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कोरोना महामारी और अर्थव्यवस्था की मजबूती के अनुमान
Wed, 23 Jun 2021 04:17 AM IST
टी वी मोहनदास पाई
टीवी मोहनदास पई एवं निशा होला
टीवी मोहनदास पई एवं निशा होला
Published by: टी वी मोहनदास पाई
Updated Wed, 23 Jun 2021 04:17 AM IST
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अर्थव्यवस्था
- फोटो : pixabay
केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने हाल ही में वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) और आय के लिए अनंतिम अनुमान जारी किए। पिछले साल की जीडीपी संरचना और तिमाही रुझानों के आधार पर कोविड-19 के अर्थव्यवस्था पर पड़े प्रभाव का आकलन करना राष्ट्रहित में होगा। इसके अलावा, इस आंकड़े के विश्लेषण से वित्त वर्ष 2022 में विकास को गति देने के लिए अगले आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलेगी।
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महामारी के मद्देनजर, अधिकांश विश्लेषकों का आकलन था कि वित्त वर्ष 2021 की पहली तिमाही में पूर्ण और दूसरी तिमाही में आंशिक लॉकडाउन के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था वास्तविक अर्थों में आठ से दस फीसदी सिकुड़ जाएगी। हालांकि, जैसे-जैसे दूसरी तिमाही में विकास में तेजी आई, उनमें से कुछ विश्लेषकों ने संशोधित कर 7.5 फीसदी की गिरावट का अनुमान व्यक्त किया। अनंतिम अनुमान 7.3 फीसदी का संकुचन दिखाते हैं - वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद जहां वित्त वर्ष 2020 में 145.7 लाख करोड़ रुपये था, वह घटकर वित्त वर्ष 2021 में 135.1 लाख करोड़ रुपये हो गया। कुल (नॉमिनल) जीडीपी वित्त वर्ष 2020 के 203.5 लाख करोड़ रुपये से घटकर वित्त वर्ष 2021 में 197.5 लाख करोड़ रुपये हो गई, यानी तीन फीसदी का संकुचन हुआ। प्रति व्यक्ति कुल जीडीपी में चार फीसदी की गिरावट आई। कुल जीडीपी के संदर्भ में बजट का विश्लेषण करने से बेहतर संकेत मिलता है, क्योंकि यह उन कीमतों को दर्शाता है, जिन्हें लोग आज अनुभव करते हैं और उनके साथ लेन-देन करते हैं।
कुल जीडीपी का बारीक विश्लेषण तीन आवश्यक घटकों में परिवर्तन पर प्रकाश डालता है-
1- निजी अंतिम उपभोग व्यय (पीएफसीई) वर्ष 2020 के 123 लाख करोड़ रुपये से (जीडीपी का 60.5 फीसदी) घटकर वित्त वर्ष 2020-21 में 116 लाख करोड़ रु. (जीडीपी का 58.6 फीसदी) रह गया। वित्त वर्ष 2021 में लॉकडाउन के कारण खपत कम होने से पीएफसीई में 7.4 लाख करोड़ रुपये की गिरावट आई है। यह गिरावट
महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था में वृद्धि आंतरिक खपत पर बहुत अधिक निर्भर करती है।
2- सरकार का अंतिम उपभोग व्यय (जीएफसीई) वित्त वर्ष 2020 के 22.9 लाख करोड़ रुपये (जीडीपी का 11.2 फीसदी) से बढ़कर वित्त वर्ष 2021 में 24.7 लाख करोड़ रुपये (जीडीपी का 12.5 फीसदी) हो गया। इसमें 1.8 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि हुई, जो वित्त वर्ष 2019 और वित्त वर्ष 2020 के बीच की 2.5 लाख करोड़ की वृद्धि से कम है। वित्त वर्ष 2021 में उच्च सरकारी खर्च के सटीक प्रभाव की जांच की जरूरत है।
3- सकल अचल पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ), जो देश में कुल पूंजी निवेश का प्रतिनिधित्व करता है, में भी गिरावट दर्ज की गई- वित्त वर्ष 2020 के 58.5 लाख करोड़ रुपये (जीडीपी का 28.8 फीसदी) से घटकर वित्त वर्ष 2021 में 53.5 लाख करोड़ रुपये (जीडीपी का 27.1 फीसदी) पर आ गया।
