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क्रिकेट बोर्ड में बदलाव की उम्मीद

Mon, 13 Aug 2018 06:49 PM IST
मनोज चतुर्वेदी
मनोज चतुर्वेदी Updated Mon, 13 Aug 2018 06:49 PM IST
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Cricket board expected to change
मनोज चतुर्वेदी

लोढ़ा समिति द्वारा भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के लिए बनाए गए संविधान के मसौदे को कुछ बदलाव के साथ स्वीकार करने से भले ही न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा आहत हैं, पर इसके लागू हो जाने पर भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड और राज्य क्रिकेट एसोसिएशनों की शक्ल पूरी तरह बदल जाना तय है। नए संविधान के दो प्रावधानों- कूलिंग ऑफ पीरियड  और 70 साल से ज्यादा के लोगों को पदाधिकारी बनाने पर रोक लगाने- से बीसीसीआई में बदलाव आएगा। असल में इन दो प्रावधानों की वजह से बीसीसीआई के ज्यादातर पूर्व और मौजूदा पदाधिकारी चुनाव लड़ने के अयोग्य हो गए हैं। तीन-तीन साल के दो कार्यकाल के बाद एक कार्यकाल आराम करने वाले प्रावधान की वजह से बीसीसीआई के मौजूदा कार्यवाहक अध्यक्ष सीके खन्ना, सचिव अमिताभ चौधरी, पूर्व अध्यक्ष अनुराग ठाकुर, आईपीएल चेयरमैन राजीव शुक्ला और बृजेश पटेल-सभी चुनाव लड़ने के अयोग्य हो गए हैं। वहीं 70 साल से ज्यादा के लोगों को पदाधिकारी बनाने पर रोक वाले प्रावधान में छूट नहीं मिलने से शरद पवार, निरंजन शाह, एन श्रीनिवासन और जी गंगाराजू पहले ही दौड़ से बाहर हो चुके हैं।


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सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद अब बीसीसीआई के सीईओ जोहरी को 30 दिनों के भीतर नया संविधान रजिस्ट्रार ऑफ सोसाइटीज को सौंपना होगा और इसकी रिपोर्ट कोर्ट के महासचिव को सौंपनी होगी। राज्य एसोसिएशनों को भी इसी तरह अपने नए संविधान का रजिस्ट्रेशन कराना होगा। इसके अगले तीस दिनों में नए चुनाव कराने होंगे। सीएबी (बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन) के अध्यक्ष सौरव गांगुली का नाम बीसीसीआई अध्यक्ष के लिए चर्चा में है। वह एक प्रशासक के रूप में सीएबी से चार साल से जुड़े हुए हैं और पिछले तीन साल से अध्यक्ष हैं। पर बीसीसीआई अध्यक्ष बनने के लिए उन्हें सीएबी से इस्तीफा देना होगा। वह यदि बीसीसीआई अध्यक्ष चुने जाते हैं, तो इस पद पर दो साल ही रह सकेंगे।

बीसीसीआई और राज्य क्रिकेट एसोसिएशनें संविधान के मसौदे में जो बदलाव चाहती थीं, उनमें से ज्यादातर को मान लिया गया है। यह अलग बात है कि न्यायमूर्ति लोढ़ा संविधान के मसौदे में किए गए बदलावों से आहत हैं। बीसीसीआई एक राज्य-एक मत के खिलाफ था, जिसे मान लिया गया। इससे मुंबई, विदर्भ, सौराष्ट्र और बड़ौदा को मत देने का अधिकार बहाल हो गया है। वह कूलिंग ऑफ पीरियड में राहत चाहते थे, जो दे दी गई है। वह रेलवे, सेना और यूनिवर्सिटीज को मत देने का अधिकार देने के पक्षधर थे, यह भी दे दिया गया। इसके अलावा बीसीसीआई तीन के बजाय पांच ही चयनकर्ताओं को रखे जाने का पक्षधर था और उसकी यह मांग भी मान ली गई। सर्वोच्च न्यायालय ने जुलाई, 2016 में लोढ़ा समिति की सिफारिशें स्वीकार की थीं। उसने यदि तभी ये सभी सुधार करने की बात मान ली होती, तो बीसीसीआई के संचालन के लिए विनोद राय के नेतृत्व में  नियुक्त प्रशासकों की समिति को इतने समय तक शायद काबिज नहीं रहना पड़ता।

बीसीसीआई में नया संविधान लागू होने से चुनावों में यह तो तय है कि पदाधिकारी के तौर नए चेहरे नजर आएंगे। पर बोर्ड पर लंबे समय तक कुंडली मारे बैठे दिग्गज ने यदि डमी लोगों को बिठाने का प्रयास किया, तो पिछले दो साल से बीसीसीआई में सफाई के लिए चल रहे प्रयासों पर पानी फिर सकता है। बेहतर हो कि बीसीसीआई के संचालन के लिए नए समझदार लोग सामने आएं। ऐसा होना देश की क्रिकेट के भविष्य के लिए अच्छा होगा।

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