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मन पर लगे ताले खुद ही खोलने होंगे

Mon, 13 Apr 2020 12:07 AM IST
Manu Parekh मनु पारेख
Updated Mon, 13 Apr 2020 12:07 AM IST
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Coronavirus case News in Hindi : Mind locks must be opened by themselves
लॉकडाउन - फोटो : PTI

मैं घर से ही काम करता हूं, इसलिए लॉकडाउन से मेरी जिंदगी पर ताला नहीं लगा। हां, इतना जरूर है कि गाहे-बगाहे इधर-उधर निकलना बंद हो गया है। मैं अपनी दिनचर्या में बेहद अनुशासित रहा हूं, इसलिए मुझे लॉकडाउन से कोई विशेष परेशानी नहीं हो रही। लेकिन परिवार और आसपास के लोगों की चिंता होती है।


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प्रियजनों का हालचाल जानने की चाह उठती रहती है। गरीब और पाई-पाई जोड़कर अपने लिए दो वक्त की रोटी कमाने वालों का ख्याल गाहे-बगाहे परेशान करता है। इस मसले का हल हम कैसे निकाल सकेंगे, कैसे उन गरीब लोगों का पेट भर सकेंगे, इसके बारे में भी सोचने की जरूरत है। चिंताएं और भी हैं।

ये लॉकडाउन कब तक चलेगा, कैसे कोरोना पर जीत हासिल होगी, इस तरह के सवाल हर आदमी की आंखों में देखे जा सकते हैं। लेकिन यह समय हिम्मत हारने या हताश होकर बैठने का नहीं है। मुझे नहीं लगता कि किसी पेंटर के मन में लॉकडाउन की कोई तात्कालिक और कलात्मक प्रतिक्रिया होगी।

अगर तुरंत रिएक्शन आने लग जाए, तो पेंटिंग और कार्टून चित्र में अंतर क्या रह जाएगा! आर्टिस्ट तो जीवन की वास्तविकताओं का चित्रण करता है। अगर वह इस तरह के झंझावतों से विचलित हो जाएगा तो इसका असर उसकी कलाकृति पर भी महसूस किया जाएगा। 

विपरीत मानसिक और भौतिक दशाओं के गर्भ से नई वास्तविकताओं का जन्म होता है। मैं थियेटर से भी जुड़ा रहा हूं। एक अभिनेता के रूप में यदि मुझे एक नाटक में राजा की भूमिका करने को कहा जाएगा, तो मैं वह भी करूंगा और नौकर की भूमिका मिलेगी, तो वह भी। एक कलाकार के रूप में मेरे लिए दोनों भूमिकाएं महत्वपूर्ण होंगी और उन्हें ठीक से निभाना मेरा उत्तरदायित्व।

ऐसा ही मामला पेंटिंग का है। एक पेंटर के रूप में अपनी हर कृति के लिए मुझे नया विषय चुनना होता है। वर्तमान सूरते हाल में मेरा यही दायित्व है। कोरोना का भय चाहे जितना डरावना हो, सबसे सुखद स्थिति है कि आप परिवार के साथ हैं।

एक-दूसरे को जान समझ रहे हैं, बच्चों को समय दे रहे हैं। लेकिन जब मैं इस तरह की बातें सोचता हूं, तो अनायास उन गरीब लोगों का चहेरा आंखों के सामने घूमने लगता है, जिनके पास कोई काम नहीं, खाने को रोटी नहीं, सिर ढकने को छत नहीं। सोशल डिस्टेंसिंग का उनके लिए कोई मतलब नहीं, जिनके पेट खाली हैं।

हिदायतों की बातें उनकी मजबूरियों के आगे बहुत ओछी और सस्ती लगती हैं। अक्सर मेरे मन में इस तरह के ख्याल घुमड़ते हैं, लेकिन उनसे कोई मुकम्मल तस्वीर सामने नहीं आती। कोरोना को रोकने के प्रयासों का सम्मान करते हुए हम संवेदनशीलता और भाईचारे का संदेश तो दे ही सकते हैं।

मन की गाठें खोलिए और कुछ रचने की कोशिश कीजिए, सार्थक और सकारात्मक। दुनिया के कैनवस पर अपनी कूची से रंग भरने का इससे अच्छा मौका कब मिलेगा। मर्यादाएं आपके क्रिया-कलापों पर हैं, वहीं तक रहनी चाहिए। कला तो अपनी सीमाएं तोड़ने को हरदम आतुर रही है।

वह अपनी अभिव्यक्ति के लिए लॉकडाउन खुलने की मोहताज नहीं। यह ठिठकी हुई जरूर है, सहमी हुई नहीं। अब तो माध्यमों और कला सामग्रियों के प्रयोग को लेकर कलाकार अधिक स्वतंत्र हो गए हैं। ऐसा नहीं है कि आप कैनवस पर तैल रंगों से ही काम करें। एक बार कूचियों से कल्पनाओं में रंग भरकर देखिए तो सही। मन पर लगे ये ताले हमें ही खोलने होंगे। (लेखक मशहूर चित्रकार हैं।)

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