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कोरोना : समन्वय ही समाधान
Tue, 31 Mar 2020 04:12 AM IST
योगेश साहू
संपादकीय
संपादकीय
Published by: योगेश साहू
Updated Tue, 31 Mar 2020 04:12 AM IST
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कोरोनावायरस: पलायन
- फोटो : PTI
सरकार की ओर से सोमवार को बताया गया कि बीते चौबीस घंटे में देश में कोरोना वायरस से संक्रमित सिर्फ 92 नए मामले आए हैं और चार मौतें हुईं, वहीं कोरोना से संक्रमित मामलों की संख्या का आंकड़ा एक हजार पहुंचने में 12 दिन लगे हैं।
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ऐसे समय जब पूरी दुनिया में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों का आंकड़ा सात लाख को पार कर चुका है और इससे मरने वालों की संख्या पैंतीस हजार के करीब है, भारत में स्थिति को काफी हद तक नियंत्रित कहा जा सकता है।
ऐसे में बेहद सतर्क रहने की जरूरत है, मगर पिछले कुछ दिनों के दौरान राज्यों की सीमाओं के पास जिस तरह से अपने गांव लौटने वाले प्रवासी मजदूरों का जमावड़ा हो गया, उसने नई चुनौती पेश की है। सबसे विकट स्थिति दिल्ली और उत्तर प्रदेश की सीमा पर हो गई थी, जहां दोनों राज्यों की सरकारों के बीच समन्वय का अभाव दिखा।
हालत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सर्वोच्च अदालत ने प्रवासी मजदूरों से संबंधित एक याचिका पर सोमवार को सुनवाई करते हुए टिप्पणी की, 'भय और आतंक वायरस से भी खतरनाक हैं।' अलबत्ता सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार द्वारा अब तक उठाए गए कदमों पर संतोष जताया है।
जब प्रधानमंत्री ने इक्कीस दिन के लॉकडाउन की घोषणा की थी, उसके बाद राज्य सरकारों को भी मुस्तैद हो जाना चाहिए था। वजह चाहे जो भी हो, प्रवासी मजदूरों के एक साथ इस तरह सड़कों पर निकलने से संक्रमण का ऐसा जोखिम पैदा हो गया, जो खुद उनके लिए भी घातक है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सारी राज्य सरकारों को अपनी सीमाएं सील करने के निर्देश दिए हैं, ताकि कड़ाई से लॉकडाउन पर अमल हो सके। दरअसल अब खासतौर से दो मोर्चे पर विशेष रूप से ध्यान देने की जरूरत है। पहला प्रवासी मजदूर अब जहां भी हैं, वहीं उनके लिए भोजन और आश्रय के इंतजाम किए जाएं।
जरूरत पड़ने पर सरकारी स्कूलों, सामुदायिक भवनों, यहां तक कि निजी क्षेत्र की बड़ी इमारतों को भी अस्थायी आवास में बदला जा सकता है। दूसरा यह कि अपने राज्य या गांव तक बड़ी संख्या में पहुंच चुके प्रवासी मजदूरों को अनिवार्य रूप से 14 दिन के क्वारंटीन में रखा जाए और उनकी जांच करवाई जाए।
अभी सारे संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने की जरूरत है, फिर वे सरकारी क्षेत्र के हों या निजी क्षेत्र के। मानवता पर छाया यह ऐसा संकट है, जिससे सबको मिलकर ही लड़ना होगा।