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कोविड राहत में शहरी भारत क्यों नहीं, रूपरेखा पर फिर से विचार करने की जरूरत

Fri, 18 Jun 2021 08:08 AM IST
Shankar Ayair शंकर अय्यर
Updated Fri, 18 Jun 2021 08:08 AM IST
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सार
कृषि क्षेत्र और ग्रामीण गरीबों के लिए एक और प्रोत्साहन पैकेज की बात की जा रही है, लेकिन शहरी गरीबों के लिए नहीं सोचा जा रहा। ऐसे में अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने और विकास को बनाए रखने के लिए कोविड राहत की रूपरेखा पर फिर से विचार करने की जरूरत है।
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Corona Pandemic another stimulus package is being talked for the agriculture sector and rural poor but not for urban poor
मुफ्त राशन वितरण (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

चुनावी अंकगणित भारत में आर्थिक नीति का एक प्रमुख चालक रहा है। राजनीतिक रूप से व्यावहारिक इस नजरिये ने शहरी भारत -विशेष रूप से निम्न से मध्यम आय वर्ग- को कमतर बना दिया है। यह तथ्य है कि जो शहरी भारत सकल घरेलू उत्पाद में आधे से अधिक का योगदान देता है, वह राजनीतिक वर्ग के लिए कम महत्व रखता है, क्योंकि ग्रामीण वोटों की कुल संख्या अधिक है। कोविड राहत कार्यक्रम तैयार करने में भी यह पूर्वाग्रह स्पष्ट दिखाई पड़ा है।



कृषि क्षेत्र और ग्रामीण गरीबों के लिए एक और प्रोत्साहन पैकेज की बात चल रही है। बेशक यह आवश्यक, स्वागत योग्य और प्रशंसनीय है, पर शहरी भारत के लिए इसी तरह की पहल का कोई संकेत नहीं है। ग्रामीण गरीबों के पास ग्रामीण रोजगार योजना मनरेगा है, लेकिन शहरी गरीबों की मदद के लिए कुछ नहीं है। शहरी भारत के लिए राहत पैकेज जरूरी मुद्दा है-खासकर रेस्तरां और दुकान जैसे अनौपचारिक क्षेत्र के छोटे व्यवसाय से जुड़े और स्वरोजगार करने वालों के लिए।


हर दिन शहरों के चौराहों पर सैकड़ों दिहाड़ी मजदूर एक दिन की आय की तलाश में खड़े रहते हैं। उनके परिवार को भयंकर दरिद्रता में जाने से रोकने के लिए हस्तक्षेप जरूरी है। ठीक है कि उन्हें मुफ्त राशन आवंटित किया गया है, लेकिन जीविका के लिए और ज्यादा करने की जरूरत है। शहरी गरीबों को पहचाना जा सकता है-राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम शहरी आबादी के 25 प्रतिशत को गरीब मानता है। कम से कम दो तिमाहियों के लिए चरणबद्ध ढंग से नकद हस्तांतरण पीड़ित और पस्त शहरी गरीबों के लिए मरहम का काम करेगा। यह सच है कि कुछ राज्य सरकारों ने योजनाएं शुरू की हैं। महाराष्ट्र में पंजीकृत स्ट्रीट वेंडरों के लिए 1,500 रुपये/रिक्शा चालकों के लिए 2,000 रुपये के नकद हस्तांतरण की व्यवस्था है; तमिलनाडु में बेरोजगारों के लिए मासिक सहायता योजना है; झारखंड व तेलंगाना ने बेरोजगारी भत्ते की घोषणा की है; और ओडिशा में रेहड़ी-पटरी वालों के लिए एक कार्यक्रम है।

पर ये कार्यक्रम पर्याप्त नहीं हैं। एक राष्ट्रीय संकट के लिए राष्ट्रीय प्रतिक्रिया की आवश्यकता होती है। सैकड़ों सूक्ष्म और मध्यम उद्यम अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आंशिक और चरणबद्ध संचालन से उनकी जीवन क्षमता प्रभावित होती है। बिजली के बिल या किराये के मोर्चे पर आर्थिक सहायता मिलने से उनका बोझ कम होगा। दुनिया में हर जगह वेतन सुरक्षा कार्यक्रमों काे अच्छा काम किया है। निर्माण का अर्थव्यवस्था पर सबसे बड़ा प्रभाव पड़ता है। ठेका एजेंसियों के माध्यम से ठेका श्रमिकों के लिए वेतन सुरक्षा कार्यक्रम उद्यमों और व्यक्तियों का अस्तित्व सुनिश्चित करेगा। ये उपाय उधारकर्ताओं को बुरे कर्ज की सूची से दूर रखेंगे और खपत व विकास को बढ़ावा देंगे। महामारी की दूसरी लहर ने असंख्य मध्यवर्गीय परिवारों को तबाह कर दिया-जीवन बचाने के लिए अनेक लोगों को गहने बेचने पड़े, अपनी जमा-पूंजी खर्च करनी पड़ी।

