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Cough Syrup Case: दवा उद्योग की साख पर आंच
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सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के बाद जिस एक मामले में भारतीय कंपनियों ने दुनिया में काफी नाम और दाम कमाया है, वह भारत का दवा उद्योग है। जेनेरिक दवाएं बनाने और पूरी दुनिया में उन्हें बेहद सस्ती दरों पर उपलब्ध कराने के चलते ही आज कोरोना के नए विस्फोट से जूझ रहे पड़ोसी चीन के नागरिक इंटरनेट पर खोजकर भारतीय कंपनियों की सस्ती कोविड दवाएं खरीद रहे हैं। लेकिन इसी के साथ एक नई खबर है कि पूर्व सोवियत संघ का हिस्सा रहे मध्य-एशियाई देश उज्बेकिस्तान में हाल में एक भारतीय दवा कंपनी का कफ सिरप पीने से 18 बच्चों की मौत हो गई। इससे पहले हाल ही में गाम्बिया में भारतीय कफ सिरप पीकर करीब 70 बच्चों की मौत की खबरें भी आई थीं। इन दोनों घटनाओं ने भारतीय दवा कंपनियों की साख पर बट्टा लगाया है।
अक्सर ऐसे मामलों में दोष या तो उन्हीं देशों के स्वास्थ्य तंत्र पर डाला जाता है, जो यहां से दवाएं पूरी जांच और तसल्ली के बाद मंगाता और अपने यहां वितरित करता है। या फिर दवा लेने वाले मरीजों पर ही यह दोषारोपण किया जाता है कि संभवतः उन्होंने दवा लेते वक्त निर्देशों का पालन नहीं किया। गाम्बिया मामले में जिस दवा कंपनी पर उंगली उठी थी, उसे हमारे देश में क्लीन चिट दी जा चुकी है। लेकिन ऐसी दो-चार घटनाएं भी भारतीय दवा कारोबार की उस अंततराष्ट्रीय ख्याति और साख को मुश्किल में डाल सकती है, जो उसने दशकों की मेहनत से कमाई है। सवाल यह है कि आखिर ऐसी घटनाएं क्यों हो रही हैं।
यह कहना गलत नहीं होगा कि ऐसे कुछ मामलों में दवा कंपनियों की लापरवाही एक बड़ी वजह हो सकती है। विदेश में भेजी जा रही खेपों में वहां के कायदों-मानकों का कितना पालन किया जाता है- यह तो दवा कंपनियां ही बता सकती हैं, लेकिन इसका अनुमान लगाना ज्यादा कठिन नहीं है कि वे अलग-अलग देशों के हिसाब से अपनी दवाओं के फॉर्मूलों में शायद ही फर्क करती होंगी। दूसरा स्तर लापरवाही का है। वर्ष 2019 में हुए एक खुलासे के मुताबिक, सरकार समय-समय पर पोलियो टीकाकरण का कार्यक्रम चलाकर देश के लाखों-करोड़ो बच्चों को जिस पोलियो वैक्सीन की दो-दो बूंदें पिला रही थी, उस वैक्सीन में ही टाइप-2 पोलियो वायरस मौजूद था।
इसकी पुष्टि मार्च, 2019 में सरकारी प्रयोगशाला सेंट्रल ड्रग्स लैबोरेटरी (सीडीएल) ने की थी। उसने बताया कि वर्ष 2016 में देश के दो राज्यों, उत्तर प्रदेश और तेलंगाना में जो पोलियो वैक्सीन बच्चों की दी गईं थीं, उनमें यह वायरस था। पता चला था कि ये एजेंसियां पोलियो के टाइप-2 वायरस की जांच यह मानकर नहीं कर रही थीं कि इस वायरस का खात्मा दुनिया से हो चुका है। इसी साल नवंबर, 2022 में अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने भारतीय दवा कंपनी ल्यूपिन लिमिटेड को एक चेतावनी पत्र भेजा है, जिसमें कहा गया है कि इस कंपनी की तारापुर (महाराष्ट्र) स्थित इकाई में बनाई जा रही दवाओं के निर्माण में मानकों का उल्लंघन हो रहा है। अमेरिकी एफडीए के चेतावनी पत्र के मुताबिक, कंपनी की सक्रिय दवा सामग्री या एपीआई (जो दवा बनाने में इस्तेमाल होती है) मिलावटी पाई गई, जिससे नियमों का उल्लंघन होता है।
अमेरिकी प्रशासन अपने नागरिकों की सेहत और दवाओं से लेकर खान-पान तक के मामले में बेहद सजग रहता है, इसलिए वहां ऐसी जांच-पड़ताल की जाती है। लेकिन गाम्बिया और उज्बेकिस्तान ऐसे मुल्कों की श्रेणी में नहीं आते। ऐसे में इन कंपनियों को हमारे निगरानी तंत्र से छूट और संरक्षण भी मिल जाता है, जैसा गाम्बिया वाले मामले में हुआ। हालांकि भारत सरकार की कमेटी ने गाम्बिया को कफ सिरफ भेजने वाली कंपनी को क्लीन चिट दे दी, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दवा के अवयवों के अनुपात पर सवाल उठा दिया। बेशक दवा उद्योग के मामले में भारतीय कंपनियों की साख अच्छी है। दुनिया में तीसरे नंबर पर आने वाले हमारे फार्मा उद्योग की वैश्विक दवा निर्यात में 20 फीसदी हिस्सेदारी है और सस्ती जेनेरिक दवाओं का भारत सबसे बड़ा उत्पादक है। ऐसे में, अगर दवा कंपनियों की गड़बड़ियों को सुधारने के बजाय उन्हें छिपाने-दबाने का काम किया गया, तो ज्यादा बड़ा खतरा हमारी साख के लिए है।