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अब क्या सही किया जा सकता है

Sun, 17 May 2020 05:25 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 17 May 2020 05:25 AM IST
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Coronavirus Case News In Hindi : What can be done right now
पटना में अपने घरों को जाने के लिए बस में सवार होते प्रवासी मजदूर। - फोटो : PTI

कोविड-19 के कारण दुनिया भर में स्कूल और कॉलेजों के लाखों विद्यार्थी जूम के जरिये क्लास में शामिल हो रहे हैं। हालांकि इस तरह की दूरस्थ शिक्षा सिर्फ युवाओं के लिए नहीं है। यह हम जैसे प्रौढ़ लोगों के लिए भी काफी उपयोगी हो सकती है। इसीलिए, इस हफ्ते की शुरुआत में मैंने खुद को देश के शीर्ष जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों की दो घंटे की क्लास के लिए पंजीबद्ध किया, जिसने मुझे वर्तमान महामारी के बारे में कहीं अधिक गहरी और गहन समझ दी, जो प्राइम टाइम टीवी शो से कभी नहीं मिल सकती।


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पैनल में दो पूर्व नौकरशाह थे, जिन्होंने अनेक वर्षों तक स्वास्थ्य क्षेत्र में सेवाएं दी थीं, सामुदायिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों में बदल चुके दो डॉक्टर थे और दो अन्य, यूनिवर्सिटी प्रोफेसर बन चुके डॉक्टर थे। इन छह विशेषज्ञों में एक चीज समान थी; ये सभी भारत में ही रहते हैं और यहीं काम करते हैं, पेशेवर सहयोगी इन सबका बहुत सम्मान करते हैं और मोदी सरकार ने इनमें से किसी से भी कभी सलाह नहीं ली। (इस कॉलम की सबसे विनम्र उम्मीद यही है कि यह स्थिति बदल सकती है)।

इन विशेषज्ञों को सुनते हुए मैंने काफी नोट्स लिए और मैंने जो कुछ सीखा उसे यहां संक्षेप में प्रस्तुत कर रहा हूं। यह स्पष्ट दिखता है कि शुरुआती लॉकडाउन ने जहां बीमारी को फैलने से नियंत्रित किया, सरकार ने इस समय का उपयोग जांच में तेजी लाने, संभावित और उभरते हॉटस्पॉट की ठीक से शिनाख्त करने या फिर लोगों को वास्तविक और विश्वसनीय सूचना देने के लिए नहीं किया।

लॉकडाउन के सामाजिक और आर्थिक पहलुओं की व्यापक रूप से आलोचना की गई। केंद्र सरकार ने अपने अप्रत्याशित कदम से अचानक नागरिकों को नौकरियों और आजीविका से वंचित कर दिया। सिर्फ चार घंटे के नोटिस के कारण लाखों श्रमिक अपने घरों से बहुत दूर बिना भोजन, आश्रय या नकदी के फंस गए। जन स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से पहला लॉकडाउन तो बुरी तरह से अनियोजित था।

मार्च के मध्य में, अपने गांव लौटने के इच्छुक कुछ श्रमिक ही संक्रमित थे। यदि इन नागरिकों को घर जाने के लिए समय दिया जाता, तो वे सुरक्षित तरीके से अपने गांवों में फिर से प्रवेश कर सकते थे। छह हफ्ते बाद जब सरकार ने प्रवासियों के लिए ट्रेनों की व्यवस्था कर देर से सुधार करना चाहा, तब वापसी करने वाले हजारों लोग खतरनाक वायरस के वाहक बन गए हैं। केंद्र अब राज्यों पर जिम्मेदारियां डालने की कोशिश कर रहा है, लेकिन निर्विवाद रूप से देश में विभाजन के बाद की इस मानव निर्मित महानतम त्रासदी की जिम्मेदारी अंततः प्रधानमंत्री की है।

लॉकडाउन की कल्पना और उस पर जिस तरह से अमल हुआ उसमें एक स्पष्ट वर्ग भेद था। नतीजतन पहले से व्यापक रूप से व्याप्त सामाजिक असमानताएं और गहरा गईं। नौकरियों और आय के नुकसान ने लाखों कामकाजी भारतीयों को अभावग्रस्तता की कगार पर ला दिया। अब उनके पास न केवल खाने के लिए कम भोजन होगा, बल्कि उसकी गुणवत्ता भी खराब होगी, जिससे वे न सिर्फ कोविड-19 बल्कि विभिन्न तरह के रोगों को लेकर कहीं अधिक असुरक्षित होंगे। महामारी के संदर्भ में मोदी सरकार ने अनेक चीजें गलत की हैं।

उनकी गलतियों के कारण ज्यादा तबाही हुई। हमारी अर्थव्यवस्था सुस्त है, हमारे सामाजिक ताने-बाने में तनाव है, हमारी स्वास्थ्य प्रणाली पर जरूरत से अधिक दबाव है। इसके बावजूद अब भी कुछ ऐसी चीजें हैं, जिन्हें मोदी सरकार सही कर सकती है। इस संदर्भ में, जिन विशेषज्ञों को मैंने सुना उनके पास पांच बड़े सुझाव हैं।

पहला, आत्मसंतोष का कोई मतलब नहीं होना चाहिए। अभी तक वायरस देहात में नहीं फैला है। असम, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कम मामले हैं। लेकिन आने वाले महीनों में यह स्थिति बदल सकती है, और इन राज्यों में मामले बढ़ेंगे, तो उनकी स्वास्थ्य प्रणाली की भंगुरता उजागर हो जाएगी।

दूसरा, सरकार को आईसीएमआर के दायरे से बाहर काम कर रहे हमारे शीर्ष महामारी विशेषज्ञों को साथ लेना चाहिए। हाल ही में जिन विशेषज्ञों ने हमें एचआईवी, एच1एन1 वायरस और पोलियो से प्रभावी तरीके से निजात पाने में मदद की है, उनसे कोई संपर्क नहीं किया गया है। इस ताजा महामारी से निपटने के लिए उपयुक्त नीतियां तैयार करने में उनका ज्ञान महत्वपूर्ण हो सकता है। ऐसा अब भी किया जा सकता है।

तीसरा, महामारी सिर्फ एक बायोमेडिकल मुद्दा नहीं है, बल्कि एक सामाजिक मुद्दा भी है। इस बात के संकेत मिल चुके हैं कि कोविड-19 शराबखोरी, घरेलू हिंसा, हताशा और आत्महत्या में वृद्धि का कारण बनी है। इनके साथ ही, मौत और बीमारी, गरीबी और बेरोजगारी, भी महामारी का अनिवार्य परिणाम हैं। इसलिए न सिर्फ जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ, अर्थशास्त्री, बल्कि अपने विषय के विशेषत्र समाजविज्ञानियों और मनोविज्ञानियों से भी सरकार को मशविरा करना चाहिए।

चौथा, मोदी सरकार को प्रशासन के अपने मौजूदा 'कंट्रोल ऐंड कमांड'(नियंत्रण और निर्देश) मॉडल के बारे में फिर से विचार करना चाहिए। केंद्र अभी राज्यों का जितना सम्मान कर रहा है, उससे और अधिक सम्मान करना सीखना चाहिए। राज्यों का जो फंड बकाया है, उसे तेजी से जारी करना चाहिए और अतिरिक्त फंड भी आवंटित करना चाहिए, क्योंकि महामारी को नियंत्रित करने की लड़ाई में अग्रिम मोर्चे पर राज्य ही हैं। हमें केंद्र से राज्यों, और राज्य की राजधानियों से पंचायतों और नगरपालिकाओं तक शासन का कहीं अधिक विकेंद्रीकरण चाहिए।

भीलवाड़ा या केरल जैसे राज्यों में अब तक मिली सफलता नीचे से ऊपर की ओर देखने के दृष्टिकोण और सशक्त स्थानीय नेतृत्व का नतीजा है। दुर्भाग्य से इस रास्ते का अनुसरण करने के बजाय मोदी सरकार द्वेषपूर्ण तरीके से महामारी का दुरुपयोग शक्तियों के और केंद्रीकरण में कर रही है। प्रधानमंत्री की इसे खुद पर केंद्रित कर व्यक्तिगत प्रदर्शन बनाने की प्रवृत्ति अपने आप में समस्यापूर्ण है; और इसके साथ गृह मंत्री के दंडात्मक तरीके हैं। जब एक प्रबुद्ध पैनलिस्ट से पूछा गया कि आने वाले दिनों और हफ्तों में सरकार को क्या करना चाहिए, तो उनका सरल-सा जवाब थाः 'कोविड संबंधी मसलों और निर्णयों से गृह मंत्रालय को पूरी तरह से अलग रखा जाए।'

पांचवां, महामारी से निपटने के लिए हमें एक दूसरे से एकजुटता दिखाने वाली भावना विकसित करने की जरूरत है। मोदी सरकार ने सत्ता में रहते हुए छह वर्षों में गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के प्रति अत्यंत शत्रुतापूर्ण और अविश्वासपूर्ण व्यवहार किया है। महामारी शायद उनकी आंखें खोले कि हताशा को कम करने में यह क्षेत्र व्यापक भूमिका निभा सकता है। चाहे बेबसी की ओर धकेल दिए गए लोगों के लिए सामुदायिक रसोई हो, चिकित्सा संबंधी मामलों में सलाह हो या फिर उन्हें आश्रय देना और काउंसलिंग करना हो, सिविल सोसाइटी संगठनों ने हाल के हफ्तों में शानदार काम किए हैं।

जब हम भविष्य की ओर देखते हैं, तो हम इस तथ्य के आधार पर उम्मीद कर सकते हैं कि यूरोप और उत्तरी अमेरिका की तुलना में हमारी आबादी कुछ युवा है। भारत में महामारी शायद (भाग्य से)  कम लोगों की जान ले। इसीलिए कहा जा रहा है कि एक बार इसके गुजर जाने के बाद, हमें हमारी अर्थव्यवस्था, हमारे समाज, और हमारी स्वास्थ्य प्रणाली को कहीं अधिक सुरक्षा और सावधानी के साथ पुनर्गठित करने की जरूरत होगी। यदि यह पुनर्गठन होना है, तो केंद्र सरकार के तरीकों में भी नाटकीय बदलाव जरूरी होगा।

उसे राज्यों को और अधिक स्वायत्तता (इसके साथ ही धन भी) देना सीखना होगा। उसे स्वतंत्र विचारों और सिविल सोसाइटी संगठनों को हर समय दबाने के बजाय उन्हें फलने देना चाहिए। लेकिन प्रधानमंत्री के तरीकों में भी मौलिक बदलाव आना चाहिए। उन्हें ध्यान से सुनने और अधिक व्यापक रूप से सलाह लेने की जरूरत है। उन्हें ऐसे एकतरफा निर्णय नहीं लेने चाहिए, जिनके परिणामों के बारे में उन्होंने अनुमान न लगाया हो। जैसा कि पैनल डिस्कशन ने दिखाया, देश में बड़ी संख्या में वैज्ञानिक और प्रशासनिक विशेषज्ञ हैं, जिन्हें कोविड के बाद की दुनिया का सामना करने के लिए प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार सलाह के लिए बुला सकती है। वे इतने बड़े दिल वाले और खुले दिमाग वाले हैं या नहीं, बेशक, यह एक अलग मुद्दा है।

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