फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   coronavirus : Human spiritualism found in scientific rationalism

वैज्ञानिक बुद्धिवाद में मिला मानवीय अध्यात्मवाद

Fri, 10 Apr 2020 01:14 AM IST
Sandeep Joshi संदीप जोशी
Updated Fri, 10 Apr 2020 01:14 AM IST
विज्ञापन
coronavirus : Human spiritualism found in scientific rationalism
lockdown

दुनिया आज अभूतपूर्व महाबंदी से गुजर रही है। पिछली शताब्दी में हुए दो विश्व युद्धों के दौरान भी दुनिया इतनी आतंकित नहीं हुई थी। जिस दुनिया ने आर्थिक वैश्विकता के लिए नजदीक आने का वादा किया था, आज वही सामाजिक फासला बनाने की प्रार्थना कर रही है। जीवन डरावना और संक्रमित लग रहा है। भविष्य बिन काम-धाम के अंधकार से गुजर रहा है। मानवीय आस्था बेशक डॉक्टरों पर बनी हुई है, पर आध्यात्मिक आस्था प्रार्थना पर निर्भर है।


loader

आधुनिक सभ्यता की गहन आलोचना करने वाले तो महात्मा गांधी ही थे। उनकी आलोचना का कारण इस सभ्यता को प्रिय लगने वाली तेजी, रफ्तार या गति और इसके अलावा तकनीकी योग्यता पर अति निर्भरता रही। इसी कारण जीवन का आधारभूत तत्व प्रकृति नजर अंदाज होती रही है। गांधी जी का मानना था कि वही राज्य व्यवस्था आदर्श हो सकती है, जिसमें समाज के आखिरी गरीब का भी ध्यान रखने की योजना हो।

उनका मानना था कि राष्ट्र की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक नीतियां गांव और गांववालों को केंद्र में रखकर ही बनाई जानी चाहिए। लेकिन आज गांव उजाड़ और शहर झुग्गी बस्ती में तब्दील कर दिए गए हैं। साबरमती आश्रम छोड़ने के बाद गांधी जी ने 1936 में तय किया कि नया आश्रम भारत के मध्य में हो।

वर्धा के पास छोटे से-गांव में सेवाग्राम आश्रम बना। सेठ जमनालाल बजाज को वह आश्रम बनाना था। शर्त थी कि आश्रम बनाने के लिए जरूरत का सभी कच्चा माल केवल पांच किलोमीटर के दायरे में से ही जुगाड़ा जाए। इससे तीन स्थानीय बातों के बढ़़ावा पर जरूरी ध्यान देना था-आर्थिकी, आत्मनिर्भरता और समरसता। सभ्यता के सम विकास के लिए ये तीनों महत्व रखते हैं।

दो-तीन दशक पुरानी वैश्विकता की इच्छा आज भी सामाजिक के बजाय राजनीतिक ही रही है। आज जब पूरा विश्व कोविड-19 महामारी से जुझ रहा है, तब कुछ राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक बदलाव आते दिखाई दे रहे हैं। दुनिया चाहे न देखना चाहे, मगर बदलाव छिपे नहीं रह पाएंगे। आज सबसे जरूरी है कि दुनिया राजनीतिक आर्थिकी से निकल कर सामाजिक आर्थिकी पर चले।

हम सभी जानते हैं कि सबसे धनी एक प्रतिशत लोग ही दुनिया की 50 प्रतिशत से ज्यादा संपत्ति का मालिकाना हक रखते हैं। कोविड-19 का सर्वव्यापी बंद दुनिया भर में आर्थिक उदासी लाने वाला है। कोविड महामारी में सबसे धनी एक प्रतिशत पर समाज की मदद करने का उत्तरदायित्व आता है। इसलिए अगर दुनिया को एक और आर्थिक महामंदी से बचाना है, तो राजनीतिक आर्थिकी को सामाजिक आर्थिकी में ढलना होगा। यानी सबसे धनी एक प्रतिशत को जरूरतमंद गरीब जनता के लिए धन के ट्रस्टी की भूमिका निभानी होगी।

इस महाबंदी के कारण दुनिया को सामाजिक दूरी बनाने और खुद अलग रहने की कला सीखना होगी। अपने बंद घर में रहने के कारण खुद को जानने का मुश्किल मौका मिला है। हमें खुद के अंदर झांकने की सीख भी मिली है। हमें अपने परिवार के सदस्यों को समझने और उनकी आदतों को जानने का मौका मिला है। ऐसे मुश्किल समय में हमें सामाजिक दूरी से निकल कर अंतरात्मा की खोज में लगना होगा। पूरब और पश्चिम के  लोगों को सामाजिक दूरी को समझने में भावनात्मक दिक्कतें आई हैं।

जब वैश्विक महाबंदी की घोषणा हो रही थी, तब भी पश्चिम के लोग छुट्टियां मनाते और सार्वजनिक आयोजन करते देखे जा रहे थे। वहीं पूरब के लोग रोजी-रोटी छिनने से अपने परिवार और घर लौटने की मुश्किलें झेल रहे थे। मौतों का साया दुनिया में तेजी से फैल रहा है। दुनिया की तकनीक और आयुर्विज्ञान, दोनों कोविड के प्रकोप को पचा नहीं पा रहे।

यह संक्रमण मानवीय संकट ही है। मानवता जरूर इससे पार पाएगी। इस सब के बीच में हमें बहुत कुछ समझना होगा। सभ्य सामाजिक व्यवहार की जगह सत्ता का राजनीतिक व्यवहार नहीं ले सकता। मानवीयता की जगह पंथ-मजहब नहीं ले सकते। और अध्यात्म की जगह आधुनिकता नहीं ले सकती है। जो सभ्यता प्रकृति को नाकुछ समझती है, वह अपना अस्तित्व ही खो देती है। अपनी समरसता में, वैज्ञानिक विवेक से और मानवीय आस्था से हम कोविड-19 से निजात पाएंगे। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed