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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Coronavirus Case News In Hindi : Journey from loneliness to solitude

अकेलेपन से एकांत तक की यात्रा

Wed, 15 Apr 2020 07:38 AM IST
Charan Sharma चरण शर्मा
Updated Wed, 15 Apr 2020 07:38 AM IST
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Coronavirus Case News In Hindi : Journey from loneliness to solitude
- फोटो : PTI

हमसे कहां चूक हुई? सवाल पूरी दुनिया से है। ये शहरों का सन्नाटा है, जो हमें बता रहा है कि हमने अपने कैनवस पर सही संयोजन नहीं किया। सही रंगों की पहचान नहीं की। अब इस अकेलेपन में जिंदगी के बिखरे रंगों को समेटने का प्रयास जरूरी है और इस सवाल से मुठभेड़ भी जरूरी है कि आखिर ये सन्नाटा क्यों है?


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मैं एक चित्रकार हूं और इस सन्नाटे में अपनी रचनात्मकता को बचाना है। मैं एक पिता भी हूं और मुझे पिता की भूमिका भी निभानी है। दूर रहते हुए पड़ोसी की भूमिका में भी रहता हूं और इस संकट में पूरे विश्व के दर्द को साझा करते हुए मन के भीतर बैठा कवि भी बाहर आ जाता है। ऐसा पहली बार हो रहा है कि दरवाजे पर कोई दस्तक नहीं। और दस्तक हो तो डर लगता है। यह डर क्यूं है, अगर इसका जवाब जानने की कोशिश आज हमने नहीं की, तो बार-बार यह डर जिंदगी में आएगा।

चित्रकार होने के नाते मुझे स्टूडियो में जाना पड़ता था। मुझे बड़े आकार की पेंटिंग्स बनाने में दिलचस्पी है। लेकिन इस कठिन समय में घर में रहते हुए स्केचबुक से काम चला रहा हूं। शब्द भी दोस्त की तरह पन्नों पर आते हैं। कविताएं लिख रहा हूं। दुनिया से न कोई शिकवा और न ही कोई शिकायत। लॉकडाउन शुरु होने के दो दिन बाद मैंने लिखा था-चारों ओर एक सन्नाटा एक खामोशी/ और चिड़ियों की आवाज/ कभी-कभी एंबुलेंस की आवाज भी/ दोनों आवाजों में एक अजीब सा फर्क है/ फर्क होता है आवाजों को महसूस करने का।

मैं इन दिनों रोटी भी बनाता हूं। घर में रहकर जिंदगी ठहर नहीं जाती। घर में रहकर जिंदगी आगे बढ़ने के रास्ते ढूंढती है। मैं भी रास्ता ढूंढ रहा हूं। ये रास्ता मिलता है घरवालों की बातों में। ये रास्ता मिलता है यादों के सबसे पुराने बक्सों से। ये रास्ता मिलता है पुराने पत्रों में।

मुझे महान चित्रकार सूजा ने समय-समय पर ढेर सारे पत्र लिखे थे। उन पत्रों को फिर से पढ़ रहा हूं। अपनत्व की एक सौंधी गंध में डूबी उन चिट्ठियों में आने वाले कल का नक्शा मिल रहा है। आने वाला कल कैसा होगा, इसे महसूस करने के लिए हमें अपने अतीत को खंगालना ही पड़ता है। खंगाल रहा हूं और देख रहा हूं कि विश्व की गलती को कैसे दुरुस्त किया जाए।

यह हम सबकी जिम्मेदारी है। हम सब अपने घर में हैं, लेकिन हम सबको अपने-अपने दिलों के साथ रहना होगा, जिससे शायद हमें इस सवाल का जवाब मिल पाए कि विश्व समुदाय से जो चूक हुई, उसे कैसे दुरुस्त किया जाए। प्रकृति को प्रकृति बनाए रखने के लिए हमें बार-बार आइसोलेशन में जाने की जरूरत है। सदगुरू कहते हैं, दुनिया के हर शख्स को साल में दो सप्ताह आइसोलेशन में जाना चाहिए। यह प्रकृति पर उपकार होगा। अगर प्रकृति से वरदान चाहिए, तो ऐसा हमें करना ही चाहिए।

इस कठिन समय में हमें बुद्ध भी याद आते हैं। मैंने बुद्ध पर बहुत काम किया है। ढेर सारे चित्र बनाए। उनके मर्म को समझा। यहां तक कि मैं आर्य मौन साधना में भी गया था। आर्य मौन यानी शरीर, वाणी एवं मन का मौन। इस साधना में अन्य साधकों से संपर्क नहीं होता। इस साधना में मुझे मौन की ताकत का अहसास हुआ था।

भीड़ में भी आदमी अकेला कैसे हो सकता है, पहली बार जाना था। यह कठिन वक्त निश्चित रूप से बीत जाएगा। लेकिन इसके बाद हमारे सामने एक नई दुनिया होगी। उस नई दुनिया का सामना करने के लिए एक बार फिर मैं मौन को साधना के रूप में स्वीकार कर पा रहा हूं, तो उसके पीछे मेरी रचनात्मकता ही है... रचने की कोशिश करता हूं तो एकांत लगता है/ न रचता हूं तो अकेलापन लगता है। (लेखक मशहूर चित्रकार हैं।)

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