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आपसी सहयोग से चलेगा देश

Fri, 22 Feb 2013 09:42 PM IST
अरुण नेहरू
अरुण नेहरू Updated Fri, 22 Feb 2013 09:42 PM IST
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country will run with cooperation

बजट सत्र शुरू हो चुका है और उम्मीद है कि अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए कई सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे। पिछले एक दशक में हमारी अर्थव्यवस्था पर ऐसा दबाव कभी नहीं रहा, लेकिन यह भी सच है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था इतनी खराब कभी नहीं रही।

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जाहिर है, यह वर्ष आर्थिक लिहाज से मुश्किल भरा होगा। इसलिए तमाम चुनावी गर्जन-तर्जन के बावजूद आर्थिक मसलों पर सत्ता पक्ष एवं विपक्ष के बीच थोड़ा सहयोग जरूरी है। अगर ऐसा होता है, तो उसका स्वागत होना चाहिए। गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने हिंदू आतंकवाद वाले अपने बयान पर अफसोस जाहिर कर सकारात्मक संकेत दिया। खुद उन्होंने तो परिपक्वता का परिचय दिया ही, भाजपा ने भी उनकी माफी को स्वीकार कर उदारता का परिचय दिया है।
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काश, राजनीति में व्यापक स्तर पर ऐसा हो सकता! राजनीतिक लड़ाई में अक्सर काफी कुछ कहा और किया जाता है, लेकिन उसे पीछे छोड़ देना ही बेहतर है। शिंदे वाले विवाद का जैसा सुखद अंत हुआ, आशा है कि प्रेस परिषद के अध्यक्ष से जुड़ा विवाद भी इसी तरह खत्म हो जाएगा।
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प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू के बयान से मैं काफी असहज  हूं। अपनी पार्टी के बचाव में अरुण जेटली की प्रतिक्रिया अपेक्षित थी। हमने देखा कि सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश ने टीवी कार्यक्रम में काफी कठोर शब्दों का प्रयोग किया और एक वरिष्ठ टीवी पत्रकार को बाहर निकल जाने के लिए कह दिया। यह सब दुर्भाग्यपूर्ण है। इस पर उन्हें खेद जताना चाहिए।

पूर्व न्यायाधीशों को ऐसे मामलों में छूट मिली होती है और वे ऐसी सार्वजनिक बहसों में हिस्सा नहीं लेते, जहां उनके कामकाज पर सवाल उठाया जा सकता है। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। ऐसी घटनाएं भविष्य में व्यापक जवाबदेही सुनिश्चित किए जाने की जरूरत पर बल देती हैं।

बाबा रामदेव से जुड़े ताजा मामले ने एक बार फिर साफ किया है कि गैरराजनीतिक आंदोलन राजनीति का विकल्प नहीं हो सकता। राजनीतिक संघर्ष बेशक भीषण होते हैं। यह भी सच है कि मौजूदा राजनीति से लोग हताश हो चले हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि स्वयंभू सामाजिक कार्यकर्ताओं को वह जगह दे दी जाए।

बाबा रामदेव इन दिनों कई मोर्चों पर घिरे हुए हैं। आयकर अधिकारियों के मुताबिक, उन्होंने करोड़ों रुपये की कर चोरी की है। उनके गुरु के लापता होने का मसला भी गंभीर है। अब खबर यह है कि हिमाचल के मुख्यमंत्री ने उन्हें लीज पर दी गई जमीन के पट्टे को रद्द कर दिया है। कम ही लोग होंगे, जो इस मामले में बाबा रामदेव का समर्थन करेंगे।

अब पूर्व सेनाध्यक्ष वीके सिंह को ही देख लीजिए। वह यूपीए को चोट पहुंचाने के लिए लगातार अभियान चलाए हुए हैं, लेकिन आम आदमी के लिए इन सब का कोई मतलब नहीं है। इसलिए मुझे नहीं लगता कि अब कोई राजनीतिक दल इन लोगों के लिए अपनी जगह छोड़ने की गलती करेगा।

अपनी हाजिरजवाबी के लिए प्रख्यात पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने विपक्ष के नेता के तौर पर एक बार कहा था कि जब वह देश में रहते हैं, तब सत्ताधारी लेबर पार्टी पर हमले में कंजूसी नहीं करते, और जब विदेश में होते हैं, तब अपने देश की सरकार के हर फैसले का समर्थन करते हैं।

इसे पिछले दिनों हार्वर्ड में अपने व्याख्यान में हमारे नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) द्वारा यूपीए सरकार के खिलाफ की गई टिप्पणियों के संदर्भ में देखें, तो वाकई हताशा होती है। न तो 2 जी से जुड़े कैग के आकलन का कोई अर्थ था और न ही कोल ब्लॉक आवंटन में की गई आलोचना का कोई असर हुआ। ऐसे में भविष्य में कैग की रिपोर्ट का शायद ही प्रभाव पड़े।

हर किसी के पास यह विकल्प है कि वह चुनाव लड़कर अपनी आध्यात्मिक, नैतिक या बौद्धिक क्षमता साबित करे। पर ऐसा नहीं हो सकता कि सांविधानिक पदों पर बैठकर आप घटिया राजनीति करें। ऐसी स्थिति में जवाबी हमला अप्रत्याशित नहीं। बजट सत्र में हम ऐसा ही कुछ देखेंगे।

आशीष नंदी के बयान वाले मामले में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी भूलने लायक नहीं है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ हमारी जिम्मेदारी भी है कि पुराने घावों को न कुरेदें। इसे जीवन में उतारना चाहिए। पश्चिम बंगाल की हिंसक घटनाएं परेशान करने वाली हैं। दबाव में होने के कारण ममता बनर्जी के भड़कने का खतरा है। तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के पास चुप रहने के सिवाय कोई चारा नहीं है। ऐसा लगता है कि माकपा के आगे तृणमूल कांग्रेस अपना जनाधार खो रही है और कांग्रेस भी मौका तलाश रही है, क्योंकि तृणमूल के नेता पार्टी में नियंत्रण को लेकर अंदरूनी झगड़ों में व्यस्त हैं।


राहुल गांधी ने पिछले दिनों त्रिपुरा, नगालैंड एवं मेघालय का चुनावी दौरा किया। उन राज्यों में कांग्रेस को हालांकि ज्यादा चुनौती नहीं है, पर यह अच्छी बात है कि इन राज्यों में परचम लहराने के बाद राहुल गांधी ओडिशा का रुख करेंगे और अपनी नई जिम्मेदारियों का निर्वहन करेंगे। उधर नरेंद्र मोदी शांत हैं। उन्होंने कुंभ मेले से परहेज किया और धार्मिक आयोजनों में राजनीति करने से दूरी बनाकर भाजपा के अंदरूनी झगड़ों में पड़ने से खुद को बचाया। वैसे हर राज्य में राजनीतिक विवाद की आग सुलग रही है, क्योंकि हर कोई धीरे-धीरे चुनावी युद्ध के लिए तैयार हो रहा है।

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