पहली दो तिमाहियों में आर्थिक गतिविधियां बंद होने के कारण वित्त वर्ष 2021 में निजी खपत और पूंजी निवेश, दोनों में गिरावट आई। वित्त वर्ष 2021 में महामारी के चलते लॉकडाउन लगाने के बावजूद कृषि ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र है, जिसने 6.5 फीसदी की सकारात्मक वृद्धि दर्ज की। यह पहली लहर के दौरान ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बंद नहीं करने और किसानों के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर रबी फसल काटने, खरीफ फसल बोने और काटने, और पीएम-किसान योजना सहित विभिन्न योजनाओं का लाभ देने का प्रत्यक्ष परिणाम है। विनिर्माण क्षेत्र में 4.6 फीसदी की गिरावट आई, साफ है कि इस क्षेत्र पर लॉकडाउन का असर पड़ा, जिसके चलते कारखाने बंद हो गए और व्यापार में भारी कमी आई। निर्माण क्षेत्र में 6.4 फीसदी की गिरावट आई, जिससे नौकरी की उपलब्धता घटी और बेरोजगारी बढ़ी।
महामारी ने खुदरा, आतिथ्य और यात्रा उद्योगों को भी सीधे प्रभावित किया, और यह व्यापार, होटल, परिवहन और संचार से युक्त सेवा उप-क्षेत्र के जीवीए में 15.5 फीसदी की भारी गिरावट से स्पष्ट है। यह एक बड़ा नुकसान था, जिससे बड़े पैमाने पर नौकरी गई; और यह अभी तक पटरी पर नहीं लौटा है। एक अन्य महत्वपूर्ण सेवा उप-क्षेत्र वित्तीय, रियल एस्टेट और व्यावसायिक सेवाएं हैं, जिसमें एक फीसदी की मामूली वृद्धि हुई। ध्यान देने योग्य है कि आमतौर पर यह उप-क्षेत्र सात फीसदी से ज्यादा वृद्धि करता है और छह फीसदी से ज्यादा का अंतर एक महत्वपूर्ण नुकसान है। शुद्ध करों में केवल तीन फीसदी की गिरावट आई, जो दर्शाता है कि करदाता वर्ग महामारी और लॉकडाउन से अनावश्यक रूप से प्रभावित नहीं था।
भारतीय अर्थव्यवस्था वित्त वर्ष 2021 की दूसरी छमाही में वापस पटरी पर आ रही थी, और वित्त वर्ष 2022 में आर्थिक विकास के मजबूत अनुमान लगाए गए थे। वास्तविक जीडीपी वृद्धि का अनुमान 10-12.5 फीसदी के दायरे में था, मुद्रास्फीति को शामिल करते हुए कुल जीडीपी के संदर्भ में 14-16.5 फीसदी। हालांकि, कोविड-19 की दूसरी लहर और प्रभावित राज्यों में लॉकडाउन के कारण वित्त वर्ष 2022 की पहली तिमाही में फिर से गिरावट दर्ज की जाएगी, और दूसरी तिमाही में पूरे भारत में धीरे-धीरे अनलॉक होने से थोड़ा सुधार दिखेगा।
विकास अनुमान अब घटकर 7.5-10 फीसदी हो गया है। तिमाही जीडीपी अनुमान, विभिन्न क्षेत्रों का जीवीए विश्लेषण और खपत व पूंजी निवेश के रुझान स्पष्ट रूप से भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख कारकों कोदर्शाते हैं। इन पर ध्यान केंद्रित करके, पर्याप्त रोजगार सृजन के साथ वित्त वर्ष 2022 की उच्च विकास जरूरत को पूरा करना संभव है।
हालांकि, यह सरकार द्वारा एक आसन्न आर्थिक प्रोत्साहन पर निर्भर है, जो खपत, विनिर्माण, निर्माण और व्यापक रोजगार सृजन को प्रोत्साहित करता है। मौद्रिक प्रोत्साहन अब प्रभावी नहीं होगा; वित्त वर्ष 2022 के स्वस्थ विकास को सुनिश्चित करने के लिए राजकोषीय पैकेज ही एकमात्र तरीका है। भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत है और इसने साबित कर दिया है कि यह कुछ तिमाहियों में तस्वीर बदल सकती है, जैसा इसने वित्त वर्ष 2021 में किया था। वित्त वर्ष 2022 में इसे तेजी से और मजबूत बनाने के लिए रणनीतिक रूप से बढ़ावा देने की जरूरत है।