उम्मीद का गलियारा
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भारत-पाकिस्तान रिश्ते में इस वर्ष करतारपुर गलियारे का निर्माण और अगले हफ्ते प्रस्तावित इसका उद्घाटन ही एकमात्र सकारात्मक घटनाक्रम है और इसकी 1960 की सिंधु जल संधि से ठीक ही तुलना की जा रही है, जो कि चिरस्थायी शत्रुता के बावजूद कायम है। यह गलियारा उस स्थान पर स्थित है, जहां गुरु नानक ने अपने जीवन के अंतिम 18 वर्ष बिताए थे। इसके खुलने से भारतीय तीर्थयात्री करतारपुर स्थित दरबार साहिब गुरुद्वारे के दर्शन कर सकेंगे। यह गलियारा भारत के गुरुदासपुर के डेरा बाबा नानक को पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गुरुद्वारे से जोड़ेगा। यह देखते हुए कि दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंध में कैसी खटास है, भारी उतार-चढ़ाव तथा अनिश्चितताओं के बीच हुए इस समझौते को चमत्कार ही कहा जा सकता है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए।
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यह एक अनूठा समझौता है क्योंकि यह तीर्थयात्रियों को बिना वीजा के सीमा पार यात्रा की इजाजत देता है। भारत ने बहुत अनमने ढंग से पाकिस्तान की ओर से प्रस्तावित प्रति तीर्थयात्री 20 डॉलर के सेवा शुल्क को मंजूर किया है। पाकिस्तान का तर्क है कि उसने जो ढांचागत खर्च किया है और वह तीर्थयात्रियों को जो सेवा प्रदान करेगा उसके एवज में यह शुल्क जरूरी है। यह सच है, लेकिन मौजूदा वीजा शुल्क दो डॉलर के मुकाबले यह बहुत अधिक है। भारत की ओर से 575 सदस्यीय जो पहला जत्था करतारपुर गलियारे से जाने वाला है, उसमें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और विभिन्न दलों तथा विभिन्न तबके के सिख प्रतिनिधि शामिल होंगे। आखिर भारत इस गलियारे की मांग क्यों कर रहा था? सिख समुदाय की सर्वाधिक आबादी भारत में रहती है और वह उनके प्रति अपनी वैध भूमिका निभाना चाहता है। वह यह संदेश देना चाहता है कि वह अपने इस महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक समुदाय का दुनिया भर में फैले सिख प्रवासियों जैसा ही सम्मान करता है। अभी एक चमकदार उदाहरण कनाडा ने पेश किया है, जहां हाल ही में हुए संसदीय चुनाव में 17 सिख/पंजाबी प्रतिनिधि चुनकर आए हैं।
तीर्थयात्रियों को लेकर भारतीय सुरक्षा अधिकारियों की चिंता वाजिब है, क्योंकि दूर-दराज के देशों से ऐसे तीर्थयात्री भी यहां आ सकते हैं, जो खालिस्तान समर्थक प्रचार से प्रभावित हो जाएं। पाकिस्तान में सक्रिय ऐसे तत्वों के पर्याप्त सबूत सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं। इन्हीं तत्वों ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किए जाने पर पश्चिमी देशों की राजधानियों में हाल ही में विरोध प्रदर्शनों को अंजाम दिया था। कहने की जरूरत नहीं है कि सरहद के दोनों ओर के पंजाबी शानदार मेजबान हैं। पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (पीएसजीपीसी) ने पाकिस्तान सरकार की मदद से तीर्थयात्रियों के लिए पाकिस्तान स्थित गुरुद्वारों खासतौर से ननकाना साहिब और करतारपुर साहिब को लेकर विस्तृत कार्यक्रम तैयार किया है। समझौते के तहत रोजाना पांच हजार श्रद्धालु इन गुरुद्वारों के दर्शन कर सकते हैं। परस्पर सद्भाव कायम करने के लिए यह एक महान अवसर साबित हो सकता है। लेकिन सरकारों के बीच कायम स्थायी शत्रुता की उपेक्षा नहीं की जा सकती है, जिसका कुछ असर लोगों और तबकों पर पड़ता है।
भारत में राजनीतिक और चुनावी विमर्श में पाकिस्तान जिस तरह से एक मुद्दा बन गया है, वह गौर करने लायक है। पाकिस्तान की ओर से लगाई जा रही 20 डॉलर की लेवी को जजिया टैक्स कहकर मध्य युग में मुस्लिमों द्वारा सिखों पर की गई ज्यादती की याद दिलाना सस्ती लोकप्रियता बटोरने जैसा है। भारत के धार्मिक स्थलों पर भी विशेष दर्शन के लिए अलग से शुल्क लिए जाते हैं। यहां तक कि भारत ने कभी मानसरोवर जाने वाले भारतीय यात्रियों से चीन द्वारा वसूले जाने वाले शुल्क पर और उसकी वृद्धि पर एतराज नहीं किया। भारत को शिकायत संभवतः इस वजह से है कि करतारपुर साहिब से उसे तो ढाई करोड़ डॉलर की कमाई होगी, जबकि पाकिस्तान को 3.6 करोड़ डॉलर मिलेंगे। वहीं करतारपुर गलियारे से संबंधित समझौते पर बातचीत के बीच ही पाकिस्तान सेना से जुड़े इंटर सर्विस पब्लिक रिलेशंस (आईएसपीआर) ने एक भारत विरोधी विवादस्पद वीडियो जारी किया था। इसमें एक भारी भरकम सिख को नशे की हालत में आईएसपीआर द्वारा तैयार किए गए एक गाने पर नाचते दिखाया गया था। इसमें कुछ लोग हिंदू साधुओं के वेश में नजर आए और कुछ गांधी टोपी पहने हुए थे और नशे में झूम रहे थे। इसमें शामिल नृत्यांगना नीलम मुनीर ने पाकिस्तानी अखबार डान को बताया 'मैंने इस गाने में इसलिए हिस्सा लिया, क्योंकि यह आईएसपीआर का प्रोजेक्ट था। लेकिन इस तरह का यह मेरा पहला और संभवतः आखिरी गाना है। लेकिन आप जानते हैं कि मैंने जो कुछ किया उस पर मुझे गर्व है। पाकिस्तान के लिए मेरी जान हमेशा हाजिर है।'
यह सब तब हुआ जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान गलियारे के निर्माण की पहल करने और उसे पूरा करने का श्रेय ले रहे हैं और यहां तक कि खुद वह भी भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ जहर उगल रहे हैं और उन्हें हिटलर तथा भाजपा व संघ परिवार को नाजी बता रहे हैं। इस सबके बावजूद पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह बहुत सकारात्मक हैं। उनके दादा पटियाला महाराज भूपिंदर सिंह ने बाढ़ से हुए नुकसान के बाद 1,35,000 रुपये देकर इस पवित्र स्थल की मरम्मत करवाई थी। उन्होंने हाल ही में लिखा, मेरा मानना है कि इस गलियारे ने हमें दिखाया है कि इन सात दशकों में जिन मतभेदों ने बड़ा हिस्सा अस्वाभाविक रूप से नष्ट कर दिया, 'उन्हें पाटा जा सकता है।...मुझे विश्वास है कि दोनों देशों के लोगों के बीच इससे भविष्य को लेकर उम्मीद जगेगी।' अमरिंदर सिंह ने समझदारी भरा दृष्टिकोण व्यक्त किया है, जिसकी कमी दोनों ओर है। यह आने वाला समय बताएगा कि क्या साढ़े चार किलोमीटर लंबा यह गलियारा दोनों देशों के बीच अमन कायम में मददगार होता है।