अर्थशास्त्री मुदित कपूर, शमिका रवि और एके शिव कुमार द्वारा हाल ही में किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि महामारी की पहली लहर की चोट जहां गरीब परिवारों पर सबसे ज्यादा पड़ी, वहीं दूसरी लहर ने मध्यवर्ग को बुरी तरह प्रभावित किया है। रोज कमाकर खाने वालों को तब तक अनिश्चित भविष्य का सामना करना पड़ेगा, जब तक महामारी बनी रहेगी। एसबीआई की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि महामारी ने श्रम बाजारों को निश्चित रूप से आघात पहुंचाया है। कर्मचारियों के खर्च में सबसे बड़ी गिरावट उन सबसे छोटी कंपनियों में आई है, जो बड़ी संख्या में नौकरियां देती हैं। ईपीएफओ के आंकड़ों से पता चलता है कि जिस अर्थव्यवस्था को आदर्श रूप से एक महीने में 10 लाख नौकरियां या सालाना 1.2 करोड़ नौकरियां पैदा करने की जरूरत है, उसने 12 महीनों में पहली बार सिर्फ 44 लाख नौकरियां पैदा कीं।

तीसरी लहर की आशंका, टीकाकरण की अपर्याप्तता और अर्थव्यवस्था की बदहाली से उम्मीदें बाधित हैं। हालांकि इस बार कोई राष्ट्रीय लॉकडाउन नहीं लगाया गया, पर तथ्य यह है कि हर प्रमुख शहरी केंद्र और देश का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा किसी न किसी तरह से लॉकडाउन की छाया में रहा है। केंद्र के पास और ज्यादा काम करने का अवसर है। जीवन बचाने की खातिर टीकों की खरीद के लिए राज्यों को आवंटित धनराशि को अब जीविका बचाने पर खर्च किया जा सकता है। अपने द्विमासिक नीति वक्तव्य में भारतीय रिजर्व बैंक ने रेखांकित किया है कि 'शहरी मांग पर सेंध ने नकारात्मक जोखिम पैदा किया है।' 13 प्रमुख शहरों में आरबीआई के उपभोक्ता विश्वास सर्वेक्षण (सामान्य आर्थिक स्थिति, रोजगार, समग्र मूल्य, स्वयं की आय और खर्च पर) ने एक गंभीर संदेश दिया। उपभोक्ता का विश्वास 'एक नए सर्वकालिक निम्न स्तर पर चला गया है।' इससे भी बुरी बात यह है कि फ्यूचर एक्सपेक्टेशंस इंडेक्स 'महामारी की शुरुआत के बाद से दूसरी बार निराशावादी क्षेत्र में चला गया।'

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय द्वारा जारी 'द स्टेट ऑफ वर्क इन इंडिया 2021' रिपोर्ट में संकट की व्यापक तस्वीर परिलक्षित होती है। यह बताती है कि 'महामारी के दौरान राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी सीमा से नीचे रहने वाले व्यक्तियों की संख्या में 23 करोड़ की वृद्धि हुई।' विशेष रूप से, रिपोर्ट बताती है कि जहां ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी दर में 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई, वहीं शहरी क्षेत्रों में यह दर 20 प्रतिशत से अधिक थी। सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि 75 लाख से अधिक परिवारों ने दैनिक जरूरतें पूरी करने के लिए ईपीएफ से निकासी की है। अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने और विकास को बनाए रखने की अनिवार्यता कोविड राहत की रूपरेखा पर फिर से विचार करने की मांग करती है।

अच्छे और बुरे समय में आर्थिक विकास इस मूलभूत सिद्धांत पर टिका होता है कि आय खपत को बढ़ावा देती है तथा निवेश और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए मांग को प्रोत्साहित करती है।

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