति के खिलाफ अपनी अंतिम लड़ाई में हर हथकंडा आजमा रहे हैं। खातों में करोड़ों रुपये होने के बावजूद कुछ इकाइयों ने पहले अपने कर्मचारियों और खिलाड़ियों के वेतन-भत्तों पर रोक लगा दी और फिर टेस्ट और इंडियन प्रीमियम लीग (आईपीएल) के मैचों के आयोजन में अड़ंगा लगाने की नीयत से बीसीसीआई के सामने पैसे की मांग रख दी। उनके इस कदम का उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ जन-आक्रोश जगाना है। गत 22 फरवरी को पूर्व आडिटर ऐंड अकाउटेंट जनरल (सीएजी) विनोद राय की अध्यक्षता में गठित चार सदस्यीय प्रशासकों की समिति (सीओए) ने बोर्ड की सभी इकायों से लोढ़ा समिति के सुझाव पर अमल के बारे में 'स्टे्टस रिपोर्ट' तलब की थी। बौखलाए क्रिकेट राजनीति के खलीफा सहयोग नहीं, विरोध पर उतर आए।

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सुप्रीम कोर्ट को प्रशासक अब तक दो 'स्टेट्स रिपोर्ट' दे चुके हैं। दूसरी रिपोर्ट में उसने बोर्ड की कुछ इकाइयों की माली हालत के ब्यौरे भी दिए हैं, जिसे देखने के बाद समझ में आता है कि दशकों से क्रिकेट के कारोबार से जुड़ी जमात इतनी परेशान क्यों है? बीसीसीआई ही नहीं, उसकी हर इकाई के खातों में करोड़ों-अरबों रुपये जमा हैं। हिन्दुस्तान में क्रिकेट आज खेल नहीं, एक धंधा है, जिसमें अंधी आमदनी है। इसकी तस्दीक बोर्ड इकाइयों की बैलेंस शीट करती है। बीसीसीआई द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, 31 मार्च, 2016 तक सौराष्ट्र के खातों में करीब 213 करोड़, त्रिपुरा के खातों में 180 करोड़, पंजाब के खातों में 169 करोड़, मध्य प्रदेश के खातों में 116 करोड़, विदर्भ 104 करोड़ रुपये के करीब जमा थे। मतलब यह कि एक साल पहले महज पांच इकाइयों के पास करीब आठ अरब रुपये थे। एक अप्रैल 2016 के बाद बीसीसीआई ने अपनी दस इकाइयों (उत्तर प्रदेश, मुंबई, कर्नाटक, पंजाब, बंगाल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, हैदराबाद और दिल्ली) को ही लगभग साढ़े चार अरब रुपये बांटे। यदि बोर्ड और उसकी सभी तीस इकाइयों का पूरा हिसाब जोड़ें, तो उनके पास जमा रकम जानकर बड़े-बड़े कॉर्पोरेट को शर्म आ जाए।
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इतना धन होने के बावजूद तुर्रा यह है कि कुछ इकाई टेस्ट और आईपीएल मैच कराने के लिए बोर्ड से पैसा मांग रही हैं। बोर्ड इकाइयों में व्याप्त भ्रष्टाचार की झलक डिलोयट की आडिट रिपोर्ट से मिलती है। 2015 में बोर्ड अध्यक्ष बनने के बाद शशांक मनोहर ने डिलोयट कंपनी से बोर्ड इकाइयों के खातों का आडिट कराया था। रिपोर्ट के कुछ अंश सार्वजानिक हुए हैं, जिनसे करोड़ों रुपये की हेरा-फेरी का पता चलता है। रिपोर्ट से पता चलता है कि कैसे हैदराबाद इकाई ने सारे नियम ताक पर रख मैनेजिंग कमेटी के सदस्यों को सोने के सिक्के और उनकी पत्नियों को आभूषण दिए। गोवा में पदाधिकारियों के लिए 18 महंगी कार खरीदी गई। वैसे गत वर्ष गोवा क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव सहित तीन पदाधिकारियों को भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किया था। जम्मू-कश्मीर इकाई के 113 करोड़ रुपये के घोटाले की जांच तो पिछले दो साल से चल रही है। केरल इकाई ने 30 करोड़ की लागत से खेती की जमीन खरीदी। कुछ साल पहले असम यूनिट ने बीसीसीआई से 60 करोड़ रुपये उधार लिए थे, जो लौटाई नहीं गई है। डीडीसीए और हरियाणा इकाइयां तो अपनी गड़बड़ियों के लिए बरसों से बदनाम हैं। यदि गहराई में जांच हो, तो बीसीसीआई और उसकी हर इकाई के अनेक काले कारनामे सामने आ सकते हैं।

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