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कोरोना संकट: धुंध में घिरी विश्व संस्थाएं
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कोरोना वायरस
- फोटो : PTI
शेक्सपियर के नाटक द टेंपेस्ट की व्याख्या करते हुए बार्ड ने लिखा था कि अतीत भूमिका है। वास्तविक जीवन में, जैसा कि शेक्सपियर ने लिखा है, विचार मुक्त होते हैं, जबकि भूल-चूक के लिए कीमत चुकानी पड़ती है। सितंबर, 2019 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 'ए वर्ल्ड एट रिस्क' नाम की अपनी रिपोर्ट में 'एक्स' नाम की बीमारी के बारे में चेतावनी देते हुए लिखा, 'यह दुनिया तेजी से फैलने वाली, घातक महामारी के लिए तैयार नहीं है।'
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वर्ष 1918 के स्पैनिश फ्लू के आतंक को याद कराते हुए उसने चेताया कि वैसी ही एक महामारी से दुनिया भर में पांच से आठ करोड़ मौतें हो सकती हैं। लेकिन जैसा कि बाद में मालूम चला, पूर्व चेतावनी के अनुरूप पहले से कोई तैयारी नहीं थी।
नवंबर, 2019 में वुहान और इस दुनिया में एक अज्ञात बीमारी के चर्चे थे। लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया। 31 दिसंबर, 2019 को चीन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को सूचित किया कि उसके 41 नागरिक निमोनिया से पीड़ित हैं, हालांकि
निमोनिया का कारण अज्ञात है। चीन के एक इलाके में संक्रमण फैल गया था, इसके बावजूद विगत 14 जनवरी को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा कि 'शुरुआती जांच में कोविड-19 के मनुष्य से मनुष्य में संक्रमण का कोई सुबूत नहीं मिला।' इसे महामारी भी उसने बहुत बाद में 11 मार्च को घोषित किया। ऐसा नहीं है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के पास इस संबंध में जानकारी नहीं थी।
ताइवान ने, जिसने इस वायरस के संक्रमण को फैलने से रोका, विश्व स्वास्थ्य संगठन को इस बारे में आगाह किया था। लेकिन इस शीर्ष संगठन पर चीन की राजनीतिक पकड़ इतनी ज्यादा थी कि ताइवान की चेतावनी की अनदेखी कर दी गई। इसी परिप्रेक्ष्य में जापान के उप-प्रधानमंत्री तारो आसो ने यह टिप्पणी भी की कि विश्व स्वास्थ्य संगठन को अब चीनी स्वास्थ्य संगठन कहा जाता है।
इस विफलता का नतीजा कई स्तरों पर सामने आया। दुनिया भर में करीब 17 लाख लोग इस वायरस से संक्रमित हो चुके हैं, जबकि मारे गए लोगों की संख्या 1,10,000 से ज्यादा है। विश्व के दो तिहाई हिस्से में लॉकडाउन है। दुनिया भर में बचत और राजस्व के रूप में जमा खरबों डॉलर स्वाहा हो चुके हैं। वैश्विक जीडीपी में रोज कमी आ रही है, लाखों लोग अपना रोजगार खो चुके हैं और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने बताया है कि 90 देश उससे मदद मांग रहे हैं।
पिछले सप्ताह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विश्व स्वास्थ्य संगठन की फंडिंग रोक दी। बिना किसी पक्षपात के यह कहा जा सकता है कि जब इस महामारी का इतिहास लिखा जाएगा, तब विश्व स्वास्थ्य संगठन के रवैये की आलोचना ही होगी।
विश्व स्वास्थ्य संगठन विफल होने वाली अकेली विश्व संस्था नहीं है। संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ), अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के साथ भी ऐसा ही है। संयुक्त राष्ट्र की प्रस्तावना में कहा गया है कि इसका लक्ष्य 'पीढ़ियों को युद्ध की तबाही से बचाना' और 'बुनियादी मानवाधिकारों के प्रति भरोसा बहाल करना' है।
सीरिया में गृहयुद्ध छिड़े हुए नौ साल हो गए हैं और समुद्र किनारे की रेत पर मरे पड़े अयलान कुर्दी की तस्वीर से दुनिया को स्तब्ध हुए पांच साल हो गए हैं। इसके बावजूद सीरिया में शरणार्थी समस्या जस की तस है। विश्व व्यापार संगठन का गठन वैश्विक स्तर पर 'व्यापार के सुचारु क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए' किया गया था, ताकि रोजगार को गति मिले, संसाधनों का अधिक से अधिक उपयोग हो और टिकाऊ विकास की गारंटी हो।
1977 में दोहा चरण की वार्ता से ही डब्ल्यूटीओ में सहमति का अभाव था, और कैनकुन सम्मेलन में इस संगठन को मृत घोषित कर दिया गया! विश्व स्वास्थ्य संगठन का संविधान इस विश्व संस्था को महामारी और दूसरी बीमारियों को निर्मूल करने की दिशा में काम करने तथा वैश्विक स्वास्थ्य के मामले में दिशा-निर्देश देने वाले तथा तालमेल बनाने वाले प्राधिकार के तौर पर काम करने का अधिकार देता है। लेकिन वुहान के खुलासे के 100 दिन बाद, जब दुनिया इस महामारी से जूझ रही है, इसकी जांच और इसके इलाज के बारे में विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से कोई दिशा-निर्देश नहीं है।
सिर्फ इन संस्थाओं के नौकरशाही के ढांचे और महाशक्तियों के उखाड़-पछाड़ को दोष देना गलत होगा। दरअसल इनमें नैतिक अनिवार्यताओं का अभाव है, जो इनके गठन के बाद से अब तक बरकरार है। इसके अलावा परिचालन के ढांचे, निर्वाचित और चुने गए नेतृत्व, भू-राजनीतिक चुनावों का लाभ उठाने वाले जैसे कारक भी जिम्मेदार हैं, जो वोटों की सनक के आगे बेबस हैं। ताकत और पद पा लेने का कौशल किसी भी तरह के बदलाव को रोकता है। और यह इन संस्थाओं की डिजाइनिंग में ही निहित है।
सुरक्षा परिषद में कुछ देशों को मिले वीटो पावर के अन्यायपूर्ण ढांचे के कारण संयुक्त राष्ट्र की प्रस्तावना सिर्फ शब्दों तक सीमित है। प्रतिभा और पेशेवर योग्यता नहीं, देने और लेने की राजनीति निर्धारित करती है कि शीर्ष पद पर कौन चुना जाएगा। संदेह और षड्यंत्र के सिद्धांत के आधार पर निर्णय लिए और न लिए जाते हैं, जैसा कि वुहान में वायरस के मामले में हमने देखा। मुद्दे हमें पता हैं। स्थिति को सुधारने के बारे में अनेक बार बहसें हुई हैं और इस संबंध में पर्याप्त तथ्य भी उपलब्ध हैं।
यह बहुराष्ट्रीय संगठनों के ढांचों को नए तरीके से डिजाइन करने का समय है, ताकि वे नई सहस्राब्दी के अनुरूप हों। फिर संयुक्त राष्ट्र की 75 वीं वर्षगांठ का अवसर भी निकट है। दुनिया भर में गंभीर मानवीय स्थिति को बदलने के लिए वैश्विक स्तर पर जो घोषणाएं और प्रतिबद्धताएं की गई हैं, वह राजनीतिक सुविधानुसार संभव नहीं है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)