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प्रवासियों के लिए कितने तैयार हैं गांव

Thu, 07 May 2020 02:57 AM IST
patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Thu, 07 May 2020 02:57 AM IST
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covid19,india lockdown, How ready are the villages for the migrants
प्रवासी कामगार - फोटो : पीटीआई

प्रवासी मजदूर अपने गांवों की ओर लौट रहे हैं। गृह मंत्रालय ने विभिन्न राज्यों में फंसे लोगों को आवाजाही की मंजूरी दे दी है। लेकिन इसमें शर्त है। केंद्र ने राज्य सरकारों से फंसे हुए लोगों के आवागमन की सुविधा के लिए नोडल प्राधिकरण नियुक्त करने को कहा है। गृह मंत्रालय का कहना है कि ऐसे सभी लोगों को एक पखवाड़े के लिए घरेलू क्वारंटीन में रखा जाना चाहिए, जब तक कि चिकित्सकीय आकलन के लिए उन्हें संस्थागत रूप से क्वारंटीन करने की जरूरत न हो।


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केंद्र ने यह भी कहा है कि जिस राज्य से मजदूर जा रहे हैं, और जहां जा रहे हैं, उन दो राज्यों द्वारा इनकी पहले जांच करने और उनमें लक्षण न पाए जाने के बाद ही सड़क मार्ग से आवाजाही के लिए सहमत होना चाहिए, और राज्यों को सैनिटाइज्ड बसों की व्यवस्था भी करनी होगी। कई राज्य सरकारें विशेष रेलगाड़ियां चाहती हैं और कई रेलगाड़ियां पहले ही प्रवासी मजदूरों को लेकर रवाना हो चुकी हैं। आश्चर्यजनक रूप से, कई मामलों में प्रवासी श्रमिकों से, जिनमें से ज्यादातर दरिद्र हैं, घर जाने के किराये का भुगतान करने के लिए कहा जा रहा है। इस बात को लेकर भी चिंता बढ़ रही है कि अगर ये सभी श्रमिक घर लौट जाएंगे, तो फैक्टरियों में काम कैसे शुरू होगा।

लेकिन तथ्य यह है कि कठिनाइयों के बावजूद अधिकांश प्रवासी श्रमिक घर वापस जाने के लिए बेताब हैं। मध्य प्रदेश के इंदौर में पुलिस ने कुछ लोगों को कंकरीट मिक्सर ट्रक के टैंकर में यात्रा करते पकड़ा। वे लोग महाराष्ट्र से लखनऊ की यात्रा कर रहे थे। ट्रक को थाने भेज दिया गया है और प्राथमिकी दर्ज की गई है। यह कारुणिक चाहे जितना लगता हो, लेकिन हैरान नहीं करता। भारतीय राज्य ने शायद ही कभी प्रवासी श्रमिकों को ध्यान में रखते हुए नीतियां बनाई हैं। प्रवासी श्रमिक यह सब बहुत अच्छी तरह से जानते हैं।

यही कारण है कि वे घर वापसी के लिए ऐसे उपायों का सहारा ले रहे हैं। इस मामले में केरल एक अपवाद है। वह प्रवासियों की वास्तविकता को समझता है और कई राज्यों से आगे है। इसकी नीति प्रतिक्रियाएं यह दर्शाती हैं। इसने एक निवेश योजना भी बनाई है-एक रिटर्न माइग्रेशन निवेश पैकेज, जो प्रवासियों को लौटने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करेगा। लेकिन प्रवासियों का घर लौटना निकट भविष्य की कई चुनौतियों में से एक है। काम अब ग्रामीण इलाकों में स्थानांतरित हो गया है।

जब लाखों प्रवासी घर लौट जाएंगे, तब क्या होगा? ज्यादातर के पास पैसे नहीं हैं। वे क्या करेंगे? आने वाले महीनों में उनका परिवार कैसे जीवित रहेगा? गांव उनके लिए कितना तैयार है? ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था का क्या हाल है? आशा कार्यकर्ता जैसे अग्रणी स्वास्थ्यकर्मियों के लिए क्या योजना है, जिन्हें कम वेतन मिलता है और जिनके काम का बोझ अधिक है? आने वाले दिनों में इन सवालों पर ध्यान देने की जरूरत है।

