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अपने पेशे को सम्मान देने का साहस : मुफलिसी में भी साहित्य सृजन और संबंधों को प्रभावित करता पेशेवर जीवन
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प्रतीकात्मक तस्वीर।
- फोटो :
iStock
विस्तार
आज 'मोची' चमड़े के सामान का ग्लोबल ब्रांड है। इस कंपनी में काम करने वाले किसी जाति विशेष के लोग नहीं हैं। पर सामाजिक संरचना में इस पेशे के लोगों को सम्मान से नहीं देखा गया। स्वयं मोचीगीरी करने वाला व्यक्ति अपने काम और अपनी जाति को हीन समझता है। इस पेशे से जुड़े अधिसंख्य लोग नहीं चाहते कि उनकी पहचान उनके बच्चों के साथ जुड़ी रहे। अधिसंख्य जूता कारीगर अपनी दुकान में संत रैदास की तस्वीर टांगते हैं। इधर दो दशकों से डॉ. आंबेडकर की तस्वीरें भी इन दुकानों में टंगी दिखने लगी हैं ।
जीवनीकारों ने लिखा है कि सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन रुकने से जब डॉ. आंबेडकर के पिता की माली हालत खराब हो गई, तब वह जूता बनाने का काम करने लगे थे। बालक आंबेडकर भी स्कूल के बाद पिता के काम में हाथ बटाते थे। पर अब ऐसा नहीं है। करीब तीस साल पहले इन पंक्तियों के लेखक के साथ रजत रानी ‘मीनू‘ ने अपने कैमरे से एक जूता बनाने वाली की तस्वीर लेने की कोशिश की थी, तो उन्होंने यह कहकर डपट दिया था कि 'आप जानती नहीं, मेरा बेटा कितना बड़ा आदमी है। मेरी तस्वीर छप गई तो उसे कौन इज्जत देगा?'
ऐसे में पंजाबी के चर्चित लेखक और अनुवादक द्वारका राजू भारती बधाई के पात्र हैं। वह पंजाब के जालंधर में जूते तैयार करते हुए साहित्य सेवा कर रहे हैं। उनकी आत्मकथा का शीर्षक ही मोची है। उनका अपने पेशे के प्रति पूरा सम्मान है। उनकी आत्मकथा का मर्मस्पर्शी अध्याय है, 'सुलगता लावा।' उन्होंने लिखा है, 'मेरे ससुर मनीराम से आत्मिक संबंध मानो टूट ही गए थे, जोड़ने की जितनी कोशिशें की गईं, उतने ही वे बिखरते गए। अपने दामाद के काम-धंधे को लेकर ताना देने वाला शायद दुनिया का यह पहला ससुर होगा। जिस काम से कमाई रोटी खाकर उनकी बेटी अपना पेट भर रही हो, बच्चे पल रहे हों, उस काम का ताना देना कहां तक जायज था? यही सोचकर मेरे भीतर पल रहे बवंडर मुझे रात भर सोने नहीं देते थे।'
व्यक्ति का पेशेवर जीवन उसके संबंधों को प्रभावित करता है। इस किताब की भूमिका में लिखा गया है, 'हरियाणा का एक लड़का तमिलनाडु में संस्कृत का प्रोफेसर था। उसकी शादी के निमंत्रण पत्र छप चुके थे। जब लड़की वालों को पता चला कि लड़के के परिवार वाले अब भी जूते बनाते हैं, तो उन्होंने रिश्ता तोड़ दिया।
यों तो देश के हर शहर में जूते बनाने वाले मिलते हैं। चेन्नई में महिलाएं भी यह काम करती मिलती हैं। इन दिनों राजस्थान में शिक्षक की मार की भेंट चढ़े छात्र के अलावा एक और वीडियो वायरल हो रहा है। हिंदी कवि रामबाबू गौतम न्यू जर्सी, अमेरिका से इसका भरपूर प्रचार- प्रसार कर रहे हैं। यह रोशन सिंह रामदसिया का वीडियो है, जो सूट-बूट, टाई, हैट लगाकर जूते तैयार करने बैठते हैं। वह कहते हैं कि धागा-मिल की नौकरी छूटने के बाद गंगानगर रेलवे फाटक के पास हनूमानगढ़ी में अपने पैतृक पेशा बूट-पॉलिश करने लगा।
मोची मसला ग्लोबल है। ममता कालिया द्वारा संकलित विश्व की श्रेष्ठ कहानियां में एक कहानी मोची भी है, जिसके लेखक हैं जॉन गॉल्सवर्दी। इसमें जूता कारीगर मिस्टर गेस्लर, जिन्हें अपनी कारीगरी में गहरा विश्वास है, उपभोक्ताओं के बदलते रुझान से दुखी हैं। यह कहानी उपभोक्तावादी संस्कृति और उभरते बाजारवाद के प्रभाव पर आधारित है, जब चमड़े के स्थान पर रबड़ के सस्ते जूते बनने लगे, मशीनों से काम होने लगा और हस्त कारीगरों का धंधा पिटने लगा।
इंग्लैंड या भारत नहीं, संपूर्ण विश्व ही बाजारवाद की चपेट में है। ऐसे कई महान कारीगरों के चेहरे इन पंक्तियों के लेखक की स्मृति में भी कौंधते हैं, जिनके बेहतरीन जूतों का काम-धंधा रबड़ सोल और मशीनें आने से पिट गया। वे कारीगरी की दुकान छोड़कर फुटपाथ पर आ बैठे और जूते की मरम्मत और पॉलिश करते हुए लोगों की नजर में और कमतर होने लगे।
हंस ने जुलाई, 2007 के अंक में यहां एक मोची रहता था नाम से एक आत्मकथांश प्रकाशित किया था, जिसमें वर्ष 1970-72 के दौरान डिबाई रेलवे क्रॉसिंग पर बैठा 10-12 साल का एक बच्चा बूट पॉलिश करता था। वह फेंककर देने वाले ग्राहक के पैसे वापस फेंक देता था और खाली वक्त फुटपाथी किताबों में दिमाग खपा देता था। कालांतर में वह एक लेखक- शिक्षक बन गया,तो यह चमत्कार से क्या कम है?
पंजाबी में द्वारका राजू भारती जैसी आत्मकथाएं पहले भी आई हैं, पर उनमें दलित चेतना कम थी। लाल सिंह ‘दिल‘ ने अपनी आत्मकथा दास्तान में लिखा, 'पुलिस वाले नक्सली कहकर तो मारते ही थे, जाति का नाम लेकर चार डंडे और अधिक मारते थे।' भूख और गरीबी के कारण लालसिंह ‘दिल‘ की असमय मृत्यु हो गई। हालांकि यह भी सच है कि उस किताब में क्रांति की अतिवादिता का फ्रस्टेशन था, दलित दृष्टि नहीं थी।