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महामारी के बाद की चिंता

Mon, 04 May 2020 01:57 AM IST
K C Tyagi के. सी. त्यागी
Updated Mon, 04 May 2020 01:57 AM IST
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Coronavirus Case News In Hindi : Post-pandemic concern
जम्मू में लॉकडाउन के दौरान लोगों ने सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया। - फोटो : PTI

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने स्वीकार किया है कि कोरोना के सर्वव्यापक असर के कारण पूरा विश्व समुदाय अब इस निष्कर्ष पर पहुच गया है कि यदि दुनिया के किसी भी भाग में लोगों के स्वास्थ्य पर संकट आता है, तो उसकी चपेट में पूरा विश्व आ सकता है। श्री कोविंद का यह वक्तव्य महत्वपूर्ण है कि इस वैश्विक महामारी के बाद हम आर्थिक वैश्वीकरण से स्वास्थ्य वैश्वीकरण की दिशा में अग्रसर होंगे।


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उन्होंने 1918 में आए स्पैनिश फ्लू का उदाहरण देकर कहा कि करोड़ों जानें गंवाकर भी हमने सबक नहीं सीखा। याद रहे, उस महामारी में लगभग छह लाख भारतीयों की मृत्यु हुई थी। कोरोना वायरस के देशव्यापी फैलाव एवं संक्रमण से हो रही मौतों की संख्या में बढ़ोतरी ने मौलिक समस्याओं की जड़ में जाने को विवश कर दिया है। नित नए संक्रमण और इसके फैलाव को रोकने के लिए बीमारी की जड़ में भी जाने की आवश्यकता है।

सच्चाई यह है कि अर्थव्यवस्था में आई तेजी (वर्तमान समय को अगर छोड़ दें) और सात दशक की आजादी के बाद भी स्थिति संतोषजनक नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का आकलन है कि भारत की दो तिहाई आबादी को अब भी घर में नल का पानी उपलब्ध नहीं है और शौचालय की स्वच्छता का स्तर भी संतोषजनक नहीं है। देश की लगभग एक तिहाई आबादी कुपोषण की शिकार है। प्रतिवर्ष 15 लाख शिशु पांच वर्ष की आयु में प्रवेश करने से पहले ही दुनिया छोड़ देते हैं। देश में करोड़ों लोग संक्रामक रोगों से ग्रसित होते हैं, जिनमें टीबी, मलेरिया, चमकी बुखार, जापानी बुखार, डेंगू आदि शामिल हैं।

जन स्वास्थ्य सेवाओं में बुनियादी बदलावों को ध्यान में रखकर समय-समय पर सरकारों द्वारा लगभग दो दर्जन विशेषज्ञ कमेटियां गठित भी हो चुकी है, जिनमें मुदालियर कमेटी, चड्ढा कमेटी, मुखर्जी कमेटी, कजार सिंह कमीशन, श्रीवास्तव कमेटी आदि शामिल हैं। जन स्वास्थ्य को लेकर एक ओर जहां आवंटित राशि निरंतर बढ़ती रहती है, वहीं मेडिकल सेवाओं में उच्च पदों पर कार्यरत लोगों की तनख्वाह में भी बढ़ोतरी होती रही है। वर्ष 1975 में अपने यहां जीडीपी का 0.98 प्रतिशत ही स्वास्थ्य सेवाओं को आवंटित था, जो उदारीकरण के 30 वर्ष बाद भी मात्र 15 प्रतिशत ही है।

तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद भारत में स्वास्थ्य के मोर्चे पर स्थिति संतोषजनक नहीं है। पिछले छह साल में प्रधानमंत्री ने स्वास्थ्य योजना से लेकर कई महत्वाकांक्षी कदम उठाए हैं। इसके बावजूद देश में 1,000 मरीजों पर आठ डॉक्टर ही उपलब्ध हैं। जबकि इटली में, जो संक्रमित देशों की तालिका में दूसरे स्थान पर है, इसका अनुपात 4:1 है। संकट की इस घड़ी में देश में 45,000 वेंटिलेटर ही हैं, जबकि गंभीर रोगियों के लिए इसकी आवश्यकता होती है। सरकारी अस्पतालों में 7,13,986 बेड ही उपलब्ध हैं और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक केंद्रों की भारी कमी है।

