फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   corporate yogi yogesh chander deveshwar

योगेश चंद्र देवेश्वर: कॉरपोरेट जगत के योगी

Fri, 04 Jan 2013 10:39 PM IST
अमर दीप तिवारी
अमर दीप तिवारी Updated Fri, 04 Jan 2013 10:39 PM IST
विज्ञापन
corporate yogi  yogesh chander deveshwar
वह आईटीसी के सीईओ हैं, लेकिन अपने दोस्तों और सहयोगियों के बीच योगी के नाम से जाने जाते हैं। हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू ने हाल ही में दुनिया के शीर्ष 100 मुख्य कार्यकारी अधिकारियों की जो सूची बनाई है, उसमें योगी, यानी योगेश चंद्र देवेश्वर को सातवां स्थान मिला है। इससे पहले वर्ष 2011 में उन्हें पद्म भूषण सम्मान मिल चुका है, हालांकि विरोधी लॉबी ने तब सरकार के इस फैसले का विरोध किया था। पर उनकी उपलब्धियां विरोध की आवाजों से कहीं ज्यादा प्रभावी साबित हुई हैं।
विज्ञापन


उनकी अगुवाई में कंपनी का बाजार पूंजीकरण 35 अरब डॉलर तक पहुंचा, जबकि टर्नओवर सात अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर चुका है। उनके दृढ़ निश्चय ने ही आईटीसी को एफएमसीजी व सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों की कतार में ला खड़ा किया है। वह मानते हैं कि कारोबार में कई बार जोखिम लेना ही सबसे बड़ा जोखिम हो जाता है, लेकिन यही कामयाबी की संभावनाएं बढ़ा देता है।

विज्ञापन


देवेश्वर के बारे में फोर्ब्स ने 2010 में लिखा था कि अपने कार्यकाल के शुरुआती वर्षों में उन्होंने ई-चौपाल की शुरुआत की और उसे विस्तार देने की दिशा में काम करना शुरू किया। ई-चौपाल डिजिटल प्रौद्योगिकी के जरिये ग्रामीण कारोबार के लिए प्लेटफॉर्म तैयार करने का एक सिद्धांत है। उनके इस विचार ने कारोबारी समाज से लेकर शैक्षणिक समुदाय के बीच खलबली मचा दी।
विज्ञापन
विज्ञापन


इसके लिए न सिर्फ उन्हें पुरस्कृत किया गया, बल्कि हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में यह एक केस स्टडी का माध्यम भी बना। लाहौर में फरवरी, 1947 में जन्मे देवेश्वर का मानना है कि उनका और उनकी कंपनी का उद्देश्य भविष्य के लिए तैयार रहना है। इसलिए कंपनी कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, पर्यटन और होटल जैसे क्षेत्रों में भारी-भरकम निवेश कर रही है।


आईआईटी दिल्ली से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक करने वाले समावेशी विकास के हिमायती देवेश्वर का मानना है कि उच्च विकास दर हासिल करना तभी सार्थक होगा, जब देश की गरीब जनता अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा में शामिल होकर भागीदारी प्रदर्शित कर सके। उन्होंने इसे भारत की समावेशी विकास की सबसे बड़ी चुनौती भी बताया है। दोस्तों द्वारा दिए गए नाम के अनुरूप वह अपने अंदर की आवाज सुनने में यकीन रखते हैं। कहते हैं कि जिंदगी की हर बड़ी यात्रा में चुनौतियां व संभावनाएं होती हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed