कोरोना काल: नौकरियों में महिलाओं की बढ़ती हिस्सेदारी
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कोरोना महामारी के कारण दुनिया हमेशा के लिए बदल गई। परंपरा और आधुनिकता के बीच उलझे देश में इस संक्रमण ने जहां कई चुनौतियां पेश की हैं, वहीं बहुत से अवसर भी आए हैं। समाज में तकनीक का दखल और उसकी स्वीकार्यता में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। 'वर्क फ्रॉम होम' जैसा एक नया शब्द हमारी बोलचाल का हिस्सा बना और जिंदगी की गाड़ी दौड़ाने में सहायक भी बना। कोरोना वायरस के प्रकोप के बाद, हर दस में से चार कंपनियों ने विशेष रूप से घर से कार्य करने की रणनीति अपनाकर अपने काम को जारी रखने की रणनीति अपनाई और यह रणनीति भारत के कॉरपोरेट सेक्टर में महिलाओं के लिए एक क्रांतिकारी बदलाव ला रही है। रिक्रूटमेंट, ‘करियर प्लेटफॉर्म जॉब्स फॉर हर’ शोध के अनुसार देश में मध्य प्रबंधन से लेकर वरिष्ठ स्तर तक महिलाओं को काम पर रखने की संख्या में वृद्धि हो रही है। 2019 में महिलाओं को काम पर रखने वाली कंपनियों की संख्या अट्ठारह प्रतिशत थी, जबकि 2021 में यह आंकड़ा तैंतालीस प्रतिशत हो गया। यह सर्वे मई, 2021 में तीन सौ कंपनियों पर किया गया।
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आंकड़े बताते हैं कि कोरोना वायरस महामारी काल में महिलाओं को काम पर रखने में भारी उछाल आया। एक ओर जहां महिलाओं को घर से काम करने की स्वीकार्यता मिल रही है, वहीं ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को काम पर रखने के लिए कॉरपोरेट सेक्टर मातृत्व अवकाश जैसी नीतियों को भी लेकर सामने आ रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, एक ओर घर से काम करने वाली नौकरियों की संख्या में वृद्धि हो रही है, वहीं दूसरी ओर ज्यादा महिलाएं भी अब नौकरियों के लिए आवेदन कर रही हैं। वर्क फ्रॉम होम की अवधारणा उन शादीशुदा महिलाओं के लिए भी एक नया अवसर लाई है, जो पढ़ी-लिखी होने के बाद भी शादी के बाद अपनी गृहस्थी को संवारने के लिए करिअर को तिलांजलि दे देती थीं। अब घर से ही काम करने के मौके मिलने पर वे आसानी से दोबारा कॉरपोरेट सेक्टर में काम पर लौट सकती हैं।
भारतीय परिवार में काम बांट लेने की परंपरा महिलाओं में हमेशा से रही है। शहरों में जब महिलाएं वर्क फ्रॉम होम की अपनी शिफ्ट निपटा रही होती हैं, तो घर के अन्य सदस्य बाकी के घरेलू काम निबटा लेते हैं। सामाजिक दबाव कहें या प्रगतिशीलता की हवा अब घर के पुरुष भी घर के कामों को करने में हीनता का अनुभव नहीं करते और पुरुषों के इस झुकाव के पीछे पिछले साल के लंबे लॉकडाउन की एक बड़ी भूमिका रही है। रिमोट / हाइब्रिड काम का मॉडल अब कॉरपोरेट सेक्टर की पसंद बनता जा रहा है। यह जहां कर्मचारियों को ज्यादा विकल्प देता है, वहीं काम करने का लचीलापन भी। चूंकि कामकाजी महिलाओं के ऊपर काम और घर की दोहरी जिम्मेदारी होती है, ऐसे में वर्क फर्म होम उन्हें घर से बाहर जाकर काम करने के मुकाबले दोनों में संतुलन बनाने में ज्यादा मदद करता है।
सांस्कृतिक तौर पर महिलाओं को काम करने से रोके जाने में एक बड़ी समस्या ‘घर से बाहर जाकर काम करना ठीक नहीं है’ वाली मानसिकता भी रही है। मगर तस्वीर उतनी भी सुहानी नहीं है, जितना आंकड़े बता रहे हैं। तथ्य यह भी है कि विश्व आर्थिक मंच की वैश्विक लैंगिक अंतराल रिपोर्ट, 2021 में दक्षिण एशियाई देशों में भारत का प्रदर्शन सबसे खराब रहा है। इस रैंकिंग में भारत 156 देशों में 140वें स्थान पर है, जिसमें भारत से आगे बांग्लादेश 65वें, नेपाल 106वें, श्रीलंका 116वें, पाकिस्तान 153वें, अफगानिस्तान 156वें, और भूटान 130वें स्थान पर है। पिछले साल भारत की रैंकिंग 112वीं थी।
जॉब्स फॉर हर की रिपोर्ट के अनुसार, कुल मिलाकर उद्योगों के कार्यबल में महिलाओं की औसत भागीदारी 2020 में चौंतीस प्रतिशत पर स्थिर रही। फिलहाल उपलब्ध रोजगार में वर्क फ्रॉम होम की प्रवृत्ति अधिक से अधिक महिलाओं को प्रबंधन और तकनीक के क्षेत्र वाली नौकरियों में प्रेरित करने के अलावा कंपनियों में सभी स्तरों पर लैंगिक समानता सुनिश्चित करेगी। पेशेवर सीढ़ी पर चढ़ने में सक्षम महिलाओं को देख अन्य महिलाओं को भी प्रोत्साहन मिलेगा। फिलहाल लैंगिक रूप से अभी महिलाओं को पुरुषों के बराबर मौका मिलने में देश को लंबा रास्ता तय करना है।