दुनिया भर के रोगियों की 27 प्रतिशत आबादी भारत में रहती है। देश में रोज औसतन 1,090 मौतें तो टीबी से ही हो जाती हंै। यही नहीं, टीबी संक्रमित रोगियों में 95 प्रतिशत से अधिक आबादी गरीबों की है। सरकार द्वारा आयुष्मान भारत कार्यक्रम की शुरुआत की जा चुकी है। इसके अलावा राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण मिशन के तहत 10 करोड़ से अधिक गरीब लोगों और कमजोर परिवारों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित करने का लक्ष्य है। लेकिन देश में 130 करोड़ की आबादी में मात्र 26,000 अस्पताल हैं, यानी 47,000 लोगों पर एक सरकारी अस्पताल। इतनी बड़ी आबादी के लिए मात्र सात लाख बिस्तर हैं। अस्पतालों में औसतन 10,000 लोगों पर एक ही डॉक्टर उपलब्ध है।

ब्रिटेन और कनाडा जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों में मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हैं। तुर्की, आयरलैंड, चीन आदि देशों में स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिकता दी जाती है। इस मामले में भारत का स्तर बांग्लादेश, नेपाल, माले और श्रीलंका की सेवाओं के आसपास है।

कोविड-19 ने गरीब और अमीर देशों का भेद मिटा दिया है। अमेरिका और यूरोप अपने अन्वेषण और संसाधनों के कारण समूचे विश्व में सिरमौर बने थे। लेकिन एक ही झटके में उनके सभी प्रयोग धराशायी हो गए। सर्वशक्तिमान अमेरिका में वर्ष 2008 जैसी मंदी के आसार हैं, जब दुनिया के सबसे बड़े बैंक लेहमान ब्रदर्स ने स्वयं को दिवालिया घोषित कर दिया था।

इस बीच निजी चिकित्सालयों ने काफी निराश किया है, जिन्होंने प्रयोगशालाओं में जांच की राशि 4,500 रुपये प्रति मरीज तय की है। इस राशि को समाप्त करने की जोरदार मांग की गई है, एवं निजी अस्पतालों की मनमानी को लेकर एक याचिका भी सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है, जिसमें देश की सभी स्वास्थ्य सेवाओं का सरकारीकरण करने की मांग की गई है।

इस दौरान देश भर के वे 14 लाख आंगनबाड़ी केंद्र भी बंद हैं, जिनसे लाभान्वित होने वाले छह साल से कम उम्र के करीब 8.2 करोड़ बच्चे तथा लगभग दो करोड़ गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाएं भी हैं। राष्ट्रपति कोविंद के विचारों को जमीन पर उतारने हेतु स्वास्थ्य क्षेत्र में बुनियादी ढांचे को मजबूत करना आवश्यक है। इसमें ग्रामीण क्षेत्रों को विशेष प्रोत्साहन भी अपेक्षित है। आज छोटा-सा मुल्क क्यूबा पूरी दुनिया के सामने एक मिसाल बनकर उभरा है।

चीन, अमेरिका एवं यूरोप के कई देश इस देश की सेवाएं हासिल कर रहे हैं। यह छोटा-सा देश आज लगभग 70 देशों को अपनी स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर रहा है। उल्लेखनीय है कि क्यूबा में कोई निजी अस्पताल नहीं है, और प्रति एक हजार आबादी पर नौ डॉक्टर हैं। आशा है, संक्रमण के बाद जब हालात सामान्य होंगे, तब सारे जरूरी कामों को विराम देकर देश में स्वास्थ्य का लाभ प्रदान करने की दिशा में आधुनिक ढांचा तैयार करने में हम कामयाब होंगे। (-लेखक जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।)

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