जितने अधिक प्रवासी श्रमिक अपने गांवों में लौटेंगे, आशा कार्यकर्ताओं पर दबाव उतना ही बढ़ता जाएगा। देश भर की राज्य सरकारें ऐसी यात्रा करने वाले और उनके संपर्क में आने वाले लोगों का पता लगाने के लिए आशा कार्यकर्ताओं पर निर्भर हैं।

ऐसे लोगों की बहुत बड़ी संख्या को देखते हुए, जिन्हें कोरोना पॉजिटिव पाए जाने पर क्वारंटीन और कलंकित होने का डर है, अनेक लोग अपने यात्रा-इतिहास को छिपाना चाहते हैं। किसी भी तरह की असहज करने वाली पूछताछ उन्हें आक्रामक बना सकती है और आशा कार्यकर्ताओं की सुरक्षा को खतरे में डाल सकती है। और जाहिर है, आशा कार्यकर्ता जितने अधिक घरों में जाती हैं, उनके खुद के संक्रमित होने की आशंका उतनी ही अधिक होती है।

पिछले हफ्तों में इन अग्रणी स्वास्थ्यकर्मियों पर हुए हमलों के मद्देनजर इनकी सुरक्षा और बेहतरी एक महत्वपूर्ण नीतिगत प्राथमिकता बन गई है। फिर गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच का भी मुद्दा है। सामान्य दिनों में भी ग्रामीण भारत के अधिकांश हिस्सों में यह एक समस्या है। कोविड-19 के मद्देनजर यह और बदतर हो गया है।

गैर-कोविड-19 मरीजों के बारे में लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं कि सार्वजनिक परिवहन के अभाव में ग्रामीण भारत में उन्हें स्वास्थ्य सेवा हासिल करने में मुश्किलें पेश आ रही हैं। भारत बेशक इससे निपट सकता है, लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि इसके लिए सभी राज्य समान रूप से तैयार नहीं हैं।

गांव लौटने वाले कितने प्रवासी श्रमिकों को खेती में काम मिलेगा और कृषि उत्पाद को समय पर बाजार उपलब्ध कराने के लिए क्या किया जा रहा है? इस बात को लेकर काफी चर्चा हो रही है कि गांव लौटने वाले प्रवासी श्रमिकों को मनरेगा के तहत काम दिया जा रहा है। लेकिन जमीनी हकीकत उत्साहजनक नहीं है। जिस तरह कुछ निजी नियोक्ताओं ने गृह मंत्रालय के निर्देश के बावजूद प्रवासी श्रमिकों को लॉकडाउन अवधि में वेतन नहीं दिया है, उसी तरह मनरेगा के लाभ भी अब तक सीमित हैं।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 30 अप्रैल तक केवल 30 लाख से अधिक लोगों को मनरेगा के तहत काम दिया गया, हालांकि केंद्र ने 20 अप्रैल से मनरेगा मजदूरों को काम देने के लिए अपनी मंजूरी दे दी। कई राज्यों में मनरेगा का काम शुरू भी नहीं हुआ है। भारत की 1.3 अरब आबादी में से दो तिहाई ग्रामीण है, जो करीब 6,50,000 गांवों में फैली हुई है।

टीकाकरण के काम और गर्भवती महिलाओं के प्रसव की जांच रुकी रहने की खबरें सामने आ रही हैं। ग्रामीण इलाकों में भूखे लोगों की संख्या बढ़ गई है। जिस तरह आशाएं गुमराह कर सकती हैं, उसी तरह आशंकाएं भी अंततः झूठी हो सकती हैं। अतीत अपूर्ण है और भविष्य तनावपूर्ण है। ऐसे मुश्किल वक्त में भारत को सामाजिक एकजुटता की जरूरत है। चाहे कुछ भी हो जाए, हमें लांछन या पूर्वाग्रह को जीतने नहीं देना है। (लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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